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सिर्फ आश्वासन देकर लौट गए सरकार
अमर उजाला ब्यूरो पीलीभीत।
Updated Mon, 28 Aug 2017 11:15 PM IST
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सीएम
- फोटो : अमर उजाला
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टाइगर रिजर्व को लेकर मुख्यमंत्री ने नहीं की कोई घोषणा
बाघ हमले और बाढ़ से निपटने की रणनीति की समीक्षा करने के लिए बुधवार को पीलीभीत पहुंचे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से जिले को काफी उम्मीदें थीं। पर उनके 40 मिनट के दौरे का कोई ठोस निष्कर्ष नहीं निकला। टाइगर रिजर्व के लिए कोई ठोस उपाय अथवा बड़ी घोषणा वह नहीं कर सके। मुख्यमंत्री जंगल किनारे के गांव को ओडीएफ कराने, उज्जवला योजना से गैस कनेक्शन देने एवं टाइगर रिजर्व में फील्ड डायरेक्टर की तैनाती का आश्वासन देकर बाघों से सुरक्षा का दावा करके लौट गए।
प्रदेश में भाजपा की सरकार बनने के बाद पहली बार मुख्यमंत्री ने जिले का दौरा किया। एक दिन पूर्व उनका कार्यक्रम आने से जनपदवासियों को काफी उम्मीद जगी थीं। माना जा रहा था कि टाइगर रिजर्व सहित जिले के विकास की कई घोषणाएं होंगी और बाघों के हमले से निजात को कोई ठोस रणनीति बनेगी, लेकिन बाघ के हमले के बाद वन विभाग और प्रशासन की उपेक्षा झेल रहे जनपदवासियों को मुख्यमंत्री के आने पर भी कोई राहत की उम्मीद नहीं दिखी। मुख्यमंत्री ने ओडीएफ योजना के तहत जंगल किनारे के गांव को संतृप्त करने और जलौनी लकड़ी पर निर्भरता कम करने के लिए उज्जवला योजना से गैस कनेक्शन दिलाने के निर्देश दिए, जबकि यह दोनों योजनाएं जंगल क्षेत्र में पहले से प्राथमिकता के आधार पर चल रहीं हैं।
स्टाफ पूरा नहीं कैसे सक्रिय होंगी वन चौकियां
मुख्यमंत्री ने टाइगर रिजर्व में फील्ड डायरेक्टर की तैनाती करने का आश्वासन दिया, साथ ही वनचौकियों को भी सक्रिय करने निर्देश दिए। जबकि विभाग के पास स्टाफ ही नहीं है और दैनिक वेतनभोगी वनकर्मियों को वेतन देने के लिए धनराशि तक उपलब्ध नहीं है। इसके अलावा वनकर्मियों पर हो रहे हमलों को रोकने के लिए भी कोई सुरक्षा उपाय नहीं हैं। ऐसे में वनचौकियां कैसे सक्रिय होंगी, यह अपने आप में बड़ा सवाल है।
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तारफेसिंग की ही घोषणा कर देते योगी जी
पीलीभीत। जंगल से बाहर आ रहे वन्यजीवों को रोकने के लिए सोलर फेंसिंग कुछ हद तक कारगर साबित हो रही है, जिसके लिए दो विधायकों ने पांच-पांच लाख रुपये विधायक निधि से दिए हैं, लेकिन बाघ के हमलों की स्थिति जानने आए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ तारफेसिंग को बजट देने तक की घोषणा नहीं कर सके। यही नहीं, तारफेंसिंग और कर्मचारियों के वेतन, विभाग के खर्चे आदि के मद में केंद्र सरकार से प्रदेश सरकार को मिले 5.57 करोड़ रुपये की धनराशि कब तक जिले को प्राप्त हो जाएगी, यह बताना भी मुख्यमंत्री ने जरूरी नहीं समझा। पीलीभीत टाइगर रिजर्व की लंबाई की अपेक्षा चौड़ाई काफी कम है। माना जाता है कि इसी के चलते बाघ एवं वन्यजीव आसानी से जंगल से निकलकर निकट के खेतों में आ जाते हैं, जो आबादी तक पहुंचने लगे हैं। ऐसे में, वन्यजीवों को जंगल क्षेत्र में ही नियंत्रित रखने के लिए सोलर तार फेसिंग कराने की मांग जंगल किनारे