{"_id":"a126d5e94e49df1ebd5625961df24797","slug":"remember-the-rules-comes-after-incidents-hindi-news","type":"story","status":"publish","title_hn":"हादसों के बाद आती हैं नियमों की याद","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
हादसों के बाद आती हैं नियमों की याद
Pilibhit
Updated Fri, 10 Jul 2015 11:23 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
जिले के तमाम प्राइवेट स्कूलों में बच्चों को लाने और ले जाने के लिए लगे वाहन शासन से जारी नियमों का खुलेआम उल्लंघन कर रहे हैं। ट्रैफिक पुलिस और एआरटीओ विभाग को बड़ा हादसा होने के बाद नियमों और वाहनों की जांच करने की याद आती है। स्कूली वाहनों वाले बच्चों को ठूस-ठूसकर भरते हैं। इनमें ज्यादातर स्कूलों के वाहनों के स्थिति बदहाल है।
विज्ञापन
जब कभी स्कूली वाहनों से हादसे होते हैं तो पुलिस और एआरटीओ को यातायात नियमों की याद आती है। जिम्मेदार विभाग कुछ डग्गामार वाहनों पर कार्रवाई करके अपना गुडवर्क दिखा देते हैं। पिछले शैक्षिक सत्र में बिलसंडा में स्कूली बस की चादर निकलने से एक मासूम छात्र की चलती बस से नीचे गिरकर पहिए से कुचलकर मौत हो गई थी। इससे पहले मझोला में स्कूली वैन पलटने से करीब एक दर्जन बच्चे घायल हो गए थे। इस घटना में भी एक बच्चे की मौत हुई थी। नए शैक्षिक सत्र की शुरुआत हो चुकी है। जिले भर में स्कूली बसों, मैजिकों, टेंपों और रिक्शों से बच्चों को ढोया जा रहा है। शहर में ही कई मारूती वैन और टाटा मैजिक बच्चों को ढोने का काम कर रही हैं। इन वैनों में 16 से 20 बच्चों को ठूंसकर भरा जाता है। बसों में भी क्षमता से दोगुने बच्चे बैठाए जाते हैं। अधिकांश बसों में ड्राइवर पांच वर्ष से कम अनुभव वाले हैं। कुछ स्कूलों के वाहन करीब 20 वर्ष के युवा चलाते हैं। फस्ट एड किट, स्पीड गवर्नर, बच्चों का नाम और ब्लड ग्रुप आदि तमाम चीजें सिर्फ कागजों तक ही सीमित हैं। देश का भविष्य कहे जाने वाले बच्चों के जीवन से खिलवाड़ करने वाले इन वाहनों पर सख्ती से ध्यान नहीं दिया जाता है।
विज्ञापन