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कद्दावर हाशिए पर, नई पीढ़ी अभी तैयार नहीं
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प्रतापगढ़। जिले के कद्दावर भाजपा नेता हाशिए पर हैं और नई पीढ़ी को अभी सियासत का माहिर खिलाड़ी नहीं माना जा रहा। यही वजह रही कि कभी तीन-तीन मंत्री देने वाले प्रतापगढ़ को योगी सरकार के दूसरे कार्यकाल के मंत्रिमंडल में स्थान नहीं मिल सका। राजनीति में नए होने और सियासी अनुभवों की कमी भाजपा के नए नेताओं पर भारी पड़ गई। योगी सरकार के पहले कार्यकाल में संगठन से मंत्री बनाए गए महेंद्र सिंह को भी इस बार शीर्ष नेतृत्व ने दरकिनार कर दिया। करीब बीस वर्षों के बाद ऐसा मौका आया है जब जिले से कोई मंत्री नहीं बना है।
चुनाव से पहले यह माना जा रहा था कि प्रदेश में दोबारा भाजपा की सरकार बनने पर जिले से कम से कम दो मंत्री जरूर बनेंगे। योगी सरकार के पहले कार्यकाल में बेहतर कामकाज के चलते ग्राम्य विकास मंत्री रहे राजेंद्र प्रताप सिंह मोती सिंह की दूसरी बार भी ताजपोशी पक्की मानी जा रही थी, लेकिन विधानचुनाव में मिली करारी हार के बाद इस पर संशय खड़ा हो गया। हालांकि इसके बाद भी इसकी चर्चा जोरों पर रही कि शीर्ष नेतृत्व उन्हें मंत्रिमंडल में शामिल कर सकता है। मोती सिंह के समर्थकों ने सोशल मीडिया पर इसके लिए तगड़ा अभियान भी चलाया, लेकिन बढ़ती उम्र मोती सिंह के सियासी कद पर भारी पड़ गई और उन्हें हाशिए पर जाना पड़ा। प्रचार के दौरान खुद मोती सिंह भी इस बात का जिक्र करते रहे यह उनका आखिरी चुनाव है, लेकिन उनका यह इमोशनल दांव भी काम नहीं आया।
2017 के विधानसभा चुनाव में पहली बार में ही रानीगंज से जीतकर विधानसभा पहुंचे धीरज ओझा के लिए भी इस बार चुनाव में प्रचार करने आए केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने बड़े संकेत दिए थे। शाह ने धीरज ओझा को जिताने पर बड़ा आदमी बनाने की बात कहकर उन्हें मंत्रिमंडल में शामिल करने की तरफ इशारा किया था, लेकिन कांटे की लड़ाई में धीरज भी चुनाव हार गए। महज दो हजार वोटों के अंतर से मिली इस हार ने धीरज के चमकते भविष्य पर ग्रहण लगा दिया। जिले के कद्दावर नेताओं में गिने जाने वाले पूर्व कैबिनेट शिवाकांत ओझा भी पुराने भाजपाई हैं। रानीगंज विधानसभा से सपा से टिकट कटने के बाद चुनाव से ऐन पहले वह भाजपा में शामिल हुए, लेकिन इसका उन्हें कोई खास फायदा नहीं हुआ।
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रानीगंज से टिकट के लिए वह अंतिम समय तक लगे रहे, लेकिन अंत में बाजी धीरज ओझा के हाथ लगी। पार्टी ने एक तरह से उन्हें भी दरकिनार कर दिया। भाजपा की प्रदेश कार्यसमिति के सदस्य शिवप्रकाश मिश्र सेनानी की पत्नी सिंधुजा मिश्रा ने इस बार कुंडा से राजाभैया के खिलाफ चुनाव लड़ा था, लेकिन वह अपनी जमानत भी नहीं बचा सकीं। जिले में भाजपा को एकमात्र सदर की सीट मिली थी। पिछड़े वर्ग से आने के कारण यहां से विधायक बने राजेंद्र मौर्या को भी मंत्री बनाने की चर्चाओं ने खूब जोर पकड़ा, लेकिन सियासत में अनुभवों की कमी के कारण उन्हें भी तरजीह नहीं दी गई।
दरअसल, राजेंद्र मौर्या को विधानसभा का टिकट भी आखिरी वक्त में तब मिला था जब अनुप्रिया ने सपा गठबंधन से अपनी मां कृष्णा पटेल को प्रत्याशी बनाए जाने के बाद सदर विधानसभा सीट के लिए दावा छोड़ दिया। भाजपा ने नामांकन के आखिरी दिन पिछड़े चेहरे के तौर पर राजेंद्र मौर्य को चुना था और यही वजह रही कि मंत्रिमंडल में शामिल करने के लिए उनके नाम पर विचार नहीं किया गया। भाजपा की सहयोगी अपना दल एस के टिकट पर विश्वनाथगंज विधानसभा से पहली बार विधायक बने जीतलाल पटेल लंबे समय से अनुप्रिया के साथ जुड़े हैं और वह जमीनी नेेता भी माने जाते हैं, लेकिन भाजपा नेतृत्व ने अपना दल एस के खाते में मंत्री का सिर्फ एक पद देने का निर्णय पहले ही कर लिया था, जिसके लिए कार्यकारी अध्यक्ष आशीष पटेल का नाम तय था।