रहने वाले ग्रामीण करते आ रहे हैं। पिछले दिनों वनकटी क्षेत्र से सटे गांवों में कई घटनाएं होने के बाद दो विधायकों ने विधायक निधि से पांच-पांच लाख रुपये की धनराशि दी है, जबकि केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी ने भी सांसद निधि से 15 लाख रुपये देने की घोषणा की। मेनका गांधी की ओर से केंद्र और प्रदेश सरकार को पत्र लिखे जाने के बाद वन विभाग ने जंगल की कुल सीमा लगभग 600 किमी में सोलर फेसिंग कराने के लिए 25 करोड़ का प्रस्ताव भेजा है। उम्मीद की जा रही थी कि मुख्यमंत्री फौरी तौर पर तार फेसिंग के लिए कुछ बजट जारी कर सकते हैं, लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। मुख्यमंत्री हर मांग पर केवल आश्वासनों तक ही समिति रहे।
बाघ, बाढ़ पीड़ितों की उम्मीदों पर खरा नहीं उतरा सीएम का दौरा
पीलीभीत। मुख्यमंत्री बनने के बाद पहली बार योगी आदित्यनाथ के यहां आगमन को लेकर बाघ हमले और बाढ़-कटान पीड़ितों को उम्मीद थी कि सीएम कुछ ऐसी घोषणा जरूर कर जाएंगे जो उनके घावों पर मरहम साबित होगी, लेकिन उनकी उम्मीदों पर पानी फिर गया। यही नहीं जिले में बाढ़-कटान से हो रहे नुकसान और बाघ के हमलों बढ़ते हमलों को रोकने में नाकाम साबित हो रहे प्रशासन व संबंधित विभाग के अधिकारियों पर गाज गिरना भी लोग तय मान रहे थे, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। कुल मिला कर लोगों की उम्मीद पर मुख्यमंत्री का यह दौरा खरा नहीं उतर सका।
जिले में पिछले नौ माह में 18 लोगों की जान बाघ के हमलों में जा
चुकी हैं। शुरू में हुई घटनाओं को वन महकमे ने गंभीरता से नहीं लिया। जंगल से सटे इलाकों में घटी घटनाओं को वन महकमा पीड़ित के वन क्षेत्र में घुसने की बात कह अपनी गर्दन बचाता रहा। यही नहीं बीच में तो वन महकमा अपने कुछ सिपहसलारों से यह तक कहलवाता रहा कि जंगल किनारे के गांवों के लोग अपने बुजुर्गों को मुआवजे के तौर पर मिलने वाले पांच लाख रुपये के लालच में जंगल में भेज रहे हैं। राजनीतिक दलों के कुछ लोगों ने इसका विरोध भी किया। सपा के वरिष्ठ नेता एवं पूर्व मंत्री हेमराज वर्मा ने इसके विरोध में बकायदा सांकेतिक धरना देकर चेतावनी भी जारी की। इसके बाद वन विभाग नये पैतरे तलाशने लगा। लेकिन पिछले हफ्ते के भीतर अमरिया क्षेत्र में ताबड़तोड़ चार दिन में बाघ के हमलों में मारे गए तीन लोगों के बाद से वन विभाग बैकफुट पर आ गया। इसकी वजह थी कि जिन इलाकों में यह घटनाएं घटी वह जंगल से करीब 15 किमी दूर इलाके की थीं। यही नहीं उन इलाकों में गन्ने के बजाय प्रमुखता से धान की खेती भी अधिकांश इलाकों में हो रही थीं। इसके बाद से ही वन विभाग की कार्य प्रणाली पर सवालिया निशान लगने लगे थे।
कमोवेश यही स्थिति बाढ़-कटान के मुद्दे को लेकर रही। नहरोसा, राणा प्रताप नगर में सैकड़ों एकड़ कृषि भूमि व कई घर शारदा के कटान की भेंट चढ़ गए। पहले के कराए तमाम बचाव कार्य भी बह गए। आनन-फानन में बाढ़ खंड ने जो बचाव कार्य शुरू कराया वो भी कारगर साबित नहीं हुआ। सिद्धनगर गांव की आबादी के पीछे तक कटान करते हुए नदी पहुंच गई। वहां किसानों के खेतों तक जाने वाले दो रास्तों में से एक को नदी पिछले साल ही नाले में बदल चुकी है जबकि दूसरा रास्ता भी इस बार नाले में तब्दील होने की कगार पर पहुंच गया है। सड़कों पर पानी के तेज बहाव के