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रोमानिया बार्डर पार करना किसी जंग से नहीं था कम, 14 घंटे लगे
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घर पहुंच कर अपनी मां से मिलता सार्थक सक्सेना। संवाद
- फोटो : PILIBHIT
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पीलीभीत। मझोला निवासी सार्थक सक्सेना यूक्रेन से रोमानिया होते हुए मंगलवार को रात एक बजे दिल्ली पहुंचे। दिल्ली से बुधवार सुबह नौ बजे अपने घर पहुंच गए। पूरा परिवार भावुक हो उठा। आंखों में आंसू आ गए। तिलक करके पहले सार्थक का स्वागत किया फिर किसी ने गले लगाया तो किसी ने सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद दिया। सार्थक ने बताया कि युद्धक्षेत्र से बाहर निकलकर रोमानिया बॉर्डर पहुंचना भी किसी जंग से कम नहीं था।
सार्थक टरनोपिल नेशनल यूनिवर्सिटी में एमबीबीएस तृतीय वर्ष के विद्यार्थी हैं। सार्थक ने बताया कि टरनोपिल से 26 फरवरी को वह अपने दोस्तों के साथ निजी वाहन करके किसी तरह से रोमानिया बॉर्डर तो पहुंच गए। लेकिन सबसे अधिक दिक्कत बॉर्डर का गेट पार करने में हुई। करीब 14 घंटे लगे। वह यूक्रेन में खड़े थे। सामने रोमानिया बार्डर का गेट था। बॉर्डर पार करने के लिए यूक्रेन समेत कई देशों के हजारों लोग जमा थे। लेकिन वहां बॉर्डर पार करने का कोई सिस्टम नहीं था। लोगों की संख्या लगातार बढ़ रही थी। हर व्यक्ति को बार्डर पार करने की जल्दी थी। हर आधा एक घंटे में कुछ देर के लिए बार्डर के द्वार का एक छोटा सा हिस्सा खुलता था और बड़े मुश्किल में लोग अपने पासपोर्ट दिखाकर पार कर पाते थे। एक बार जब रोमानिया के सैनिकों ने गेट बंद करना चाहा तो मेरे दोस्त बुलंदशहर के आदित्य सैनी ने गेट पकड़ लिया। इससे खींचतान हुई। बड़े मुश्किल में उसे प्रवेश मिल सका। कई बार वहां जब बॉर्डर पार करने के लिए लोगों में खींचतान होती तो यूक्रेनी सैनिक किसी को राहत देने के बजाए उल्टे पीटने लगते।
बुधवार को सार्थक जब घर पहुंचे तो दादी प्रभा सक्सेना और मां रचना सक्सेना की आंखों में खुशी के आंसू आ गए। दादी ने सिर पर हाथ रखा। नानी कुसुमलता, मामा राजीव सक्सेना, मामी भी पहुंचे।
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भीषण ठंड और भीड़ का झुंड, सबको थी जल्दी
सार्थक सक्सेना ने बताया कि बॉर्डर पर शून्य से नीचे तापमान था। भीषण सर्दी और भीड़ का झुंड था। न खाने का इंतजाम न पीने के लिए पानी। 14 घंटे में एक बोतल पानी और एक कटलेट खाकर काम चलाया। मौके पर यूक्रेन के भी तमाम लोग थे, जो अपना देश छोड़कर सुरक्षित निकलना चाहते थे। इसके अलावा कई देशों के छात्र थे। अपने देश जाने की जल्दी में हंगामा हो रहा था। कोई किसी की सुनने को राजी न था। भारतीय दूतावास के दो कर्मचारी थे। पहले वह कह रहे थे कि बॉर्डर पार कराएंगे लेकिन मौके पर वह कोई इंतजाम नहीं करा सके। बॉर्डर पार कर जब वह रोमानिया की राजधानी बुखारेस्ट पहुंचे तो वहां पर भारतीय दूतावास की ओर से भोजन से लेकर ठहरने तक के बेहतर इंतजाम किए गए थे।
