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विंध्य की पहाडिय़ों से आए तेंदुए मचा रहे आतंक
Updated Fri, 19 Jan 2018 07:32 PM IST
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विंध्य की पहाड़ियों से आए तेंदुए मचा रहे आतंक
विंध्य, सतपुड़ा और शिवालिक की पहाड़ियों के खुले जंगलों में बहुतायत, भटककर पहुंचे यूपी के जिलों में
खनन से पहाड़ों के खत्म होने के कारण जंगल छोड़कर भाग रहे, कोहरे में भटक जाते हैं रास्ता
चंद्रप्रकाश उपाध्याय
प्रतापगढ़।
विंध्य की पहाड़ियों के खुले जंगलों से भटककर आए तेंदुए यूपी के पूर्वांचल, विंध्य और अवध के इलाकों में खौफ का पर्याय बन गए हैं। शिकार की तलाश में बस्तियों में पहुंचकर आतंक मचा रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि खनन से पहाड़ों के खत्म होने के कारण यह आसानी से मैदानी इलाकों में पहुंच रहे हैं। जाड़े के दिनों में कोहरे के कारण भी यह रास्ता भटक जा रहे हैं।
उत्तर प्रदेश से सटे मध्यप्रदेश की विंध्य, सतपुड़ा और शिवालिक की पहाड़ियों के बीच खुले जंगलों में तेंदुए बड़ी तादात में पाए जाते हैं। इलाहाबाद और मिर्जापुर से सटे मध्यप्रदेश के रीवा और मानिकपुर के आसपास के जंगलों में भी इनकी अच्छी खासी संख्या है। मिर्जापुर के पहाड़ी इलाके के गांवों में पहले से तेंदुए आते रहे हैं। इन्हें भगाने के लिए तब वनविभाग के लोग फायरिंग कराते थे। रात में आग जलवाई जाती थी। अब इन इलाकों में खनन के कारण पहाड़ खत्म होते जा रहे हैं। इसके चलते तेंदुए आसानी से मैदानी इलाकों में आ जा रहे हैं। जाड़े के दिनों कोहरे के कारण यह रास्ता भटक जाते हैं। जिसके चलते इनका आतंक इलाहाबाद, प्रतापगढ़, सुल्तानपुर, जौनपुर, फैजाबाद और लखनऊ तक पहुंच गया है। शिकार की तलाश में वह बस्तियों में पहुंच रहे हैं। डीएफओ वाईपी शुक्ला ने बताया कि तेंदुआ घुमंतू जानवर है। यह एक स्थान पर रहने के बजाए घूमता रहता है। यह बीच जंगल में कभी नहीं रहते हैं। जंगल के आखिरी हिस्से और आबादी के बीच वाले क्षेत्र में इनकी चहलकदमी ज्यादा रहती है। उत्तर प्रदेश के तराई क्षेत्र में गोरखपुर से पीलीभीत और सहारनपुर तक गन्ने वाले क्षेत्र में भी यह मिलते हैं। नवंबर के बाद गन्ना कटने और घास वाले क्षेत्रों के खत्म होने के कारण इनके छिपने का स्थान खुल जाता है, जिससे यह कोहरे में भटककर रिहायशी इलाकों में आ-जा रहे हैं। मध्यप्रदेश में मानिकपुर से सटे जंगलों में तेंदुओं की संख्या काफी ज्यादा है। गंगा के किनारे से होकर यह इलाहाबाद, प्रतापगढ़, सुल्तानपुर तक पहुंच जा रहे हैं।
तेंदुए के साथ चलते हैं शाडवक
तेंदुआ ऐसा जानवर है जिसे बच्चे को जन्म देने के लिए भी बहुत स्थान की जरूरत नहीं होती है। यह कहीं भी बच्चों को जन्म दे देते हैं। शुरू में यह शावकों को मुंह से दबाकर इधर-उधर करते हैं। एक महीने के बाद शावक चलना शुरू कर देते हैं। तब तेंदुए इन्हें साथ लेकर चलते हैं।
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बंदर, कुत्ता और सुअर का मांस प्रिय भोजन
तेंदुए कुत्ता, बंदर और सुअर का ही ज्यादातर शिकार करते हैं। भोजन के लिए यह इन्हीं जानवरों पर निर्भर होते हैं। कुत्तों का शिकार करने के चक्कर में ही यह आबादी वाले क्षेत्रों में जाते हैं। डीएफओ वाईपी शुक्ला के मुताबिक एक स्वस्थ तेंदुए की खुराक 20 से 22 किलो के बीच होती है। यह सप्ताह में एक बार शिकार करते हैं और एक बार में सारा मांस खाने के बजाए उसे तीन दिनों तक लगातार खाते हैं। आगे के चार दिनों में चलकर या दौड़कर पाचन करते हैं। खास बात यह है कि तेंदुए कभी भी दिन में शिकार नहीं करते। दिनभर कहीं छिपे रहते हैं और रात में शिकार के लिए निकलते हैं।
