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दल बदलने वाले नेताओं को नहीं गली दाल
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विधानसभा चुनाव के दौरान टिकट की चाहत में दूसरे दलों का दामन थामने वाले नेताओं की आखिरकार दाल नहीं गली। पूर्व मंत्री, पूर्व विधायक समेत कई नेताओं ने चुनाव की घोषणा होने व पहले पाला बदल किया था। नामांकन के आखिरी दिन तक जोर आजमाइश के बाद भी निराशा ही उनके हाथ लगी है। दलबदल करने वाले केवल एक पूर्व विधायक को सपा ने दूसरे विधानसभा से अपना उम्मीदवार बनाया है।
विधानसभा चुनाव में टिकट के लिए सबसे ज्यादा मारामारी सपा और भाजपा में थी। टिकट की चाह में चुनाव के पहले से ही नेता पाला बदलने लगे। विश्वनाथगंज से अपना दल एस के विधायक अपनी पार्टी से नाता तोड़कर सपा में शामिल हो गए। चुनाव की घोषणा होने के बाद सपा से टिकट न मिलने पर कद्दावर नेता शिवाकांत ओझा ने पाला बदलते हुए भाजपा का दामन थाम लिया। हालांकि भाजपा ने भी उन्हें प्रत्याशी नहीं बनाया है। भाजपा नेता व पूर्व विधायक बृजेश मिश्र सौरभ भी टिकट की चाहत में सपा में शामिल हो गए। भाजपा नेता अश्वनी सोनी ने भी सपा की सदस्यता ग्रहण कर ली थी। बसपा के पूर्व विधायक रामशिरोमणि शुक्ला भी ऐन वक्त पर रानीगंज विधानसभा से चुनाव लड़ने के लिए पार्टी छोड़ते हुए भाजपा में शामिल हो गए थे।
हालांकि दल-बदल करने वाले अधिकांश नेताओं को आखिर में निराशा ही हाथ लगी। केवल विश्वनाथगंज के निवर्तमान विधायक को ही सपा ने रानीगंज से अपना प्रत्याशी बनाया है। भाजपा में शामिल होने वाले पूर्व मंत्री शिवाकांत ओझा और पूर्व विधायक रामशिरोमणि शुक्ला को करारा झटका लगा। दोनों नेता रानीगंज से प्रत्याशी बनाने की लालसा लेकर भाजपा में शामिल हुए थे। टिकट के लिए लखनऊ से दिल्ली तक भागदौड़ करते रहे। हर जतन किए, मगर कामयाबी नहीं मिली। पार्टी ने रानीगंज के विधायक अभय कुमार उर्फ धीरज ओझा पर विश्वास जताते हुए उन्हें फिर से प्रत्याशी बनाया। जिसके बाद दोनों नेताओं को करारा झटका लगा। पूर्व विधायक बृजेश मिश्र सौरभ को भी लगातार सदर या विश्वनाथगंज से प्रत्याशी बनाए जाने का आश्वासन मिलता रहा, मगर ऐन वक्त पर उन्हें भी टिकट नहीं मिला।
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भाजपा से अपना दल में शामिल हुए अश्वनी सोनी का सपना भी पूरा नहीं हो सका। सदर विधानसभा से सक्रिय अश्वनी सोनी ने नामांकन पत्र भी खरीद लिया था, मगर उन्हें टिकट नहीं मिला। यह सीट गठबंधन में अपना दल कमेरावादी के खाते में चली गई। रानीगंज से सपा की ओर से विनोद दुबे को प्रत्याशी बनाया गया था। वह भी 2017 के चुनाव में भाजपा प्रत्याशी के खेमे में थे। वह सपा में कब शामिल हुए, इसकी जानकारी लोगों को उनके प्रत्याशी बनने ेे बाद हो सकी। फिलहाल, टिकट के लिए दलबदल करने वाले नेताओं के अरमानों पर पानी फिर गया है।
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विधानसभा चुनाव में टिकट के लिए सबसे ज्यादा मारामारी सपा और भाजपा में थी। टिकट की चाह में चुनाव के पहले से ही नेता पाला बदलने लगे। विश्वनाथगंज से अपना दल एस के विधायक अपनी पार्टी से नाता तोड़कर सपा में शामिल हो गए। चुनाव की घोषणा होने के बाद सपा से टिकट न मिलने पर कद्दावर नेता शिवाकांत ओझा ने पाला बदलते हुए भाजपा का दामन थाम लिया। हालांकि भाजपा ने भी उन्हें प्रत्याशी नहीं बनाया है। भाजपा नेता व पूर्व विधायक बृजेश मिश्र सौरभ भी टिकट की चाहत में सपा में शामिल हो गए। भाजपा नेता अश्वनी सोनी ने भी सपा की सदस्यता ग्रहण कर ली थी। बसपा के पूर्व विधायक रामशिरोमणि शुक्ला भी ऐन वक्त पर रानीगंज विधानसभा से चुनाव लड़ने के लिए पार्टी छोड़ते हुए भाजपा में शामिल हो गए थे।
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हालांकि दल-बदल करने वाले अधिकांश नेताओं को आखिर में निराशा ही हाथ लगी। केवल विश्वनाथगंज के निवर्तमान विधायक को ही सपा ने रानीगंज से अपना प्रत्याशी बनाया है। भाजपा में शामिल होने वाले पूर्व मंत्री शिवाकांत ओझा और पूर्व विधायक रामशिरोमणि शुक्ला को करारा झटका लगा। दोनों नेता रानीगंज से प्रत्याशी बनाने की लालसा लेकर भाजपा में शामिल हुए थे। टिकट के लिए लखनऊ से दिल्ली तक भागदौड़ करते रहे। हर जतन किए, मगर कामयाबी नहीं मिली। पार्टी ने रानीगंज के विधायक अभय कुमार उर्फ धीरज ओझा पर विश्वास जताते हुए उन्हें फिर से प्रत्याशी बनाया। जिसके बाद दोनों नेताओं को करारा झटका लगा। पूर्व विधायक बृजेश मिश्र सौरभ को भी लगातार सदर या विश्वनाथगंज से प्रत्याशी बनाए जाने का आश्वासन मिलता रहा, मगर ऐन वक्त पर उन्हें भी टिकट नहीं मिला।
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भाजपा से अपना दल में शामिल हुए अश्वनी सोनी का सपना भी पूरा नहीं हो सका। सदर विधानसभा से सक्रिय अश्वनी सोनी ने नामांकन पत्र भी खरीद लिया था, मगर उन्हें टिकट नहीं मिला। यह सीट गठबंधन में अपना दल कमेरावादी के खाते में चली गई। रानीगंज से सपा की ओर से विनोद दुबे को प्रत्याशी बनाया गया था। वह भी 2017 के चुनाव में भाजपा प्रत्याशी के खेमे में थे। वह सपा में कब शामिल हुए, इसकी जानकारी लोगों को उनके प्रत्याशी बनने ेे बाद हो सकी। फिलहाल, टिकट के लिए दलबदल करने वाले नेताओं के अरमानों पर पानी फिर गया है।