सामने दग रहीं मिसाइलें, उठ रहा धुआं, हालात मुश्किल
पीलीभीत। खारकीव मेट्रो स्टेशन में जान बचाने के लिए शरण लिए अंशुल गुप्ता ने अपने भाई को बताया कि 200 मीटर की दूरी पर धमाके हो रहे हैं। धुआं उठ रहा है। हालात मुश्किल हैं।
बसुंधरा कॉलोनी निवासी विनोद कुमार गुप्ता का बेटा अंशुल गुप्ता दिसंबर 2021 में यूक्रेन गया था। खारकीव मेडिकल यूनिवर्सिटी में एमबीबीएस प्रथम वर्ष का विद्यार्थी है। अंशुल ने अपने बड़े भाई अर्पित गुप्ता से बुधवार को दिन में साढ़े 11 बजे व्हाट्सएप पर बातचीत की। अंशुल ने वहां का मंजर बयान किया है। बताया कि सुबह छह बजे कर्फ्यू खुला तो भारतीय झंडा लेकर वह और उसके साथ 300 विद्यार्थी खारकीव रेलवे स्टेशन पहुंचे। वहां से बुद्धापीस्ट के लिए ट्रेन पकड़नी थी। स्टेशन पर हजारों लोग थे। ट्रेन आई तो भारतीयों को चढ़ने नहीं दिया गया। जब चढ़ने की जिद की तो यूक्रेन की सेना ने हवाई फायर कर सबको भगा दिया।
पास में स्थित एक मेट्रो स्टेशन में उसने और उसके साथ भारतीय विद्यार्थियों ने शरण ली है। खारकीव और कीव को जल्द से जल्द खाली करने के एलान पहले ही हो चुके हैं। इसी वजह से सभी भारतीय हास्टल छोड़कर निकल चुके हैं। विद्यार्थी रोमानिया बॉर्डर पहुंचना चाहते हैं, जो 1200-1400 किलोमीटर दूर है। इसके लिए साधन अपने स्तर से जुटाने की चुनौती है। कर्फ्यू में वाहन कैसे मिले, इस पर कोई सोचने वाला नहीं है। भारत सरकार की ओर से भी कोई उपाय ऐसा नहीं किया गया, जिससे बच्चे वहां खुद को सुरक्षित महसूस कर सकें।
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सार्थक टरनोपिल नेशनल यूनिवर्सिटी में एमबीबीएस तृतीय वर्ष के विद्यार्थी हैं। सार्थक ने बताया कि टरनोपिल से 26 फरवरी को वह अपने दोस्तों के साथ निजी वाहन करके किसी तरह से रोमानिया बॉर्डर तो पहुंच गए। लेकिन सबसे अधिक दिक्कत बॉर्डर का गेट पार करने में हुई। करीब 14 घंटे लगे। वह यूक्रेन में खड़े थे। सामने रोमानिया बार्डर का गेट था। बॉर्डर पार करने के लिए यूक्रेन समेत कई देशों के हजारों लोग जमा थे। लेकिन वहां बॉर्डर पार करने का कोई सिस्टम नहीं था। लोगों की संख्या लगातार बढ़ रही थी। हर व्यक्ति को बार्डर पार करने की जल्दी थी। हर आधा एक घंटे में कुछ देर के लिए बार्डर के द्वार का एक छोटा सा हिस्सा खुलता था और बड़े मुश्किल में लोग अपने पासपोर्ट दिखाकर पार कर पाते थे। एक बार जब रोमानिया के सैनिकों ने गेट बंद करना चाहा तो मेरे दोस्त बुलंदशहर के आदित्य सैनी ने गेट पकड़ लिया। इससे खींचतान हुई। बड़े मुश्किल में उसे प्रवेश मिल सका। कई बार वहां जब बॉर्डर पार करने के लिए लोगों में खींचतान होती तो यूक्रेनी सैनिक किसी को राहत देने के बजाए उल्टे पीटने लगते।
