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दूध या सफेद जहर
प्रतापगढ़ ब्यूरो
Updated Thu, 22 Feb 2018 11:19 PM IST
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होली करीब आते ही जिले में दूध की डिमांड दोगुनी हो गई है। त्योहार के लिए बड़े पैमाने पर खोवा तैयार कर डंप किया जा रहा है। इसका फायदा उठाकर मुनाफाखोर सिंथेटिक दूध तैयार कर लोगों की मांग पूरी कर रहे हैं। मोटी कमाई के चक्कर में लोगों की जान के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है। कानपुर और सोरांव से दूध की सप्लाई कर एजेंटों के माध्यम से बेचा जा रहा है। ग्राहक भी पहचान करने के बजाए सिर्फ अपनी आवश्यकता का ध्यान रख रहे हैं।
होली के पर्व पर खोवा, पनीर और ठंडई के लिए उपयोग होने दूध की डिमांड बहुत ज्यादा बढ़ गई है। इसके बावजूद जिले में कहीं दूध की कमी नहीं है। मौके का फायदा उठाकर मुनाफाखोर मोटी कमाई के चक्कर में सिंथेटिक दूध तैयार कर बेच रहे हैं। शहर से गांव तक यह गोरखधंधा चल रहा है। सिंथेटिक दूध को तैयार करने में ऐसे केमिकल और डिटरजेंट का प्रयोग किया जाता है जो स्वास्थ्य के लिए बेहद हानिकारक है। जानकारों की मानें तो दूध को सफेद बनाने के लिए डिटरजेंट, हाईड्रोजन-पर-ऑक्साइड और फार्मेलिन मिलाई जाती है।
चिकनाहट के लिए रिफाइंड का प्रयोग किया जाता है। दूध की लाइफ पांच से छह घंटे तक बनाए रखने के लिए यूरिया का प्रयोग किया जाता है। दूध की सफेदी लंबे समय तक बरकरार रहे, इसके हल्का मैदा भी मिलाया जाता है। सिंथेटिक दूध से तैयार होने वाली मिठाई या पदार्थ पूरी तरह जहर का कार्य करते हैं। सिंथेटिक दूध से बनने वाले खोवा और पनीर में स्वाद भी नहीं होता है। कुछ मिलावटखोर दूधिए यह काम तेजी से कर रहे हैं। ग्रामीण इलाकों में सिंथेटिक दूध तैयार कर शहर में बेचा जा रहा है। जिले के अंतू, गड़वारा, दिलीपपुर पट्टी इलाके में बड़े पैमाने पर सिंथेटिक दूध तैयार किया जाता है।
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देशी नुस्खे से भी पहचानें नकली दूध
सिंथेटिक या नकली दूध की पहचान आप देशी नुस्खे से भी कर सकते हैं। वैसे तो सिंथेटिक दूध की जांच के लिए इलाहाबाद में टेस्टिंग प्वाइंट बना हुआ है, मगर आप चाहें तो अपने घर पर भी नकली दूध की जांच कर सकते हैं। दुग्ध विकास के सीनियर निरीक्षक हेमंत मिश्रा ने बताया कि थोड़ा सा दूध फर्श की ऊपरी सतह पर डालें। नीचे खिसक कर दूध के आने पर अगर लाइन बन जाती है, तो वह असली दूध है, अगर लाइन नहीं बनती है, तो वह नकली दूध है।
सिंथेटिक दूध से बचने के लिए यह बरतें सावधानी
बच्चों और गर्भवती महिलाओं को ज्यादा खतरा
सिंथेटिक दूध स्वास्थ्य के लिए बेहद हानिकारक होता है। खासकर बच्चों और गर्भवती महिलाओं को सिंथेटिक दूध अधिक नुकसान पहुंचाता है। गर्भवती महिला के गर्भस्थ शिशु का विकास शिथिल होने के साथ ही महिलाओं में ऊर्जा का क्षरण हो जाता है। छोटे बच्चे प्राय: फूड प्वाइजनिंग, उल्टी-दस्त के शिकार हो जाते हैं।
