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क्यों न खतरे में पड़े वन्यजीवों की जानः हथियार तो हैं पर चलाना नहीं जानते, हथियार चलेंगे भी यह गारंटी नहीं
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जंगल में डंडे के सहारे गश्त करते वनकर्मी।
- फोटो : PILIBHIT
पीलीभीत। रुहेलखंड के एक मात्र सघन जंगल, जिसे अब पीलीभीत टाइगर रिजर्व के नाम से जाना जाता है, की सुरक्षा आधे अधूरे स्टाफ और संसाधनों की कमी के चलते अक्सर खतरे में पड़ जाती है। वन एवं वन्यजीवों की सुरक्षा को यहां 60 फीसदी ही स्टाफ तैनात है। खास बात यह है कि रेंजर से लेकर वनरक्षकों को दशकों पुराने हथियार तो थमा दिए गए हैं, मगर इनको चलाने का प्रशिक्षण अरसे से नहीं दिया गया है। इसके अलावा जो हथियार दिए गए हैं वह मौके पर चलेंगे भी, इसकी कोई गारंटी नहीं। बावजूद इसके जिम्मेदार वनाधिकारी बेहतर सुरक्षा व्यवस्था का दावा करते नजर आते हैं।
हाल ही में देश की शीर्ष अदालत ने वनों और वन्यजीवों की सुरक्षा में लगे रेेंजरों और वन रक्षकों की सुरक्षा पर चिंता जताई है। चीफ जस्टिस ने कहा कि चप्पल पहनकर, लाठी लिए पैदल घूमने वाले न खुद को बचा सकते हैं और न जंगल को। कुछ ऐसी ही स्थिति पीलीभीत टाइगर रिजर्व (पीटीआर) की भी है। टाइगर रिजर्व बने छह साल बीत चुके हैं। 73 हजार हेक्टेयर में फैले इस टाइगर रिजर्व में वन्यजीवों और वन संपदा की सुरक्षा लिए पांच वन रेंज हैं। नौ जून 2014 को टाइगर रिजर्व घोषित होने के बाद उम्मीद की जा रही थी कि यहां संसाधनों के साथ अत्याधुनिक हथियारों से लैस पर्याप्त मात्रा में स्टाफ तैनात किया जाएगा, मगर दावे खोखले साबित हुए। पीटीआर में तैनात स्टाफ की बात करें तो यहां स्वीकृत पदों के सापेक्ष मात्र 60 फीसदी ही स्टाफ की तैनाती है। 40 फीसदी स्टाफ की कमी चली आ रही है। गत वर्ष नए वन रक्षकों की तैनाती के बाद भी यहां कमी बनी हुई है।
हथियार तो हैं मगर वक्त पर काम न आए तो किस काम के
वर्तमान में जहां अपराधियों के हाथों में नाइन एमएम और .32 बोर की अवैध पिस्टल और बंदूकें होती हैं वहीं पीटीआर के वनकर्मियों के पास दो से तीन दशक पुरानी 315 बोर की 40 राइफलें और और 34 डबल बैरल बंदूकें हैं, मगर किसी का कोई भरोसा नहीं। सबसे खास बात तो यह है कि वनकर्मियों को हथियार तो थमा दिए गए हैं, मगर सूत्रों के मुताबिक इन्हें अरसे से हथियार चलाने का प्रशिक्षण ही नहीं दिया गया है। जाहिर सी बात है कि ऐसे में राइफल, बंदूकें और कारतूस मालखाने में पड़े होंगे, जो शायद अब चलने के काबिल भी नहीं होंगे। बतातेे हैं कि राइफल की रखी गोलियां तो एक बारगी चला भी सकते हैं, मगर डबल बैरल बंदूक की गोलियां खराब हो जाती हैं।
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पीलीभीत टाइगर रिजर्व के पास अत्याधुनिक हथियार नहीं है। मात्र राइफल और डबल बैरल बंदूकें ही हैं। वनकर्मियों के प्रशिक्षण को लेकर मुरादाबाद के पुलिस ट्रेनिंग सेंटर में वार्ता की गई थी, मगर कोरोना के चलते मामला टल गया। स्टाफ की कमी को लेकर भी लगातार पत्राचार किया जा रहा है। - नवीन खंडेलवाल, डिप्टी डायरेक्टर, पीलीभीत टाइगर रिजर्व
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हाल ही में देश की शीर्ष अदालत ने वनों और वन्यजीवों की सुरक्षा में लगे रेेंजरों और वन रक्षकों की सुरक्षा पर चिंता जताई है। चीफ जस्टिस ने कहा कि चप्पल पहनकर, लाठी लिए पैदल घूमने वाले न खुद को बचा सकते हैं और न जंगल को। कुछ ऐसी ही स्थिति पीलीभीत टाइगर रिजर्व (पीटीआर) की भी है। टाइगर रिजर्व बने छह साल बीत चुके हैं। 73 हजार हेक्टेयर में फैले इस टाइगर रिजर्व में वन्यजीवों और वन संपदा की सुरक्षा लिए पांच वन रेंज हैं। नौ जून 2014 को टाइगर रिजर्व घोषित होने के बाद उम्मीद की जा रही थी कि यहां संसाधनों के साथ अत्याधुनिक हथियारों से लैस पर्याप्त मात्रा में स्टाफ तैनात किया जाएगा, मगर दावे खोखले साबित हुए। पीटीआर में तैनात स्टाफ की बात करें तो यहां स्वीकृत पदों के सापेक्ष मात्र 60 फीसदी ही स्टाफ की तैनाती है। 40 फीसदी स्टाफ की कमी चली आ रही है। गत वर्ष नए वन रक्षकों की तैनाती के बाद भी यहां कमी बनी हुई है।
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हथियार तो हैं मगर वक्त पर काम न आए तो किस काम के
वर्तमान में जहां अपराधियों के हाथों में नाइन एमएम और .32 बोर की अवैध पिस्टल और बंदूकें होती हैं वहीं पीटीआर के वनकर्मियों के पास दो से तीन दशक पुरानी 315 बोर की 40 राइफलें और और 34 डबल बैरल बंदूकें हैं, मगर किसी का कोई भरोसा नहीं। सबसे खास बात तो यह है कि वनकर्मियों को हथियार तो थमा दिए गए हैं, मगर सूत्रों के मुताबिक इन्हें अरसे से हथियार चलाने का प्रशिक्षण ही नहीं दिया गया है। जाहिर सी बात है कि ऐसे में राइफल, बंदूकें और कारतूस मालखाने में पड़े होंगे, जो शायद अब चलने के काबिल भी नहीं होंगे। बतातेे हैं कि राइफल की रखी गोलियां तो एक बारगी चला भी सकते हैं, मगर डबल बैरल बंदूक की गोलियां खराब हो जाती हैं।
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पीलीभीत टाइगर रिजर्व के पास अत्याधुनिक हथियार नहीं है। मात्र राइफल और डबल बैरल बंदूकें ही हैं। वनकर्मियों के प्रशिक्षण को लेकर मुरादाबाद के पुलिस ट्रेनिंग सेंटर में वार्ता की गई थी, मगर कोरोना के चलते मामला टल गया। स्टाफ की कमी को लेकर भी लगातार पत्राचार किया जा रहा है। - नवीन खंडेलवाल, डिप्टी डायरेक्टर, पीलीभीत टाइगर रिजर्व