चलते लोग अपने पशुओं का चारा तक नहीं ला पा रहे हैं। बाढ़-कटान रोकने में प्रशासन पूरी तरह फेल है। मुख्यमंत्री खास तौर पर इन्हें दोनों मुद्दों पर पीड़ितों से मुलाकात करने भी आए थे। प्रशासन को अपनी खामी छिपानी थी। लिहाजा बाघ हमले के चार पीड़ित परिवारों की महिलाओं को और बाढ़ कटान पीड़ित गांवों के आधा दर्जन प्रधानों को बुलवा लिया था। सीएम के आगे ये लोग कुछ कह न दे लिहाजा इन्हें पहले से ही बता दिया गया था कि जब उनसे कहा जाए तभी वह बोलें। वह सभी बोलने के लिए आदेश मिलने का इंतजार ही करते रह गए और बैठक खत्म कर सीएम चले गए। सभी को उम्मीद थी बाढ़-बाघ मामले से जुड़े कुछ अधिकारियों पर सीएम गाज गिरा सकते हैं। इसके अलावा उन्हें बाघ पीड़ितों को उम्मीद थी कि सीएम कोई ऐसी घोषणा करेंगे जिससे उनके परिवार का अन्य कोई सदस्य भविष्य में बाघ के हमलों का शिकार न हो। बाढ़ पीड़ितों को बाढ़-कटान से स्थाई निजात के लिए कोई घोषणा करने अथवा नदी कटान से उजड़ चुके परिवारों के पुनर्वास की व्यवस्था करने की उम्मीद थी, लेकिन इन सभी की उम्मीदों पर सीएम पानी फेर गए। यही नहीं आंगनबाड़ी कार्यकर्ता और शिक्षामित्र संगठन के नेता भी अपना दुख-दर्द सीएम से मिल कर उन तक पहुंचाना चाहते थे, लेकिन प्रशासन की सख्ती ने उनकी भी उम्मीदों पर पानी फेर दिया।
योगी से नहीं मिल सके फरियादी मायूस लौटे
पीलीभीत। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के जिले में आगमन के बाद लंबे समय से अधिकारियों के कार्यालयों में चक्कर काट रहे फरियादियों को एक आस जागी थी। जिसको लेकर फरियादी उनसे मिलने के लिए घरों से निकले, लेकिन मुलाकात नहीं हो सकी। बैरियर प्वाइंट से उनको वापस कर दिया गया। बीसलपुर के ग्राम रिछौला सबल निवासी सलमा पत्नी इमरान अंसारी ने बताया कि 19 जुलाई को काटा हथियाने की नियत से गांव के दबंगों ने उनके परिवारीजनों से मारपीट की थी। जिसका मुकदमा दर्ज कराया गया। इसके बाद आरोपियों की तरफ से मुकदमा दर्ज कर पुलिस ने पीड़ित के परिवारीजनों का ही चालान कर दिया। अफसरों से कई बार शिकायत के बाद भी न्याय न मिलने पर वह बुधवार को सीएम से मिलने आई थी, लेकिन मिल नहीं सकी। केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी को अपना दुखड़ा सुनाया। अब उनका कहना है कि वह लखनऊ जाकर मुख्यमंत्री से मामले की शिकायत करेंगी। यही नहीं आंगनबाड़ी कार्यकर्ता और शित्रा मित्र संगठन समेत अन्य कई संगठनों के पदाधिकारी भी उन तक अपनी गुहार का एक ज्ञापन देना चाहते थे, लेकिन सुरक्षा के नाम पर प्रशासन ने सख्ती दिखा उन्हें उन तक पहुंचने ही नहीं दिया।
झलक पाने को खड़ी रही जनता जनार्दन
पहली बार पीलीभीत पहुंचे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की एक झलक पाने को कचहरी और कलक्ट्रेट आए लोग बेरीकेडिंग तक पहुंच गए। हर कोई उनकी एक झलक पाने को आतुर दिखा, लेकिन उन्हें गाड़ियों का काफिला देखकर ही संतोष करना पड़ा। इस दौरान कई लोगों की पुलिस से झड़प भी हुई तो कई अधिकारियों तक को वापस होना पड़ा।
प्रशासन ने मीडिया कर्मियों को रोका पर योगी खुद मिलेे
पीलीभीत। मुख्यमंत्री के कार्यक्रम की कवरेज के लिए पहुंचे पत्रकारों को जिला प्रशासन ने दिया। इसके विरोध में मीडियाकर्मी सभागार के बाहर ही धरने पर बैठ गए। बैठक के बाद वापस जाते समय शोर होने पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ खुद गाड़ी से उतर आगे आए और पत्रकारों से वार्ता की।
