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इलाहाबादी तरबूज के आगे फीकी हुई बेल्हा की हिरमिंजी
अमर उजाला ब्यूरो, प्रतापगढ़
Updated Wed, 03 Jun 2015 11:23 PM IST
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इलाहाबाद से आने वाले तरबूज की मिठास के आगे बेल्हा की देसी हिरमिंजी फीकी पड़ गई है। बिक्री कम होने से व्यापारी भी इसे दुकान में नहीं रख रहे हैं। वहीं खास मुनाफा न होने के कारण किसानों ने भी इस बार इसकी खेती से दूरी बना रखी है। गिन-चुने किसानों ने इसकी फसल उगाई है। जनवरी माह में बोई जाने वाली जायद की यह फसल अब बेल्हा के किसानों को रास नहीं आ रही है। खास मुनाफा न होने के चलते वह इसकी खेती करना लगभग बंद कर दिया गया है। कुछ किसान इसकी खेती केवल शौक के लिए कर रहे हैं। बता दें कि लगभग तीन वर्षों में इलाहाबादी तरबूज लोगों को इस कदर भाने लगा कि उन्हें यहां की हिरमिंजी फीकी लगने लगी। बिक्री कम होने पर शहर के व्यापारियों ने धीरे-धीरे इसे बेचना बंद कर दिया। केवल नाम मात्र के लिए दुकानों में रख लेते हैं। इसके साथ ही गांव के बाजारों में भी तरबूज की मांग अधिक हो गई है।
जब तक बाजारों में हिरमिंजी की मांग थी, तब तक किसानों को इसकी खेती से काफी लाभ होता था। लाभ से ज्यादा लागत में खर्च होने पर किसानों को इसकी खेती से मोहभंग हो गया। रानीगंज तहसील के किसान अनिल, अच्छेलाल व अरुण आदि ने बताया कि वह अधिक मात्रा में इसकी खेती करते थे। अच्छी पैदावार होने पर इसे वह मऊआइमा के बाजार में बेचते थे। जिससे उन्हें काफी लाभ होता था। लगभग तीन चार सालों में बाजार में हिरमिंजी की मांग घट गई और व्यापारी औने-पौने दाम पर इसकी खरीदारी करने लगे। बताया कि हिरमिंजी फल बोने के बाद उसकी जंगली जानवरों से रखवाली करनी पड़ती थी। लागत के बराबर भी आमदनी न होने पर वह मौसमी सब्जियां बोने लगे हैं, जिससे उनकी अच्छी कमाई हो जाती है।
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जब तक बाजारों में हिरमिंजी की मांग थी, तब तक किसानों को इसकी खेती से काफी लाभ होता था। लाभ से ज्यादा लागत में खर्च होने पर किसानों को इसकी खेती से मोहभंग हो गया। रानीगंज तहसील के किसान अनिल, अच्छेलाल व अरुण आदि ने बताया कि वह अधिक मात्रा में इसकी खेती करते थे। अच्छी पैदावार होने पर इसे वह मऊआइमा के बाजार में बेचते थे। जिससे उन्हें काफी लाभ होता था। लगभग तीन चार सालों में बाजार में हिरमिंजी की मांग घट गई और व्यापारी औने-पौने दाम पर इसकी खरीदारी करने लगे। बताया कि हिरमिंजी फल बोने के बाद उसकी जंगली जानवरों से रखवाली करनी पड़ती थी। लागत के बराबर भी आमदनी न होने पर वह मौसमी सब्जियां बोने लगे हैं, जिससे उनकी अच्छी कमाई हो जाती है।
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