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मिट्टी के नाम पर मिट्टी में मिल गए करोड़ों
अमर उजाला ब्यूरो, प्रतापगढ़
Updated Thu, 30 Jul 2015 11:24 PM IST
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जिले की ऊसर भूमि सुधारने के लिए भले ही करोड़ों रुपये पानी की तरह बह गए, मगर ऊसर भूमि सुधार निगम बिस्वा भर जमीन भी अभी तक नहीं सुधार पाया है। ऐसे में विभाग की योजना के साथ अफसरों की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े हो रहे हैं। पैसे के गोलमाल की आशंका से भी इनकार नहीं किया जा सकता है।
जिले की ऊसर भूमि को उपजाऊ बनाने के लिए वर्ष 1998 में ऊसर भूमि सुधार निगम कार्यालय खोला गया है। पट्टी, रानीगंज, सदर, कुंडा और लालगंज तहसीलों में ऊसर पड़ी 38,012 हेक्टेअर जमीन को सुधारने के लिए किसानों को जिप्सम, यूरिया के साथ ही बीज नि:शुल्क मुहैया कराया जाता है। खेतों की सिंचाई के लिए नि:शुल्क पंपसेट भी लगाने की योजना है। इन योजनाओं को मूर्त रूप देने के लिए प्रतिवर्ष करोड़ों रुपये का बजट आता है। वैसे तो निगम के अधिकारी प्रतिवर्ष कुछ गांवों में का चयन कर ऊसर भूमि को ठीक करने का अभियान चलाते हैं, मगर यह अभियान सिर्फ कागजों तक ही सीमित रह जाता है। जिले के विभिन्न गांवों को समय-समय पर ऊसर भूमि को सुधारने के लिए चिह्नित किया गया, मगर आश्चर्य की बात तो यह है कि निगम का अभियान तो समाप्त हो गया, मगर जमीन ऊसर की ऊसर ही बनी हुई है। विभाग के पास भी कोई ठोस आंकड़ा नहीं है कि अभी कितनी ऊसर जमीन को सुधारा जा सका है।
चालू वित्तीय वर्ष में पूरेबदल, कोयम, भीटीकला, राजमलपुर, कामापट्टी, सुल्तानपुर, पुवासी, हरिहरनंद गांव की ऊसर पड़ी 237 हेक्टेअर जमीन को सुधारने का लक्ष्य रखा गया है। इन गांवों के चयनित किसानों को पहले चरण में जिप्सम और यूरिया खाद बांटने का दावा निगम के कर्मचारी कर रहे हैं, मगर वास्तविकता तो यह है कि गांव के गिने-चुने किसानों को बांटकर कागजी कोरम पूरा किया जा रहा है। बीते वर्ष लक्ष्मणपुर ब्लाक के कांछा गांव में संचालित योजना में व्यापक स्तर पर खेल हुआ। गांव के लोगों ने इसकी शिकायत मुख्यमंत्री तक पहुंचाई है। जिसकी जांच अभी चल रही है।
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दरअसल ऊसर सुधार के नाम पर आने वाली भारी भरकम रकम सीधे निगम के अफसरों के पास आने के कारण वे मनमाने ढंग से खर्च करते हैं। चयनित किसानों को क्या योजनाएं मिलनी हैं और अनुदान की रकम कितनी मिलेगी। यह बात विभाग के लोग बताते ही नहीं हैं। वह सिर्फ अपनी जेब भरने के फिराक में रहते हैं। यहीं वजह है कि विभाग के पास भी कोई आंकड़ा नहीं है कि अभी तक कितनी ऊसर भूमि सुधारी गई है।
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जिले की ऊसर भूमि को उपजाऊ बनाने के लिए वर्ष 1998 में ऊसर भूमि सुधार निगम कार्यालय खोला गया है। पट्टी, रानीगंज, सदर, कुंडा और लालगंज तहसीलों में ऊसर पड़ी 38,012 हेक्टेअर जमीन को सुधारने के लिए किसानों को जिप्सम, यूरिया के साथ ही बीज नि:शुल्क मुहैया कराया जाता है। खेतों की सिंचाई के लिए नि:शुल्क पंपसेट भी लगाने की योजना है। इन योजनाओं को मूर्त रूप देने के लिए प्रतिवर्ष करोड़ों रुपये का बजट आता है। वैसे तो निगम के अधिकारी प्रतिवर्ष कुछ गांवों में का चयन कर ऊसर भूमि को ठीक करने का अभियान चलाते हैं, मगर यह अभियान सिर्फ कागजों तक ही सीमित रह जाता है। जिले के विभिन्न गांवों को समय-समय पर ऊसर भूमि को सुधारने के लिए चिह्नित किया गया, मगर आश्चर्य की बात तो यह है कि निगम का अभियान तो समाप्त हो गया, मगर जमीन ऊसर की ऊसर ही बनी हुई है। विभाग के पास भी कोई ठोस आंकड़ा नहीं है कि अभी कितनी ऊसर जमीन को सुधारा जा सका है।
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चालू वित्तीय वर्ष में पूरेबदल, कोयम, भीटीकला, राजमलपुर, कामापट्टी, सुल्तानपुर, पुवासी, हरिहरनंद गांव की ऊसर पड़ी 237 हेक्टेअर जमीन को सुधारने का लक्ष्य रखा गया है। इन गांवों के चयनित किसानों को पहले चरण में जिप्सम और यूरिया खाद बांटने का दावा निगम के कर्मचारी कर रहे हैं, मगर वास्तविकता तो यह है कि गांव के गिने-चुने किसानों को बांटकर कागजी कोरम पूरा किया जा रहा है। बीते वर्ष लक्ष्मणपुर ब्लाक के कांछा गांव में संचालित योजना में व्यापक स्तर पर खेल हुआ। गांव के लोगों ने इसकी शिकायत मुख्यमंत्री तक पहुंचाई है। जिसकी जांच अभी चल रही है।
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दरअसल ऊसर सुधार के नाम पर आने वाली भारी भरकम रकम सीधे निगम के अफसरों के पास आने के कारण वे मनमाने ढंग से खर्च करते हैं। चयनित किसानों को क्या योजनाएं मिलनी हैं और अनुदान की रकम कितनी मिलेगी। यह बात विभाग के लोग बताते ही नहीं हैं। वह सिर्फ अपनी जेब भरने के फिराक में रहते हैं। यहीं वजह है कि विभाग के पास भी कोई आंकड़ा नहीं है कि अभी तक कितनी ऊसर भूमि सुधारी गई है।