डॉ. अनिल गुप्ता, बाल रोग विशेषज्ञ।
फेल हो सकती है किडनी, सड़ सकती है आंत
सिंथेटिक दूध से किडनी फेल हो सकती हैं और आंत, फेफड़ों और गले में इंफेक्शन हो सकता है। दूध में रासायनिक मिलावट से आंत में घाव होने की आशंका बनी रहती है। भोजन की नली और गले में भी घाव हो सकता है। इलाज में देरी हुई तो बीमारी गंभीर रूप ले सकती है। ऐसे में जान भी जा सकती है। इसलिए महिलाओं, बुजुर्गों और बीमार लोगों को खास सावधानी बरतनी चाहिए।
डा. आरडी द्विवेदी, पूर्व फिजीशियन, जिला अस्पताल।
होली पर दोगुना से अधिक बढ़ जाती है दूध की डिमांड
जिले में होली पर दूध की डिमांड दोगुना से भी अधिक हो जाती है। दुग्ध विकास विभाग के आंकड़ों पर गौर किया जाए तो सामान्य दिनों में 8,663 लीटर प्रतिदिन दूध की मांग होती है। जबकि त्योहार पर यह मांग बढ़कर 17,395 लीटर प्रतिदिन हो जाती है। इसमें 4,814 लीटर बाहर के दूधियों और 3,918 लीटर दूध पैकेट बंद के रुप में बिक जाता है। ग्राहकों की मांग का फायदा उठाने के लिए अवैध कारोबारी सिंथेटिक दूध तैयार करते हैं।
सिंथेटिक दूध में ढाई गुना कमाते हैं मुनाफा
सिंथेटिक दूध को तैयार करने में कोई अधिक खर्च नहीं आता है। जानकारों की मानें तो एक सौ लीटर दूध तैयार करने में लगभग 1400 से 1600 रुपये का खर्च आता है। खुले बाजार में यही दूध चार से पांच हजार में आसानी से बिक जाता है। इस प्रकार मुनाफाखोर 1600 रुपये खर्च कर आसानी से पांच हजार रुपये कमा लेते हैं।
आवश्यकता के आगे गुणवत्ता नजरअंदाज
त्योहार पर बिकने वाले मिलावटी दूध पर लोगों को शंका तो रहती है, मगर आवश्यकता के आगे गुणवत्ता को नजरअंदाज कर देते हैं। शहर में मिलावटी दूध जांचने का कोई केंद्र भी नहीं है। जिस पर लोग विश्वास को मजबूती प्रदान कर सकें। त्योहार की खुशियां बांटने के लिए दूध खरीदना मजबूरी होती है।
जिले में मिलावटी दूध बिक रहा है। इस बात से शहर के लोग आशंकित तो रहते हैं, मगर खुलकर बोल नहीं पाते हैं। करनपुर निवासी रामकिशोर मिश्र बताते हैं कि मिलावटी दूध पर प्रतिबंध लगाना बहुत आवश्यक है। मगर जिला प्रशासन इस दिशा में कोई पहल नहीं करता है, जांच अभियान सिर्फ कागजी कोरम होता है।
ओएन पांडेय कहते हैं कि ग्राहक का हर तरह से शोषण किया जाता है। शहर में जो उपलब्ध होता है, उसी से काम चलाया जाता है। शफीक अंसारी की मानें तो यह मालूम है कि शहर में मिलावटी दूध का गिरोह सक्रिय है, मगर ग्राहक के सामने मजबूरी है कि वह किस पर विश्वास करें। अष्टभुजा नगर निवासी ममता श्रीवास्तव की मानें तो होली के त्योहार पर लगभग सभी पकवान दूध से तैयार होते हैं। अगर घर में गुझिया न बने तो त्योहार ही फीका होता है। ऐेसे में दूध के मिलावट की जांच करें, या अपनी जरूरत देखें। रिचा मोहनी कहती हैं कि अगर शहर में सिंथेटिक दूध बिक रहा है, तो जिला प्रशासन क्या कर रहा है। उसे कार्रवाई करनी चाहिए।