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बुधवार को सार्थक जब घर पहुंचे तो दादी प्रभा सक्सेना और मां रचना सक्सेना की आंखों में खुशी के आंसू आ गए। दादी ने सिर पर हाथ रखा। नानी कुसुमलता, मामा राजीव सक्सेना, मामी भी पहुंचे।
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भीषण ठंड और भीड़ का झुंड, सबको थी जल्दी
सार्थक सक्सेना ने बताया कि बॉर्डर पर शून्य से नीचे तापमान था। भीषण सर्दी और भीड़ का झुंड था। न खाने का इंतजाम न पीने के लिए पानी। 14 घंटे में एक बोतल पानी और एक कटलेट खाकर काम चलाया। मौके पर यूक्रेन के भी तमाम लोग थे, जो अपना देश छोड़कर सुरक्षित निकलना चाहते थे। इसके अलावा कई देशों के छात्र थे। अपने देश जाने की जल्दी में हंगामा हो रहा था। कोई किसी की सुनने को राजी न था। भारतीय दूतावास के दो कर्मचारी थे। पहले वह कह रहे थे कि बॉर्डर पार कराएंगे लेकिन मौके पर वह कोई इंतजाम नहीं करा सके। बॉर्डर पार कर जब वह रोमानिया की राजधानी बुखारेस्ट पहुंचे तो वहां पर भारतीय दूतावास की ओर से भोजन से लेकर ठहरने तक के बेहतर इंतजाम किए गए थे।
सामने दग रहीं मिसाइलें, उठ रहा धुआं, हालात मुश्किल
पीलीभीत। खारकीव मेट्रो स्टेशन में जान बचाने के लिए शरण लिए अंशुल गुप्ता ने अपने भाई को बताया कि 200 मीटर की दूरी पर धमाके हो रहे हैं। धुआं उठ रहा है। हालात मुश्किल हैं।
बसुंधरा कॉलोनी निवासी विनोद कुमार गुप्ता का बेटा अंशुल गुप्ता दिसंबर 2021 में यूक्रेन गया था। खारकीव मेडिकल यूनिवर्सिटी में एमबीबीएस प्रथम वर्ष का विद्यार्थी है। अंशुल ने अपने बड़े भाई अर्पित गुप्ता से बुधवार को दिन में साढ़े 11 बजे व्हाट्सएप पर बातचीत की। अंशुल ने वहां का मंजर बयान किया है। बताया कि सुबह छह बजे कर्फ्यू खुला तो भारतीय झंडा लेकर वह और उसके साथ 300 विद्यार्थी खारकीव रेलवे स्टेशन पहुंचे। वहां से बुद्धापीस्ट के लिए ट्रेन पकड़नी थी। स्टेशन पर हजारों लोग थे। ट्रेन आई तो भारतीयों को चढ़ने नहीं दिया गया। जब चढ़ने की जिद की तो यूक्रेन की सेना ने हवाई फायर कर सबको भगा दिया।
पास में स्थित एक मेट्रो स्टेशन में उसने और उसके साथ भारतीय विद्यार्थियों ने शरण ली है। खारकीव और कीव को जल्द से जल्द खाली करने के एलान पहले ही हो चुके हैं। इसी वजह से सभी भारतीय हास्टल छोड़कर निकल चुके हैं। विद्यार्थी रोमानिया बॉर्डर पहुंचना चाहते हैं, जो 1200-1400 किलोमीटर दूर है। इसके लिए साधन अपने स्तर से जुटाने की चुनौती है। कर्फ्यू में वाहन कैसे मिले, इस पर कोई सोचने वाला नहीं है। भारत सरकार की ओर से भी कोई उपाय ऐसा नहीं किया गया, जिससे बच्चे वहां खुद को सुरक्षित महसूस कर सकें।