मुख्यमंत्री का कार्यक्रम आने केे बाद से ही प्रशासन को यह चिंता सताने लगी थी कि कहीं मीडिया मुख्यमंत्री के सामने उनकी कमियां न उजागर कर दें। इसके चलते प्रशासन ने मीडिया को किसी भी तरह की कवरेज से रोकने का प्रयास किया, लेकिन काफी कहने-सुनने के बाद कुछ छायाकारों को सभागार में भेजकर फोटोग्राफी पर सहमति जताई। एसडीएम बीसलपुर फोटोग्राफरों को गांधी सभागार परिसर तक ले गए, लेकिन वहीं अन्य अधिकारियों ने उन्हें पुन: रोकने का प्रयास किया। इस पर छायाकार एवं बाहर खड़े पत्रकार एकजुट होकर मेनगेट के निकट की कुर्सियों पर बैठ गए और आपस में तय कर लिया कि अब कोई भी छायाकार भीतर हो रही बैठक की फोटोग्राफी करने नहीं जाएगा। पत्रकारों के धरने की जानकारी से प्रशासन में हड़कंप मच गया। पुलिस अधीक्षक एवं मुख्यमंत्री के निजी सचिव पत्रकारों को समझाने गेट तक आए, लेकिन बात नहीं बनी। इस बीच मुख्यमंत्री जब बैठक कर जाने लगे तो पत्रकारों ने आवाज देकर उनका ध्यान आकृष्ट किया। मीडिया को देख मुख्यमंत्री गाड़ी से उतरे और पत्रकारों के पास पहुंचकर वार्ता भी की।
प्रशासन की रही आधी-अधूरी रणनीति, बदलते रहे फरमान
पीलीभीत। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के कार्यक्रम को लेकर प्रशासनिक अधिकारी बंदोबस्त पुख्ता करने में फेल साबित हुए। हैलीपेड से लेकर मीटिंग हॉल तक जाने वाले रास्ते की व्यवस्था को लेकर सीएम के आने तक फरमान बदलते रहे। खास बात रही कि अफसरों की कोई शिकायत मुख्यमंत्री तक न पहुंच जाए। इसकी खातिर सुरक्षा कारणों का हवाला दिया जाता रहा। नतीजतन कार्यक्रम के दौरान अफसरों से कभी मीडियाकर्मियों तो कभी भाजपाइयों की नोकझोंक होती रही।
बुधवार सुबह से ही पुलिस लाइन में बनाए गए हैलीपेड से लेकर गांधी सभागार तक सुरक्षा व्यवस्था पुख्ता होने के दावे कर दिए गए। भीड़ मुख्यमंत्री तक न आए, इसको लेकर अफसर बैरियर और रस्सी लगाकर पुलिस बल के साथ मुस्तैद हो गए। जगह-जगह सुरक्षा घेरा खींचा गया। खास बात रही कि सुरक्षा सख्त रखने के बाद किस रणनीति पर कर्मचारियों को काम करना है। इसकी जानकारी का अभाव देखा गया। पहले कलेक्ट्रेट के भीतर वाले रास्ते से कुछ लोगों को गांधी सभागार की ओर एसडीएम बीसलपुर जेपी चौहान ने निकाल दिया। इसको चंद मिनट बीत सके होंगे की एसपी कलानिधि नैथानी और एएसपी रोहित मिश्रा ने इस रास्ते पर नो इंट्री पहले से जारी होने का फरमान सुना दिया। इसके बाद सभागार कक्ष तक अफसरों के बयान आपस में न तो मेल खाते दिखाई दिए, न ही ज्यादा देर तक टिक सके। मीडियाकर्मियों से अधिकारियों की नोकझोंक होती रही। अफसरों की बनाई सूची में नाम गायब होने पर कई मीडिया कर्मियों ने नाराजगी जताई। इसके बाद खुद को भाजपा का जिलामंत्री बताते हुए पांच नेता गांधी सभागार मेनगेट पर पहुंच गए, जिनको पुलिस बल ने रोक लिया। शोर सुनकर डीएम शीतल वर्मा भी मौके पर पहुंच गई। पहले तो सख्ती दिखाकर उनको लौटाना चाहा, लेकिन भाजपाइयों के विरोध करते ही बैकफुट पर आने में देर न लगी। तुरंत ही उनको गेट के भीतर इंट्री करा दी गई। फरियादियों को विशेष तौर पर दूर रखा गया। इसके पीछे चर्चा है कि ऐसा इसलिए किया गया कि कहीं कोई उनकी नाकामी का चिट्ठा सीएम के सामने न रख दें। फिलहाल पहले से सूचना होने के बावजूद इस तरह की अव्यवस्था कहीं न कहीं अफसरों की लापरवाही को उजागर कर गया है।