लालची होते हैं तेंदुए, बिना भूख लगे भी करते हैं शिकार
शेर के मुकाबले तेंदुआ लालची होता है। शेर भूख लगने के बाद किसी जानवर का शिकार करने के बाद दोबारा फिर जानवरों पर हमला नहीं बोलता। जबकि तेंदुआ किसी भी वक्त जानवरों पर हमला बोल देता है। यह शिकार करने के बाद रुकता भी नहीं है। तुरंत निकल जाता है। करीब 6 से 7 किलोमीटर आगे जाने के बाद दूसरा शिकार करता है।
खुद को खतरा महसूस होने पर मनुष्य पर बोलते हैं हमला
तेंदुए सामान्य स्थितियों में मनुष्य पर हमला नहीं बोलते हैं, लेकिन अगर उन्हें खुद को खतरा महसूस हुआ तो वह तुरंत अटैक कर देते हैं। सबसे पहले यह आदमी की गर्दन पकड़ते हैं, फिर पंजे और दांत से वार करते हैं। इनके हमले के दौरान मनुष्य की गर्दन टूटने का खतरा रहता है। ऐसे में कहीं भी तेंदुआ दिखने पर तुरंत वनविभाग को सूचना दें। तेंदुए की मौजूदगी की आशंका में दो-तीन लोग साथ जाएं। समूह देखकर आवाज सुनने के बाद यह भाग जाते हैं। आग से भी बहुत डरते हैं।
यूपी मेें तेेंदुआ पकड़ने के मात्र 21 स्पेशलिस्ट
ट्रैंकुलाइज कर तेंदुए को पकड़ने की ट्रेनिंग वनविभाग के सभी कर्मचारियों को नहीं दी जाती है। दरअसल तेंदुए को बेहोश कर पकड़ने के लिए ‘जाइलाजीन’ लिक्विड गन के सहारे उसके शरीर में पहुंचाया जाता है। यह पूरी तरह से प्रतिबंधित है। ‘जाइलाजीन’ केवल नेशनल पार्क और सेंचुरी के डाक्टरों के पास होता है। आम आदमी के हाथ में आने पर इसके दुरुपयोग की आशंका रहती है। यही कारण है कि तेेंदुआ दिखने पर उसे पकड़ने के लिए बाहर से लोगों को बुलाना पड़ता है। प्रदेश में इसके लिए सिर्फ 21 प्रशिक्षित लोग हैं। इनमें तीन कानपुर और दो लखनऊ में हैं। ट्रैंकुलाइज गन से 70 मीटर तक निशाना साधा जाता है।
फुटमार्क और शिकार करने के तरीके से होती है पहचान
तेंदुए के किसी क्षेत्र में होने की पुष्टि उसके शिकार करने के तरीके और पैरों के निशान से होती है। मल से भी इनकी पहचान की जाती है। इनके पैरों के निशान विशेष तरह के होते हैं। अगले पैरों के निशान अलग और पिछले पैरों के निशान अलग होते हैं। इन्हीं से मिलते जुलते निशान लकड़बग्घे के भी होते हैं।
प्रतापगढ़ में अब तक दो तेंदुए आए सामने
जिले में अब तक दो ही तेंदुए सामने आ सके हैं। हालांकि उनके देखे जाने और चहलकदमी को लेकर पिछले दो महीनों से हर दिन हल्ला मच रहा है। पहली बार बाघराय बाजार में 10 नवंबर को तेंदुआ देखा गया था। वह एक आदमी के घर में घुस गया। रातभर वहीं गैलरी में फंसा रहा। वनविभाग की टीम ने उसे ट्रैंकुलाइज कर पकड़ा था। इस दौरान उसने चार ग्रामीणों पर हमला बोला था। दूसरी बार 11 दिसंबर को बाघराय के बूढ़ेपुर गांव में तेंदुआ दिखा। उसने हमला बोलकर पांच लोगों को जख्मी कर दिया था। इसके बाद वह एक सूखे कुएं में जाकर छिप गया। ग्रामीणों ने पुआल और लकड़ी डालकर उसे जिंदा जला दिया था। इसके बाद से हर दिन कुंडा और बाघराय इलाके के अलग-अलग गांवों में तेंदुए के देखे जाने और जानवरों पर हमला करने की घटनाएं सामने आ रही हैं। वनविभाग की टीम भी मान रही है कि इस इलाके में अभी और तेंदुए हैं। इसके लिए वनविभाग ने बाघराय में कंट्रोलरूम बना दिया है। लगातार कांबिंग की जा रही है, लेकिन अभी तक तेंदुए को पकड़ने में सफलता नहीं मिल सकी है।