भाजपा के एक और कद्दावर नेता रहे बृजेश मिश्र सौरभ चुनाव से पहले ही पार्टी छोड़कर सपा में शामिल हो गए थे। 2017 से पहले असम में हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा को मिली शानदार जीत के बाद वहां के प्भारी रहे प्रतापगढ़ के रहने वाने महेंद्र सिंह को पार्टी ने यूपी में मंत्री बनाकर इनाम दिया था, लेकिन उनके विभाग को लेकर तरह-तरह की चर्चाएं रहीं। माना जा रहा है कि इसके चलते ही सीएम योगी का करीबी होने के बाद भी पार्टी नेतृत्व ने उनके नाम पर भी विचार नहीं किया।
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चुनाव से पहले यह माना जा रहा था कि प्रदेश में दोबारा भाजपा की सरकार बनने पर जिले से कम से कम दो मंत्री जरूर बनेंगे। योगी सरकार के पहले कार्यकाल में बेहतर कामकाज के चलते ग्राम्य विकास मंत्री रहे राजेंद्र प्रताप सिंह मोती सिंह की दूसरी बार भी ताजपोशी पक्की मानी जा रही थी, लेकिन विधानचुनाव में मिली करारी हार के बाद इस पर संशय खड़ा हो गया। हालांकि इसके बाद भी इसकी चर्चा जोरों पर रही कि शीर्ष नेतृत्व उन्हें मंत्रिमंडल में शामिल कर सकता है। मोती सिंह के समर्थकों ने सोशल मीडिया पर इसके लिए तगड़ा अभियान भी चलाया, लेकिन बढ़ती उम्र मोती सिंह के सियासी कद पर भारी पड़ गई और उन्हें हाशिए पर जाना पड़ा। प्रचार के दौरान खुद मोती सिंह भी इस बात का जिक्र करते रहे यह उनका आखिरी चुनाव है, लेकिन उनका यह इमोशनल दांव भी काम नहीं आया।
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2017 के विधानसभा चुनाव में पहली बार में ही रानीगंज से जीतकर विधानसभा पहुंचे धीरज ओझा के लिए भी इस बार चुनाव में प्रचार करने आए केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने बड़े संकेत दिए थे। शाह ने धीरज ओझा को जिताने पर बड़ा आदमी बनाने की बात कहकर उन्हें मंत्रिमंडल में शामिल करने की तरफ इशारा किया था, लेकिन कांटे की लड़ाई में धीरज भी चुनाव हार गए। महज दो हजार वोटों के अंतर से मिली इस हार ने धीरज के चमकते भविष्य पर ग्रहण लगा दिया। जिले के कद्दावर नेताओं में गिने जाने वाले पूर्व कैबिनेट शिवाकांत ओझा भी पुराने भाजपाई हैं। रानीगंज विधानसभा से सपा से टिकट कटने के बाद चुनाव से ऐन पहले वह भाजपा में शामिल हुए, लेकिन इसका उन्हें कोई खास फायदा नहीं हुआ।
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रानीगंज से टिकट के लिए वह अंतिम समय तक लगे रहे, लेकिन अंत में बाजी धीरज ओझा के हाथ लगी। पार्टी ने एक तरह से उन्हें भी दरकिनार कर दिया। भाजपा की प्रदेश कार्यसमिति के सदस्य शिवप्रकाश मिश्र सेनानी की पत्नी सिंधुजा मिश्रा ने इस बार कुंडा से राजाभैया के खिलाफ चुनाव लड़ा था, लेकिन वह अपनी जमानत भी नहीं बचा सकीं। जिले में भाजपा को एकमात्र सदर की सीट मिली थी। पिछड़े वर्ग से आने के कारण यहां से विधायक बने राजेंद्र मौर्या को भी मंत्री बनाने की चर्चाओं ने खूब जोर पकड़ा, लेकिन सियासत में अनुभवों की कमी के कारण उन्हें भी तरजीह नहीं दी गई।
दरअसल, राजेंद्र मौर्या को विधानसभा का टिकट भी आखिरी वक्त में तब मिला था जब अनुप्रिया ने सपा गठबंधन से अपनी मां कृष्णा पटेल को प्रत्याशी बनाए जाने के बाद सदर विधानसभा सीट के लिए दावा छोड़ दिया। भाजपा ने नामांकन के आखिरी दिन पिछड़े चेहरे के तौर पर राजेंद्र मौर्य को चुना था और यही वजह रही कि मंत्रिमंडल में शामिल करने के लिए उनके नाम पर विचार नहीं किया गया। भाजपा की सहयोगी अपना दल एस के टिकट पर विश्वनाथगंज विधानसभा से पहली बार विधायक बने जीतलाल पटेल लंबे समय से अनुप्रिया के साथ जुड़े हैं और वह जमीनी नेेता भी माने जाते हैं, लेकिन भाजपा नेतृत्व ने अपना दल एस के खाते में मंत्री का सिर्फ एक पद देने का निर्णय पहले ही कर लिया था, जिसके लिए कार्यकारी अध्यक्ष आशीष पटेल का नाम तय था।
भाजपा के एक और कद्दावर नेता रहे बृजेश मिश्र सौरभ चुनाव से पहले ही पार्टी छोड़कर सपा में शामिल हो गए थे। 2017 से पहले असम में हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा को मिली शानदार जीत के बाद वहां के प्भारी रहे प्रतापगढ़ के रहने वाने महेंद्र सिंह को पार्टी ने यूपी में मंत्री बनाकर इनाम दिया था, लेकिन उनके विभाग को लेकर तरह-तरह की चर्चाएं रहीं। माना जा रहा है कि इसके चलते ही सीएम योगी का करीबी होने के बाद भी पार्टी नेतृत्व ने उनके नाम पर भी विचार नहीं किया।