एमएलसी को नहीं दी मुख्यमंत्री की बैठक की सूचना
पीलीभीत। मुख्यमंत्री की बैठक में सूचना न देने पर विधान परिषद सदस्य अमित यादव रिंकू ने कड़ी नाराजगी व्यक्त की। उन्होंने कहा जिला प्रशासन भाजपा के कार्यकर्ता के रूप में काम कर रहा है। वह इस मामले को विधान परिषद में उठाएंगे। मंगलवार को मुख्यमंत्री के आगमन की सूचना जिला प्रशासन को 15 अगस्त को लगभग 1.40 बजे मिल गई थी। इसके बाद प्रशासन तैयारियों में जुट गया। अधिकारियों की बैठक कर रणनीति बनाने के साथ ही जनप्रतिनिधियों को भी बैठक में आमंत्रित किया गया। जिला प्रशासन ने समाजवादी पार्टी के एमएलसी अमित यादव रिंकू को सूचना तक नहीं दी। मुख्यमंत्री की बैठक की सूचना न देने पर उन्होंने जिला प्रशासन के प्रति कड़ी नाराजगी व्यक्त की है। उन्होंने पत्रकारों को बताया कि जिला प्रशासन भाजपा के कार्यकर्ता के रूप में कठपुतली बनकर काम जा रहा है। यही वजह है कि विपक्षी दल से दूरी बनाए हुए है। उन्होंने इसे लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम का अपमान बताते हुए कहा कि वह इस मामले को विधान परिषद में उठाएंगे। यदि इसके बाद भी प्रशासन का रवैया न बदला तो आंदोलन की रणनीति भी बनाई जाएगी।
श्रेय लेने वालों की लगी रही होड़
पीलीभीत। मुख्यमंत्री केे जनपद आगमन को लेकर विभिन्न जनप्रतिनिधियों में श्रेय लेने की होड़ रहीं। अनशन पर बैठे पूर्व राज्यमंत्री हेमराज वर्मा का दावा है कि उनके अनशन शुरू करते ही शासन हरकत में आया है, जबकि शहर विधायक की मानें तो उनके निवेदन पर मुख्यमंत्री पीलीभीत पहुंचे हैं। बुधवार को मुख्यमंत्री बाघ के बढ़ते हमलों को रोकने को किए गए प्रयासों और बाढ़ की समीक्षा करने पहुंचे थे। पीलीभीत के बाद उन्होंने लखीमपुर व सीतापुर जनपद का भी दौरा कर समीक्षाएं कीं। तीन जनपदों को दौरे को देखते हुए यह नहीं कहा सकता कि मुख्यमंत्री के बाघों के मामले को लेकर पीलीभीत आए थे। उनका यह दौरा किसी एक विशेष कारण से नहीं माना जा सकता। इसके बाद भी आगमन को लेकर दावे किए जा रहे हैं। मुख्यमंत्री के आने का कार्यक्रम मंगलवार को दोपहर बाद आया जबकि पूर्व राज्यमंत्री हेमराज वर्मा ने सुबह ही आमरण अनशन शुरू किया था। ऐसे में उनका दावा है कि बाघों के लगातार हो रहे हमलों के विरोध में उनके अनशन पर बैठने की सूचना के बाद ही शासन चेचा और आनन फानन में मुख्यमंत्री को पीलीभीत आने को विवश होना पड़ा। वहीं दूसरी और शहर विधायक संजय गंगवार का कहना है बाघों के हमलों को लेकर वह दो दिन पूर्व ही लखनऊ जाकर मुख्यमंत्री से मिले थे। इसमें मुख्यमंत्री ने जल्द पीलीभीत आने का आश्वासन दिया था और उनके मिलने के दो दिन बाद ही मुख्यमंत्री उनका अनुरोध स्वीकार कर पीलीभीत आ गए। उधर केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी के प्रवक्ता एमआर मलिक की मानें तो बाघों को लेकर केंद्रीय मंत्री ने मुख्यमंत्री को पत्र लिखाकर एक बैठक करने का अनुरोध किया था। जिसमें स्वयं भी उपस्थित रहने की इच्छा जताई थी। केंद्रीय मंत्री के पत्र को गंभीरता से लेकर ही मुख्यमंत्री ने पीलीभीत में बैठक की है।
