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प्राइवेट स्कूलों पर प्रशासन का आदेश बेअसर, नया कोर्स ही चलाएंगे
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पीलीभीत। लॉकडाउन से हर कोई प्रभावित है। किसी का कारोबार ठप हो चुका है तो किसी की नौकरी छूट चुकी है। बहुतों की नौकरी खतरे में भी है। ऐसे परिवार के अभिभावकों को अपने बच्चों की पढ़ाई पर संकट सता रहा है। प्रशासन ने लॉकडाउन में कान्वेंट स्कूलों को पिछले साल का पाठ्यक्रम ही चलाने को कहा है, लेकिन स्कूल मनमानी पर उतारू हैं। सरकार या प्रशासन के आदेश का भी उन पर असर नहीं है।
कई प्राइवेट स्कूलों ने इस बार भी अपने पाठ्यक्रम में फेरबदल कर दिया है। कमीशन की नियत से कुछ विषयों की किताबें बदल दीं। बाकी पुरानी ही रखी हैं। अगर पुराना पाठ्यक्रम होता तो बच्चे पास पड़ोस के बच्चों से किताबें लेकर अपना काम चला सकते थे। मगर, अब बच्चे और उनके अभिभावक दोनों ही पहले कोरोना के लॉकडाउन और फिर बच्चों का नया कोर्स खरीदने के संकट से जूझेंगे।
लॉकडाउन होने के बाद शासन ने प्राइवेट स्कूलों के लिए गाइडलाइन जारी की थी। उसमें यह कहा था कि निजी स्कूल अपने पाठ्यक्रम में कोई भी परिवर्तन नहीं करेंगे। गत वर्ष के पाठ्यक्रम के आधार पर ही शिक्षण कार्य संचालित कराएंगे, लेकिन जनपद के अधिकतर प्राइवेट स्कूलों ने कोरोना की दैवी आपदा में न तो प्रारंभिक तीन महीने की फीस माफ की। न ही शासन की गाइडलाइन को मानते हुए नए शैक्षिक सत्र में एनसी कक्षा से लेकर 12 वीं तक किताबों का पुराना कोर्स ही रखा। नर्सरी से लेकर इंटर तक प्रत्येक कक्षा में कुछ विषयों की किताबें बदल दीं और बाकी किताबें पुरानी ही रखीं। इसका मकसद यह है कि अभिभावकों को महंगे दाम चुकाकर अपने बच्चों का नया कोर्स खरीदना पड़े और प्रशासन भी उंगली न उठा पाए। हर साल की तरह किताबों और ड्रेस पर कमीशन भी मिल जाए।
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पुस्तक भंडार नहीं देते ठीक जानकारी
स्कूलों द्वारा ऐसा करने से अभिभावक परेशान कि वह अगर किसी आस पड़ोस के बच्चें से पुरानी किताबें ले आते हैं, तो उन्हें पता नहीं है कि स्कूलों ने कौन सी किताबें बदली हैं। लॉकडाउन के चक्कर में स्टेशनरी वाले भी दुकान न खोलकर डोर टू डोर डिलिवरी कर रहे हैं। अगर अभिभावक पुस्तक विक्रेताओं और विद्यालयों से कौन सी किताब बदली और कौन सी नहीं, का सवाल पूछते है, तो उन्हें ठीक ढंग से जानकारी भी नहीं देते क्योंकि उन्हें लगता है कि इससे नुकसान हो जाएगा।
प्रकाशक और दुकानदार का गठजोड़