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होली के पर्व पर खोवा, पनीर और ठंडई के लिए उपयोग होने दूध की डिमांड बहुत ज्यादा बढ़ गई है। इसके बावजूद जिले में कहीं दूध की कमी नहीं है। मौके का फायदा उठाकर मुनाफाखोर मोटी कमाई के चक्कर में सिंथेटिक दूध तैयार कर बेच रहे हैं। शहर से गांव तक यह गोरखधंधा चल रहा है। सिंथेटिक दूध को तैयार करने में ऐसे केमिकल और डिटरजेंट का प्रयोग किया जाता है जो स्वास्थ्य के लिए बेहद हानिकारक है। जानकारों की मानें तो दूध को सफेद बनाने के लिए डिटरजेंट, हाईड्रोजन-पर-ऑक्साइड और फार्मेलिन मिलाई जाती है।
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चिकनाहट के लिए रिफाइंड का प्रयोग किया जाता है। दूध की लाइफ पांच से छह घंटे तक बनाए रखने के लिए यूरिया का प्रयोग किया जाता है। दूध की सफेदी लंबे समय तक बरकरार रहे, इसके हल्का मैदा भी मिलाया जाता है। सिंथेटिक दूध से तैयार होने वाली मिठाई या पदार्थ पूरी तरह जहर का कार्य करते हैं। सिंथेटिक दूध से बनने वाले खोवा और पनीर में स्वाद भी नहीं होता है। कुछ मिलावटखोर दूधिए यह काम तेजी से कर रहे हैं। ग्रामीण इलाकों में सिंथेटिक दूध तैयार कर शहर में बेचा जा रहा है। जिले के अंतू, गड़वारा, दिलीपपुर पट्टी इलाके में बड़े पैमाने पर सिंथेटिक दूध तैयार किया जाता है।
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देशी नुस्खे से भी पहचानें नकली दूध
सिंथेटिक या नकली दूध की पहचान आप देशी नुस्खे से भी कर सकते हैं। वैसे तो सिंथेटिक दूध की जांच के लिए इलाहाबाद में टेस्टिंग प्वाइंट बना हुआ है, मगर आप चाहें तो अपने घर पर भी नकली दूध की जांच कर सकते हैं। दुग्ध विकास के सीनियर निरीक्षक हेमंत मिश्रा ने बताया कि थोड़ा सा दूध फर्श की ऊपरी सतह पर डालें। नीचे खिसक कर दूध के आने पर अगर लाइन बन जाती है, तो वह असली दूध है, अगर लाइन नहीं बनती है, तो वह नकली दूध है।
सिंथेटिक दूध से बचने के लिए यह बरतें सावधानी
- लाइसेंसी दुकानदारों से ही दूध लें
- अगर लाइसेंसी दुकानदार नहीं है तो विश्वसनीय दूधिए से ही लें
- दूध लेने के पहले उंगली डुबोकर मिलावट देख सकते हैं
- अगर दूधिए का विश्वास कायम रखना चाहते हैं तो थोड़ा दूध लेकर पहले चेक करें, उसके बाद आवश्यकता के अनुरूप खरीदें
- अगर आवश्यक न हो तो होली के समय में दूध और दूध से बने पदार्थ का प्रयोग कम करें
बच्चों और गर्भवती महिलाओं को ज्यादा खतरा
सिंथेटिक दूध स्वास्थ्य के लिए बेहद हानिकारक होता है। खासकर बच्चों और गर्भवती महिलाओं को सिंथेटिक दूध अधिक नुकसान पहुंचाता है। गर्भवती महिला के गर्भस्थ शिशु का विकास शिथिल होने के साथ ही महिलाओं में ऊर्जा का क्षरण हो जाता है। छोटे बच्चे प्राय: फूड प्वाइजनिंग, उल्टी-दस्त के शिकार हो जाते हैं।
