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प्रतापगढ़: तिरुपति बालाजी, शिरडी और काशी में मिलेगा आंवला का प्रसाद

Wed, 27 Nov 2019 01:30 AM IST
Allahabad Bureau इलाहाबाद ब्यूरो
Updated Wed, 27 Nov 2019 01:30 AM IST
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Pratapgarh: Amla prasad will be available in Tirupati Balaji, Shirdi and Kashi
महुली मंडी में आंवले की छंटाई करते मजदूर। - फोटो : PRATAPGARH
आने वाले दिनों में देश के कुछ प्रसिद्ध मंदिरों में बेल्हा के आंवले का प्रसाद मिल सकता है। तिरुपति बालाजी, शिरडी सांईबाबा और बनारस के काशी विश्वनाथ मंदिर में दर्शन करने वाले भक्तों को आंवले का प्रसाद वितरित किया जा सकता है। इसके लिए सांसद संगमलाल गुप्ता ने प्रयास तेज कर दिया है। उन्होंने प्रधानमंत्री और मंदिरों के ट्रस्ट को पत्र भेजकर आंवले का महाप्रसाद भक्तों को देने का आग्रह किया है।
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बेल्हा आंवले की उपज के लिए पूरे देश में जाना जाता है। यहां अमृतफल आंवले से लड्डू, बर्फी और कैंडी बनाई जाती है। देश के विभिन्न इलाकों के व्यापारी आंवला खरीदकर ले जाते हैं। बावजूद इसके आंवला किसानों को लाभ नहीं मिल पाता। ऐसे में सांसद संगमलाल गुप्ता ने प्रधानमंत्री व देश के प्रसिद्ध मंदिरों के ट्रस्ट को पत्र भेजा है।
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जिसमें कहा है कि जिले के छह विकास खंडों में आंवला फल पट्टी के रूप में घोषित है। देश के अनेकों धार्मिक स्थलों में शासन द्वारा स्थापित भवन, स्थानीय ट्रस्ट द्वारा संचालन कार्य करके प्रसाद आदि की व्यवस्था स्वयं की जाती है। जिनमें प्रमुख रूप से तिरुपति बालाजी तिरुमला पर्वत, श्री शिरडी बाबा, श्री काशी विश्वनाथ मंदिर वाराणसी और सिद्धिविनायक मुंबई में मंदिर ट्रस्ट व समिति द्वारा स्वयं प्रसाद चढ़ाने और प्रसाद के रूप में वितरित करना प्रचलन में है।
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इस तरह के ट्रस्टों व धार्मिक संस्थाओं में परंपरागत लड्डू प्रसाद के साथ-साथ आंवले के उत्पादों को महाप्रसाद के रूप में वितरित किए जाने की व्यवस्था बनाई जाए। जिससे जनपद में आंवला किसानों को लाभ मिलेगा।
आंवला किसानों की नहीं निकल पाती लागत
जिले में आंवले का उत्पादन छह विकासखंडों में होता है। आंवला का उत्पादन करने वाले किसानों को उनका मुनाफा नहीं मिल पाता। जिले के आंवला कारोबारी भी वन विभाग के ट्रांजिट परमिट के चलते परेशान होते रहे हैं। किसान आंवले का उचित मूल्य न मिल पाने के कारण निराश होकर पेड़ों की कटान कराने के लिए मजबूर हैं।

वन डिस्ट्रिक्ट, वन प्रोडेक्ट के तहत हुआ है चयन
शासन ने वन डिस्ट्रिक्ट, वन प्रोडेक्ट के रूप में आंवले का चयन किया था। आंवले को उद्योग के रूप में विकसित करने के लिए भले ही तमाम योजनाएं बनीं, लेकिन किसानों का भला नहीं कर सका। आज भी आंवला किसान खुद को ठगा महसूस करते हैं। सूबे की सत्ता में बैठने वाले भले ही आंवले के विकास के लिए कुछ करने का वादा करते हैं, लेकिन हकीकत इससे इतर होती है। यहां तक किसानों के खेतों में होने वाले आंवले को वन उपज मानते हुए टैक्स भी वन विभाग वसूलता है।
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