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बाघ हमले और बाढ़ से निपटने की रणनीति की समीक्षा करने के लिए बुधवार को पीलीभीत पहुंचे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से जिले को काफी उम्मीदें थीं। पर उनके 40 मिनट के दौरे का कोई ठोस निष्कर्ष नहीं निकला। टाइगर रिजर्व के लिए कोई ठोस उपाय अथवा बड़ी घोषणा वह नहीं कर सके। मुख्यमंत्री जंगल किनारे के गांव को ओडीएफ कराने, उज्जवला योजना से गैस कनेक्शन देने एवं टाइगर रिजर्व में फील्ड डायरेक्टर की तैनाती का आश्वासन देकर बाघों से सुरक्षा का दावा करके लौट गए।
प्रदेश में भाजपा की सरकार बनने के बाद पहली बार मुख्यमंत्री ने जिले का दौरा किया। एक दिन पूर्व उनका कार्यक्रम आने से जनपदवासियों को काफी उम्मीद जगी थीं। माना जा रहा था कि टाइगर रिजर्व सहित जिले के विकास की कई घोषणाएं होंगी और बाघों के हमले से निजात को कोई ठोस रणनीति बनेगी, लेकिन बाघ के हमले के बाद वन विभाग और प्रशासन की उपेक्षा झेल रहे जनपदवासियों को मुख्यमंत्री के आने पर भी कोई राहत की उम्मीद नहीं दिखी। मुख्यमंत्री ने ओडीएफ योजना के तहत जंगल किनारे के गांव को संतृप्त करने और जलौनी लकड़ी पर निर्भरता कम करने के लिए उज्जवला योजना से गैस कनेक्शन दिलाने के निर्देश दिए, जबकि यह दोनों योजनाएं जंगल क्षेत्र में पहले से प्राथमिकता के आधार पर चल रहीं हैं।
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स्टाफ पूरा नहीं कैसे सक्रिय होंगी वन चौकियां
मुख्यमंत्री ने टाइगर रिजर्व में फील्ड डायरेक्टर की तैनाती करने का आश्वासन दिया, साथ ही वनचौकियों को भी सक्रिय करने निर्देश दिए। जबकि विभाग के पास स्टाफ ही नहीं है और दैनिक वेतनभोगी वनकर्मियों को वेतन देने के लिए धनराशि तक उपलब्ध नहीं है। इसके अलावा वनकर्मियों पर हो रहे हमलों को रोकने के लिए भी कोई सुरक्षा उपाय नहीं हैं। ऐसे में वनचौकियां कैसे सक्रिय होंगी, यह अपने आप में बड़ा सवाल है।
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तारफेसिंग की ही घोषणा कर देते योगी जी
पीलीभीत। जंगल से बाहर आ रहे वन्यजीवों को रोकने के लिए सोलर फेंसिंग कुछ हद तक कारगर साबित हो रही है, जिसके लिए दो विधायकों ने पांच-पांच लाख रुपये विधायक निधि से दिए हैं, लेकिन बाघ के हमलों की स्थिति जानने आए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ तारफेसिंग को बजट देने तक की घोषणा नहीं कर सके। यही नहीं, तारफेंसिंग और कर्मचारियों के वेतन, विभाग के खर्चे आदि के मद में केंद्र सरकार से प्रदेश सरकार को मिले 5.57 करोड़ रुपये की धनराशि कब तक जिले को प्राप्त हो जाएगी, यह बताना भी मुख्यमंत्री ने जरूरी नहीं समझा। पीलीभीत टाइगर रिजर्व की लंबाई की अपेक्षा चौड़ाई काफी कम है। माना जाता है कि इसी के चलते बाघ एवं वन्यजीव आसानी से जंगल से निकलकर निकट के खेतों में आ जाते हैं, जो आबादी तक पहुंचने लगे हैं। ऐसे में, वन्यजीवों को जंगल क्षेत्र में ही नियंत्रित रखने के लिए सोलर तार फेसिंग कराने की मांग जंगल किनारे रहने वाले ग्रामीण करते आ रहे हैं। पिछले दिनों वनकटी क्षेत्र से सटे गांवों में कई घटनाएं होने के बाद दो विधायकों ने विधायक निधि से पांच-पांच लाख रुपये की धनराशि दी है, जबकि केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी ने भी सांसद निधि से 15 लाख रुपये देने की घोषणा की। मेनका गांधी की ओर से केंद्र और प्रदेश सरकार को पत्र लिखे जाने के बाद वन विभाग ने जंगल की कुल सीमा लगभग 600 किमी में सोलर फेसिंग कराने के लिए 25 करोड़ का प्रस्ताव भेजा है। उम्मीद की जा रही थी कि मुख्यमंत्री फौरी तौर पर तार फेसिंग के लिए कुछ बजट जारी कर सकते हैं, लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। मुख्यमंत्री हर मांग पर केवल आश्वासनों तक ही समिति रहे।
