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लॉकडाउन में बेरोजगारीः दिल्ली-हरियाणा और उत्तराखंड में बरसों सीखे हुनर की गांव में नहीं कद्र

Sun, 26 Apr 2020 12:37 AM IST
Bareily Bureau बरेली ब्यूरो
Updated Sun, 26 Apr 2020 12:37 AM IST
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unemployeement in lockdown
पीलीभीत/ बीसलपुर/पूरनपुर। वर्षों से पहले गांव के युवक कुछ नया करने के इरादे से दिल्ली, हरियाणा और उत्तराखंड में चले गए। वहां उन्हें प्राइवेट कंपनियों में अपने लायक काम भी मिल गया। उसमें वे रोजगार के नए हुनर भी सीख गए। मगर, जब देश में लॉकडाउन लग गया तो उन्हें अपने गांव फिर वापस आना पड़ गया। अब गांव में आकर यह युवा बेकार हो गए। दिल्ली एनसीआर, हरियाणा और उत्तराखंड की कंपनियों में वर्षों रहकर नया हुनर सीखने वाले इन युवाओं की इस योग्यता की गांव में कोई कद्र नहीं है। यहां आकर यह सब बेरोजगार हो गए।
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बीसलपुर और पूरनपुर क्षेत्र के दर्जनों गांवों के हजारों की संख्या में लोग दिल्ली एनसीआर, हरियाणा, गाजियाबाद, गुड़गांव, उत्तराखंड के रुद्रपुर, नैनीताल, लालकुआं में वर्षों से रहकर मजदूरी करते थे। कम पढ़े लिखे होने के बावजूद यह युवा छह महीने या साल भर में एक या दो बार त्योहारों के समय गांव आते थे तो यहां चौपालों पर बड़े बुजुर्गों को अपनी हर महीने होने वाली कमाई बढ़ा चढ़ाकर बताते थे। इनसे गांव में अधिकांश लोग प्रभावित होकर अपने बच्चों को भी कहीं नौकरी दिलाने की कहने लगते थे। कोरोना के फैलते संक्रमण के लॉकडाउन के बाद सबको प्राइवेट कंपनियों ने निकाल दिया। अब बड़ी संख्या में बेरोजगार मजदूर या छोटा मोटा रोजगार करने वाले युवा गांव पहुंच गए हैं। यहां इनके लायक काम नहीं है। अगर काम है तो तुरंत पैसा नहीं मिलता। जैसे-मनरेगा में अगर गांव में चकरोड या तालाब खोदने का काम मिल जाए तो वे इनसे होता नहीं क्योंकि बाहर रहकर इनमें से कोई ऑटो चलाता था तो कोई सिलाई करके महीने में खासी आमदनी करता था। बाहर रहकर इन युवाओं के अंदर एक अलग तरह का हुनर आ गया था। मगर, गांव में इनका यह हुनर बेकार हो गया क्योंकि यहां तो गेहूं काटने या गन्ने की छिलाई या गुढ़ाई करने का काम है। यह सब इनसे होता नहीं क्योंकि इस काम की आदत अब युवाओं से छूट चुकी है।
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इन गांव के हजारों युवा बेरोजगार
रंभोजा, परसिया, खनंका, नवदिया, सितारगंज, मीरपुर वाहनपुर, पहाड़गंज, रिछोला सबल, महादेवा, लुहिचा, हरूनगला, गजरौला, रसायाखानपुर, हाफिजनगर, चंद्रपुरा, अमृता खास, भंसूड़ा, रढ़ैता, टिकरी, जोगीठेर, साबेपुर, भड़रिया, चुटकुना, कंधरापुर, मोहम्मदपुर, बैरा, खरगापुर, कुमरिखा, सफौरा, देवकलियां, मधवापुर, चठिया सेवाराम, दौलतपुर, रोहनिया, महुआ, खानपुर वीरमपुर, रढ़ैता, खांडेपुर, रंपुरारना, बरसिया, उगनपुर मरौरी, नगीपुर अखौला, अहिरवाड़ा, दुवहा, अर्जुनपुर, जसोली, दीवाली, कासिमपुर और ढकिया रंजीत आदि गांवों के हजारों की संख्या में युवा बेरोजगार हो गए।
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मैं नोएडा की एक प्राइवेट कंपनी में पैकिंग का काम पिछले नौ बरसों से कर रहा था। वहां हर महीने अच्छी खासी कमाई हो जाती थी। उसे घर पर भी भेजा था। गांव में इस तरह का काम नहीं है। -पृथ्वीराज मौर्य, गांव हरूनगला
मैं दिल्ली में डिश एंटीना की एक प्राइवेट कंपनी में पिछले 11 वर्षों से रंगाई का काम कर रहा था। हर महीने बहुत अच्छी कमाई होती थी। अब घर में हाथ पर हाथ धरे बैठा हूं। -जाकिर खां गांव नवदिया
मैं पटियाला की एक दवा कंपनी में पैकिंग करने का काम पिछले 14 वर्षों से कर रहा था। लॉकडाउन होते ही घर आ गया हूं। गांव में आकर पूरी तरह बेरोजगार हो गया। आमदनी भी बंद है। -जितेंद्र कुमार गांव परसिया
मैं मुरादाबाद में बर्तन की एक कंपनी में डिजाइनिंग का काम सात वर्षों से कर रहा था। लॉकडाउन होते ही कंपनी वाले ने निकाल दिया। कमाई बंद हो गई। घर आकर बेकार हो गया हूं। -अतुल सिंह गांव खनंका
मैं रुद्रपुर की एक प्लाईवुड फैक्ट्री में 10 वर्षों से खिलौने बनाने का काम कर रहा था। लॉकडाउन होते ही फैक्ट्री मालिक ने घर का रास्ता दिखा दिया। अब घर में केवल खर्चा कर रहे हैं। आमदनी बंद है। -अमित कुमार, गांव सितारगंज
टनकपुर में मजदूरी कर रहे थे। होली पर घर आए। वापस जाते, तब तक देश में लॉकडाउन हो गया। वहां अच्छी कमाई हो जाती थी। अब गांव में तो मजदूरी भी नहीं मिल रही है। -अनिल कुुमार, अमरैयाकलां
कुछ लोगों के साथ मजदूरी करने आगरा गया था। वहां 400 रुपये रोज की दिहाड़ी थी। सब कुछ ठीक चल रहा था। दोबारा नहीं जा सके। अब गांव में तो इतने की मजदूरी नहीं मिल सकती। -रामवीर, अमरैयाकलां
हिमाचल प्रदेश में एक फैक्ट्री में क्रीम पाउडर की पैकिंग करने पर 400 रुपये रोज मिलते थे। आठ घंटे काम करके कमरे पर पहुंच जाते थे। अब गांव में इतने रुपये की मजदूरी कहां रखी। - चुन्ने, भगवंतापुर

जयपुर में हेयर कटिंग की दुकान पर कारीगर था। रोजाना 500 रुपये मिल जाते थे। लॉकडाउन में बाल काटने की दुकानें बंद हैं। गांव में कौन इतने महंगे बाल कटवाता है। कमाई बंद है। खर्च रोज हो रहा है। -इकरामुद्दीन, भगवंतापुर
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