नए सत्र में तमाम प्रशासनिक आदेश के बावजूद अभिभावकों को स्टेशनरी की दुकानों से पूरा नया कोर्स ही लेना पड़ रहा है। इसका कारण सिर्फ एक है- वह यह है हर साल की तरह शिक्षा की आड़ में स्टेशनरी, प्रकाशन वाली कंपनियां और स्कूल प्रबंधन के बीच कमीशन का गठजोड़। अभिभावकों का कहना है न तो स्कूलों की ओर तीन महीने की फीस में छूट दी गई, न ही किसी स्कूल प्रबंधन ने अन्य मदद की। ऊपर से कोर्स में बदलाव करके उनकी मुसीबत बढ़ा दी है। ज्यादातर अभिभावक परेशान हैं कि वह कोरोना जैसी महामारी के लॉकडाउन के चलते आर्थिक संकट में अपने बच्चों के लिए इतना महंगा नया कोर्स कैसे खरीदें।
स्कूलों को अभिभावकों की परेशानी को समझाना चाहिए। लॉकडाउन ने सबकी कमर तोड़ दी है, ऐसे में उन्हें बच्चों के पाठ्यक्रम में बदलाव नहीं करना चाहिए था। अगर ऐसा नहीं होता तो मेरे जैसे मध्यम वर्ग के परिवार पुरानी किताबों से काम चला सकते थे। -दीपक शर्मा, अभिभावक
अभिभावकों को अपने बच्चों के लिए अगली क्लास का कोर्स खरीदना है। अगर विद्यालय बच्चों की किताबें न बदलें तो कुछ हद तक पुरानी किताबों से भी काम चलाया जा सकता है। मगर, विद्यालय ऐसा कर नहीं रहे हैं। इतनी बड़ी दैवीय आपदा में भी स्कूल प्रबंधन नहीं सोच रहे हैं तो कब सोचेंगे। -संजीव थापर, अभिभावक
पहले तो कोरोना ने ही हालात खराब कर दिए हैं। सोचा था विद्यालय कम से कम कोर्स नहीं बदलेंगे तो पुरानी किताबें लेकर काम चलाया जाएगा। जरूरत पड़ती तो नई किताबें खरीद ली जाती, लेकिन स्कूलों ने कोर्स में बदलाव करके आर्थिक संकट पैदा कर दिया है। - वर्षा सक्सेना, अभिभावक
स्कूलों द्वारा पाठ्यक्रम में बदलाव करने का मामला संज्ञान में आया है। इसकी जांच कराई जाएगी। कोई भी विद्यालय पाठ्यक्रम में फेरबदल न करें। - वैभव श्रीवास्तव ,डीएम
स्कूलों में पिछले साल का ही पाठ्यक्रम चलेगा। अभिभावकों को नई किताबें खरीदने के लिए मजबूर नहीं किया जाएगा। - संतप्रकाश, डीआईओएस
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कई प्राइवेट स्कूलों ने इस बार भी अपने पाठ्यक्रम में फेरबदल कर दिया है। कमीशन की नियत से कुछ विषयों की किताबें बदल दीं। बाकी पुरानी ही रखी हैं। अगर पुराना पाठ्यक्रम होता तो बच्चे पास पड़ोस के बच्चों से किताबें लेकर अपना काम चला सकते थे। मगर, अब बच्चे और उनके अभिभावक दोनों ही पहले कोरोना के लॉकडाउन और फिर बच्चों का नया कोर्स खरीदने के संकट से जूझेंगे।
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लॉकडाउन होने के बाद शासन ने प्राइवेट स्कूलों के लिए गाइडलाइन जारी की थी। उसमें यह कहा था कि निजी स्कूल अपने पाठ्यक्रम में कोई भी परिवर्तन नहीं करेंगे। गत वर्ष के पाठ्यक्रम के आधार पर ही शिक्षण कार्य संचालित कराएंगे, लेकिन जनपद के अधिकतर प्राइवेट स्कूलों ने कोरोना की दैवी आपदा में न तो प्रारंभिक तीन महीने की फीस माफ की। न ही शासन की गाइडलाइन को मानते हुए नए शैक्षिक सत्र में एनसी कक्षा से लेकर 12 वीं तक किताबों का पुराना कोर्स ही रखा। नर्सरी से लेकर इंटर तक प्रत्येक कक्षा में कुछ विषयों की किताबें बदल दीं और बाकी किताबें पुरानी ही रखीं। इसका मकसद यह है कि अभिभावकों को महंगे दाम चुकाकर अपने बच्चों का नया कोर्स खरीदना पड़े और प्रशासन भी उंगली न उठा पाए। हर साल की तरह किताबों और ड्रेस पर कमीशन भी मिल जाए।