बाघ, बाढ़ पीड़ितों की उम्मीदों पर खरा नहीं उतरा सीएम का दौरा
पीलीभीत। मुख्यमंत्री बनने के बाद पहली बार योगी आदित्यनाथ के यहां आगमन को लेकर बाघ हमले और बाढ़-कटान पीड़ितों को उम्मीद थी कि सीएम कुछ ऐसी घोषणा जरूर कर जाएंगे जो उनके घावों पर मरहम साबित होगी, लेकिन उनकी उम्मीदों पर पानी फिर गया। यही नहीं जिले में बाढ़-कटान से हो रहे नुकसान और बाघ के हमलों बढ़ते हमलों को रोकने में नाकाम साबित हो रहे प्रशासन व संबंधित विभाग के अधिकारियों पर गाज गिरना भी लोग तय मान रहे थे, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। कुल मिला कर लोगों की उम्मीद पर मुख्यमंत्री का यह दौरा खरा नहीं उतर सका।
जिले में पिछले नौ माह में 18 लोगों की जान बाघ के हमलों में जा
चुकी हैं। शुरू में हुई घटनाओं को वन महकमे ने गंभीरता से नहीं लिया। जंगल से सटे इलाकों में घटी घटनाओं को वन महकमा पीड़ित के वन क्षेत्र में घुसने की बात कह अपनी गर्दन बचाता रहा। यही नहीं बीच में तो वन महकमा अपने कुछ सिपहसलारों से यह तक कहलवाता रहा कि जंगल किनारे के गांवों के लोग अपने बुजुर्गों को मुआवजे के तौर पर मिलने वाले पांच लाख रुपये के लालच में जंगल में भेज रहे हैं। राजनीतिक दलों के कुछ लोगों ने इसका विरोध भी किया। सपा के वरिष्ठ नेता एवं पूर्व मंत्री हेमराज वर्मा ने इसके विरोध में बकायदा सांकेतिक धरना देकर चेतावनी भी जारी की। इसके बाद वन विभाग नये पैतरे तलाशने लगा। लेकिन पिछले हफ्ते के भीतर अमरिया क्षेत्र में ताबड़तोड़ चार दिन में बाघ के हमलों में मारे गए तीन लोगों के बाद से वन विभाग बैकफुट पर आ गया। इसकी वजह थी कि जिन इलाकों में यह घटनाएं घटी वह जंगल से करीब 15 किमी दूर इलाके की थीं। यही नहीं उन इलाकों में गन्ने के बजाय प्रमुखता से धान की खेती भी अधिकांश इलाकों में हो रही थीं। इसके बाद से ही वन विभाग की कार्य प्रणाली पर सवालिया निशान लगने लगे थे।
कमोवेश यही स्थिति बाढ़-कटान के मुद्दे को लेकर रही। नहरोसा, राणा प्रताप नगर में सैकड़ों एकड़ कृषि भूमि व कई घर शारदा के कटान की भेंट चढ़ गए। पहले के कराए तमाम बचाव कार्य भी बह गए। आनन-फानन में बाढ़ खंड ने जो बचाव कार्य शुरू कराया वो भी कारगर साबित नहीं हुआ। सिद्धनगर गांव की आबादी के पीछे तक कटान करते हुए नदी पहुंच गई। वहां किसानों के खेतों तक जाने वाले दो रास्तों में से एक को नदी पिछले साल ही नाले में बदल चुकी है जबकि दूसरा रास्ता भी इस बार नाले में तब्दील होने की कगार पर पहुंच गया है। सड़कों पर पानी के तेज बहाव के चलते लोग अपने पशुओं का चारा तक नहीं ला पा रहे हैं। बाढ़-कटान रोकने में प्रशासन पूरी तरह फेल है। मुख्यमंत्री खास तौर पर इन्हें दोनों मुद्दों पर पीड़ितों से मुलाकात करने भी आए थे। प्रशासन को अपनी खामी छिपानी थी। लिहाजा बाघ हमले के चार पीड़ित परिवारों की महिलाओं को और बाढ़ कटान पीड़ित गांवों के आधा