डॉ. अनिल गुप्ता, बाल रोग विशेषज्ञ।
फेल हो सकती है किडनी, सड़ सकती है आंत
सिंथेटिक दूध से किडनी फेल हो सकती हैं और आंत, फेफड़ों और गले में इंफेक्शन हो सकता है। दूध में रासायनिक मिलावट से आंत में घाव होने की आशंका बनी रहती है। भोजन की नली और गले में भी घाव हो सकता है। इलाज में देरी हुई तो बीमारी गंभीर रूप ले सकती है। ऐसे में जान भी जा सकती है। इसलिए महिलाओं, बुजुर्गों और बीमार लोगों को खास सावधानी बरतनी चाहिए।
डा. आरडी द्विवेदी, पूर्व फिजीशियन, जिला अस्पताल।
होली पर दोगुना से अधिक बढ़ जाती है दूध की डिमांड
जिले में होली पर दूध की डिमांड दोगुना से भी अधिक हो जाती है। दुग्ध विकास विभाग के आंकड़ों पर गौर किया जाए तो सामान्य दिनों में 8,663 लीटर प्रतिदिन दूध की मांग होती है। जबकि त्योहार पर यह मांग बढ़कर 17,395 लीटर प्रतिदिन हो जाती है। इसमें 4,814 लीटर बाहर के दूधियों और 3,918 लीटर दूध पैकेट बंद के रुप में बिक जाता है। ग्राहकों की मांग का फायदा उठाने के लिए अवैध कारोबारी सिंथेटिक दूध तैयार करते हैं।
सिंथेटिक दूध में ढाई गुना कमाते हैं मुनाफा
सिंथेटिक दूध को तैयार करने में कोई अधिक खर्च नहीं आता है। जानकारों की मानें तो एक सौ लीटर दूध तैयार करने में लगभग 1400 से 1600 रुपये का खर्च आता है। खुले बाजार में यही दूध चार से पांच हजार में आसानी से बिक जाता है। इस प्रकार मुनाफाखोर 1600 रुपये खर्च कर आसानी से पांच हजार रुपये कमा लेते हैं।
आवश्यकता के आगे गुणवत्ता नजरअंदाज
त्योहार पर बिकने वाले मिलावटी दूध पर लोगों को शंका तो रहती है, मगर आवश्यकता के आगे गुणवत्ता को नजरअंदाज कर देते हैं। शहर में मिलावटी दूध जांचने का कोई केंद्र भी नहीं है। जिस पर लोग विश्वास को मजबूती प्रदान कर सकें। त्योहार की खुशियां बांटने के लिए दूध खरीदना मजबूरी होती है।
जिले में मिलावटी दूध बिक रहा है। इस बात से शहर के लोग आशंकित तो रहते हैं, मगर खुलकर बोल नहीं पाते हैं। करनपुर निवासी रामकिशोर मिश्र बताते हैं कि मिलावटी दूध पर प्रतिबंध लगाना बहुत आवश्यक है। मगर जिला प्रशासन इस दिशा में कोई पहल नहीं करता है, जांच अभियान सिर्फ कागजी कोरम होता है।
ओएन पांडेय कहते हैं कि ग्राहक का हर तरह से शोषण किया जाता है। शहर में जो उपलब्ध होता है, उसी से काम चलाया जाता है। शफीक अंसारी की मानें तो यह मालूम है कि शहर में मिलावटी दूध का गिरोह सक्रिय है, मगर ग्राहक के सामने मजबूरी है कि वह किस पर विश्वास करें। अष्टभुजा नगर निवासी ममता श्रीवास्तव की मानें तो होली के त्योहार पर लगभग सभी पकवान दूध से तैयार होते हैं। अगर घर में गुझिया न बने तो त्योहार ही फीका होता है। ऐेसे में दूध के मिलावट की जांच करें, या अपनी जरूरत देखें। रिचा मोहनी कहती हैं कि अगर शहर में सिंथेटिक दूध बिक रहा है, तो जिला प्रशासन क्या कर रहा है। उसे कार्रवाई करनी चाहिए।