विंध्य, सतपुड़ा और शिवालिक की पहाड़ियों के खुले जंगलों में बहुतायत, भटककर पहुंचे यूपी के जिलों में
खनन से पहाड़ों के खत्म होने के कारण जंगल छोड़कर भाग रहे, कोहरे में भटक जाते हैं रास्ता
चंद्रप्रकाश उपाध्याय
प्रतापगढ़।
विंध्य की पहाड़ियों के खुले जंगलों से भटककर आए तेंदुए यूपी के पूर्वांचल, विंध्य और अवध के इलाकों में खौफ का पर्याय बन गए हैं। शिकार की तलाश में बस्तियों में पहुंचकर आतंक मचा रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि खनन से पहाड़ों के खत्म होने के कारण यह आसानी से मैदानी इलाकों में पहुंच रहे हैं। जाड़े के दिनों में कोहरे के कारण भी यह रास्ता भटक जा रहे हैं।
उत्तर प्रदेश से सटे मध्यप्रदेश की विंध्य, सतपुड़ा और शिवालिक की पहाड़ियों के बीच खुले जंगलों में तेंदुए बड़ी तादात में पाए जाते हैं। इलाहाबाद और मिर्जापुर से सटे मध्यप्रदेश के रीवा और मानिकपुर के आसपास के जंगलों में भी इनकी अच्छी खासी संख्या है। मिर्जापुर के पहाड़ी इलाके के गांवों में पहले से तेंदुए आते रहे हैं। इन्हें भगाने के लिए तब वनविभाग के लोग फायरिंग कराते थे। रात में आग जलवाई जाती थी। अब इन इलाकों में खनन के कारण पहाड़ खत्म होते जा रहे हैं। इसके चलते तेंदुए आसानी से मैदानी इलाकों में आ जा रहे हैं। जाड़े के दिनों कोहरे के कारण यह रास्ता भटक जाते हैं। जिसके चलते इनका आतंक इलाहाबाद, प्रतापगढ़, सुल्तानपुर, जौनपुर, फैजाबाद और लखनऊ तक पहुंच गया है। शिकार की तलाश में वह बस्तियों में पहुंच रहे हैं। डीएफओ वाईपी शुक्ला ने बताया कि तेंदुआ घुमंतू जानवर है। यह एक स्थान पर रहने के बजाए घूमता रहता है। यह बीच जंगल में कभी नहीं रहते हैं। जंगल के आखिरी हिस्से और आबादी के बीच वाले क्षेत्र में इनकी चहलकदमी ज्यादा रहती है। उत्तर प्रदेश के तराई क्षेत्र में गोरखपुर से पीलीभीत और सहारनपुर तक गन्ने वाले क्षेत्र में भी यह मिलते हैं। नवंबर के बाद गन्ना कटने और घास वाले क्षेत्रों के खत्म होने के कारण इनके छिपने का स्थान खुल जाता है, जिससे यह कोहरे में भटककर रिहायशी इलाकों में आ-जा रहे हैं। मध्यप्रदेश में मानिकपुर से सटे जंगलों में तेंदुओं की संख्या काफी ज्यादा है। गंगा के किनारे से होकर यह इलाहाबाद, प्रतापगढ़, सुल्तानपुर तक पहुंच जा रहे हैं।
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तेंदुए के साथ चलते हैं शाडवक
तेंदुआ ऐसा जानवर है जिसे बच्चे को जन्म देने के लिए भी बहुत स्थान की जरूरत नहीं होती है। यह कहीं भी बच्चों को जन्म दे देते हैं। शुरू में यह शावकों को मुंह से दबाकर इधर-उधर करते हैं। एक महीने के बाद शावक चलना शुरू कर देते हैं। तब तेंदुए इन्हें साथ लेकर चलते हैं।
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तेंदुए कुत्ता, बंदर और सुअर का ही ज्यादातर शिकार करते हैं। भोजन के लिए यह इन्हीं जानवरों पर निर्भर होते हैं। कुत्तों का शिकार करने के चक्कर में ही यह आबादी वाले क्षेत्रों में जाते हैं। डीएफओ वाईपी शुक्ला के मुताबिक एक स्वस्थ तेंदुए की खुराक 20 से 22 किलो के बीच होती है। यह सप्ताह में एक बार शिकार करते हैं और एक बार में सारा मांस खाने के बजाए उसे तीन दिनों तक लगातार खाते हैं। आगे के चार दिनों में चलकर या दौड़कर पाचन करते हैं। खास बात यह है कि तेंदुए कभी भी दिन में शिकार नहीं करते। दिनभर कहीं छिपे रहते हैं और रात में शिकार के लिए निकलते हैं।