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पुस्तक भंडार नहीं देते ठीक जानकारी
स्कूलों द्वारा ऐसा करने से अभिभावक परेशान कि वह अगर किसी आस पड़ोस के बच्चें से पुरानी किताबें ले आते हैं, तो उन्हें पता नहीं है कि स्कूलों ने कौन सी किताबें बदली हैं। लॉकडाउन के चक्कर में स्टेशनरी वाले भी दुकान न खोलकर डोर टू डोर डिलिवरी कर रहे हैं। अगर अभिभावक पुस्तक विक्रेताओं और विद्यालयों से कौन सी किताब बदली और कौन सी नहीं, का सवाल पूछते है, तो उन्हें ठीक ढंग से जानकारी भी नहीं देते क्योंकि उन्हें लगता है कि इससे नुकसान हो जाएगा।
प्रकाशक और दुकानदार का गठजोड़
नए सत्र में तमाम प्रशासनिक आदेश के बावजूद अभिभावकों को स्टेशनरी की दुकानों से पूरा नया कोर्स ही लेना पड़ रहा है। इसका कारण सिर्फ एक है- वह यह है हर साल की तरह शिक्षा की आड़ में स्टेशनरी, प्रकाशन वाली कंपनियां और स्कूल प्रबंधन के बीच कमीशन का गठजोड़। अभिभावकों का कहना है न तो स्कूलों की ओर तीन महीने की फीस में छूट दी गई, न ही किसी स्कूल प्रबंधन ने अन्य मदद की। ऊपर से कोर्स में बदलाव करके उनकी मुसीबत बढ़ा दी है। ज्यादातर अभिभावक परेशान हैं कि वह कोरोना जैसी महामारी के लॉकडाउन के चलते आर्थिक संकट में अपने बच्चों के लिए इतना महंगा नया कोर्स कैसे खरीदें।
स्कूलों को अभिभावकों की परेशानी को समझाना चाहिए। लॉकडाउन ने सबकी कमर तोड़ दी है, ऐसे में उन्हें बच्चों के पाठ्यक्रम में बदलाव नहीं करना चाहिए था। अगर ऐसा नहीं होता तो मेरे जैसे मध्यम वर्ग के परिवार पुरानी किताबों से काम चला सकते थे। -दीपक शर्मा, अभिभावक
अभिभावकों को अपने बच्चों के लिए अगली क्लास का कोर्स खरीदना है। अगर विद्यालय बच्चों की किताबें न बदलें तो कुछ हद तक पुरानी किताबों से भी काम चलाया जा सकता है। मगर, विद्यालय ऐसा कर नहीं रहे हैं। इतनी बड़ी दैवीय आपदा में भी स्कूल प्रबंधन नहीं सोच रहे हैं तो कब सोचेंगे। -संजीव थापर, अभिभावक
पहले तो कोरोना ने ही हालात खराब कर दिए हैं। सोचा था विद्यालय कम से कम कोर्स नहीं बदलेंगे तो पुरानी किताबें लेकर काम चलाया जाएगा। जरूरत पड़ती तो नई किताबें खरीद ली जाती, लेकिन स्कूलों ने कोर्स में बदलाव करके आर्थिक संकट पैदा कर दिया है। - वर्षा सक्सेना, अभिभावक
स्कूलों द्वारा पाठ्यक्रम में बदलाव करने का मामला संज्ञान में आया है। इसकी जांच कराई जाएगी। कोई भी विद्यालय पाठ्यक्रम में फेरबदल न करें। - वैभव श्रीवास्तव ,डीएम
स्कूलों में पिछले साल का ही पाठ्यक्रम चलेगा। अभिभावकों को नई किताबें खरीदने के लिए मजबूर नहीं किया जाएगा। - संतप्रकाश, डीआईओएस