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मुख्यालय से ही बनती थी प्रचार की रणनीति

Tue, 16 Apr 2019 07:31 PM IST
Allahabad Bureau इलाहाबाद ब्यूरो
Updated Tue, 16 Apr 2019 07:31 PM IST
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मुख्यालय से ही बनती थी प्रचार की रणनीति
मुख्यालय से ही बनती थी प्रचार की रणनीति
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प्रचार-प्रसार के लिए नहीं बनते थे विधानसभा क्षेत्रवार कार्यालय
ग्रामसभावार दी जाती थी जिम्मेदारी, साइकिल व इक्का से पदाधिकारी पहुंचते थे गांव
अमर उजाला ब्यूरो
प्रतापगढ़। पार्टी के पक्ष में माहौल बनाने व प्रत्याशी के प्रचार-प्रसार को लेकर पदाधिकारियों एवं कार्यकर्ताओं मेें जोश भी देखने लायक था, लेकिन तब न तो जगह-जगह कार्यालय थे और न ही संसाधन। चुनावी बिगुल बजते ही प्रत्याशी मुख्यालय पर कार्यालय खोल लेते थे। जहां से पूरे क्षेत्र के चुनावी माहौल पर नजर रखने के साथ प्रचार होता था। कार्यालय में प्रत्याशी, पार्टी पदाधिकारी व कार्यकर्ता संग समर्थक चुनाव जीतने के लिए रणनीति बनाते थे। चुनाव कार्यक्रम घोषित होते ही प्रचार के लिए कार्यकर्ताओं व समर्थकों को बुलाना नहीं पड़ता था। पदाधिकारी साइकिल व इक्के से गांवों की पड़ताल कर माहौल भांपते थे। जिले में आजादी के चार दशक बाद चुनावी प्रचार- प्रसार का तरीका बदला।
आजादी के बाद 1952 में हुए लोकसभा चुनाव के दौरान जिले में कांग्रेस, अखिल भारतीय रामराज परिषद, सोशलिस्ट पार्टी के कार्यालय की स्थापना हुई थी। तब कांग्रेस का दबदबा हुआ करता था। अन्य पार्टियां अपनी सियासी जमीन तैयार करने में जुटी थी। इसके लिए जिला कार्यकारिणी का गठन, बूथ स्तर पर कार्यकर्ताओं की तैनात किए जाते थे। लोकसभा चुनाव हो या विधानसभा चुनाव, प्रचार- प्रसार में पूरी रणनीति के साथ होते थे। सर्वोदय सद्भावना संस्थान के अध्यक्ष ओम प्रकाश पांडेय बताते है कि तब सभी पार्टियों का एक-एक कार्यालय हुआ करता था। मुख्यालय स्थित कार्यालय पर ही कार्यकर्ताओं की बैठक, पार्टी वरिष्ठ नेताओं की सभा यहां तक की चुनावी रणनीति भी यही से बनती थी। चुनाव प्रचार- प्रसार के लिए अलग से कोई कार्यालय नहीं खुलता था। चुनाव के एक महीने पहले ही कार्यकर्ताओं की एक बैठक कार्यालय पर होती थी और उसी दिन पदाधिकारियों एवं कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारी तय कर दी जाती। कार्यकर्ता गांव-गांव पैदल भ्रमण कर प्रचार- प्रसार करते थे। जबकि पदाधिकारी साइकिल व इक्के से माहौल भांपते। इसके बाद कार्यकर्ताओं से जानकारी लेते। 1952 से लेकर 1989 तक चुनाव- प्रचार का यही तरीका हुआ करता था। 1989 के बाद चुनाव प्रचार का तरीका बदलना शुरू हुआ।
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किराए पर ली जाती थी साइकिलें
चुनाव का माहौल भांपने के लिए जिले से पदाधिकारियों की टोली निकलती थी। पूर्व विधायक बाबूलाल श्रीवास्तव के पुत्र डा. अविनाश श्रीवास्तव बताते हैं कि यह टोली साइकिल से भ्रमण करती थी। साइकिल किराए पर ली जाती थी। शहर स्थित प्रकाश साइकिल स्टोर पर पार्टियों के पदाधिकारी संपर्क करते थे।
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कांग्रेस ने सबसे पहले शुरू किया कार्यालय का विस्तार
कांग्रेस पार्टी ने सबसे पहले कार्यालय का विस्तार करना शुरू किया। ओम प्रकाश पांडेय बताते है कि मुख्यालय के बाद दूसरा कार्यालय कांग्रेस पार्टी द्वारा लालगंज में स्थापित किया गया। 1989 के बाद कार्यालयों का विस्तार व प्रचार प्रसार का तरीका बदला।
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