लालची होते हैं तेंदुए, बिना भूख लगे भी करते हैं शिकार
शेर के मुकाबले तेंदुआ लालची होता है। शेर भूख लगने के बाद किसी जानवर का शिकार करने के बाद दोबारा फिर जानवरों पर हमला नहीं बोलता। जबकि तेंदुआ किसी भी वक्त जानवरों पर हमला बोल देता है। यह शिकार करने के बाद रुकता भी नहीं है। तुरंत निकल जाता है। करीब 6 से 7 किलोमीटर आगे जाने के बाद दूसरा शिकार करता है।
खुद को खतरा महसूस होने पर मनुष्य पर बोलते हैं हमला
तेंदुए सामान्य स्थितियों में मनुष्य पर हमला नहीं बोलते हैं, लेकिन अगर उन्हें खुद को खतरा महसूस हुआ तो वह तुरंत अटैक कर देते हैं। सबसे पहले यह आदमी की गर्दन पकड़ते हैं, फिर पंजे और दांत से वार करते हैं। इनके हमले के दौरान मनुष्य की गर्दन टूटने का खतरा रहता है। ऐसे में कहीं भी तेंदुआ दिखने पर तुरंत वनविभाग को सूचना दें। तेंदुए की मौजूदगी की आशंका में दो-तीन लोग साथ जाएं। समूह देखकर आवाज सुनने के बाद यह भाग जाते हैं। आग से भी बहुत डरते हैं।
यूपी मेें तेेंदुआ पकड़ने के मात्र 21 स्पेशलिस्ट
ट्रैंकुलाइज कर तेंदुए को पकड़ने की ट्रेनिंग वनविभाग के सभी कर्मचारियों को नहीं दी जाती है। दरअसल तेंदुए को बेहोश कर पकड़ने के लिए ‘जाइलाजीन’ लिक्विड गन के सहारे उसके शरीर में पहुंचाया जाता है। यह पूरी तरह से प्रतिबंधित है। ‘जाइलाजीन’ केवल नेशनल पार्क और सेंचुरी के डाक्टरों के पास होता है। आम आदमी के हाथ में आने पर इसके दुरुपयोग की आशंका रहती है। यही कारण है कि तेेंदुआ दिखने पर उसे पकड़ने के लिए बाहर से लोगों को बुलाना पड़ता है। प्रदेश में इसके लिए सिर्फ 21 प्रशिक्षित लोग हैं। इनमें तीन कानपुर और दो लखनऊ में हैं। ट्रैंकुलाइज गन से 70 मीटर तक निशाना साधा जाता है।
फुटमार्क और शिकार करने के तरीके से होती है पहचान
तेंदुए के किसी क्षेत्र में होने की पुष्टि उसके शिकार करने के तरीके और पैरों के निशान से होती है। मल से भी इनकी पहचान की जाती है। इनके पैरों के निशान विशेष तरह के होते हैं। अगले पैरों के निशान अलग और पिछले पैरों के निशान अलग होते हैं। इन्हीं से मिलते जुलते निशान लकड़बग्घे के भी होते हैं।
प्रतापगढ़ में अब तक दो तेंदुए आए सामने
जिले में अब तक दो ही तेंदुए सामने आ सके हैं। हालांकि उनके देखे जाने और चहलकदमी को लेकर पिछले दो महीनों से हर दिन हल्ला मच रहा है। पहली बार बाघराय बाजार में 10 नवंबर को तेंदुआ देखा गया था। वह एक आदमी के घर में घुस गया। रातभर वहीं गैलरी में फंसा रहा। वनविभाग की टीम ने उसे ट्रैंकुलाइज कर पकड़ा था। इस दौरान उसने चार ग्रामीणों पर हमला बोला था। दूसरी बार 11 दिसंबर को बाघराय के बूढ़ेपुर गांव में तेंदुआ दिखा। उसने हमला बोलकर पांच लोगों को जख्मी कर दिया था। इसके बाद वह एक सूखे कुएं में जाकर छिप गया। ग्रामीणों ने पुआल और लकड़ी डालकर उसे जिंदा जला दिया था। इसके बाद से हर दिन कुंडा और बाघराय इलाके के अलग-अलग गांवों में तेंदुए के देखे जाने और जानवरों पर हमला करने की घटनाएं सामने आ रही हैं। वनविभाग की टीम भी मान रही है कि इस इलाके में अभी और तेंदुए हैं। इसके लिए वनविभाग ने बाघराय में कंट्रोलरूम बना दिया है। लगातार कांबिंग की जा रही है, लेकिन अभी तक तेंदुए को पकड़ने में सफलता नहीं मिल सकी है।