दर्जन प्रधानों को बुलवा लिया था। सीएम के आगे ये लोग कुछ कह न दे लिहाजा इन्हें पहले से ही बता दिया गया था कि जब उनसे कहा जाए तभी वह बोलें। वह सभी बोलने के लिए आदेश मिलने का इंतजार ही करते रह गए और बैठक खत्म कर सीएम चले गए। सभी को उम्मीद थी बाढ़-बाघ मामले से जुड़े कुछ अधिकारियों पर सीएम गाज गिरा सकते हैं। इसके अलावा उन्हें बाघ पीड़ितों को उम्मीद थी कि सीएम कोई ऐसी घोषणा करेंगे जिससे उनके परिवार का अन्य कोई सदस्य भविष्य में बाघ के हमलों का शिकार न हो। बाढ़ पीड़ितों को बाढ़-कटान से स्थाई निजात के लिए कोई घोषणा करने अथवा नदी कटान से उजड़ चुके परिवारों के पुनर्वास की व्यवस्था करने की उम्मीद थी, लेकिन इन सभी की उम्मीदों पर सीएम पानी फेर गए। यही नहीं आंगनबाड़ी कार्यकर्ता और शिक्षामित्र संगठन के नेता भी अपना दुख-दर्द सीएम से मिल कर उन तक पहुंचाना चाहते थे, लेकिन प्रशासन की सख्ती ने उनकी भी उम्मीदों पर पानी फेर दिया।
योगी से नहीं मिल सके फरियादी मायूस लौटे
पीलीभीत। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के जिले में आगमन के बाद लंबे समय से अधिकारियों के कार्यालयों में चक्कर काट रहे फरियादियों को एक आस जागी थी। जिसको लेकर फरियादी उनसे मिलने के लिए घरों से निकले, लेकिन मुलाकात नहीं हो सकी। बैरियर प्वाइंट से उनको वापस कर दिया गया। बीसलपुर के ग्राम रिछौला सबल निवासी सलमा पत्नी इमरान अंसारी ने बताया कि 19 जुलाई को काटा हथियाने की नियत से गांव के दबंगों ने उनके परिवारीजनों से मारपीट की थी। जिसका मुकदमा दर्ज कराया गया। इसके बाद आरोपियों की तरफ से मुकदमा दर्ज कर पुलिस ने पीड़ित के परिवारीजनों का ही चालान कर दिया। अफसरों से कई बार शिकायत के बाद भी न्याय न मिलने पर वह बुधवार को सीएम से मिलने आई थी, लेकिन मिल नहीं सकी। केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी को अपना दुखड़ा सुनाया। अब उनका कहना है कि वह लखनऊ जाकर मुख्यमंत्री से मामले की शिकायत करेंगी। यही नहीं आंगनबाड़ी कार्यकर्ता और शित्रा मित्र संगठन समेत अन्य कई संगठनों के पदाधिकारी भी उन तक अपनी गुहार का एक ज्ञापन देना चाहते थे, लेकिन सुरक्षा के नाम पर प्रशासन ने सख्ती दिखा उन्हें उन तक पहुंचने ही नहीं दिया।
झलक पाने को खड़ी रही जनता जनार्दन
पहली बार पीलीभीत पहुंचे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की एक झलक पाने को कचहरी और कलक्ट्रेट आए लोग बेरीकेडिंग तक पहुंच गए। हर कोई उनकी एक झलक पाने को आतुर दिखा, लेकिन उन्हें गाड़ियों का काफिला देखकर ही संतोष करना पड़ा। इस दौरान कई लोगों की पुलिस से झड़प भी हुई तो कई अधिकारियों तक को वापस होना पड़ा।
प्रशासन ने मीडिया कर्मियों को रोका पर योगी खुद मिलेे
पीलीभीत। मुख्यमंत्री के कार्यक्रम की कवरेज के लिए पहुंचे पत्रकारों को जिला प्रशासन ने दिया। इसके विरोध में मीडियाकर्मी सभागार के बाहर ही धरने पर बैठ गए। बैठक के बाद वापस जाते समय शोर होने पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ खुद गाड़ी से उतर आगे आए और पत्रकारों से वार्ता की।
मुख्यमंत्री का कार्यक्रम आने केे बाद से ही प्रशासन को यह चिंता सताने लगी थी कि कहीं मीडिया मुख्यमंत्री के सामने उनकी कमियां न उजागर कर दें। इसके चलते प्रशासन ने मीडिया को किसी भी तरह की कवरेज से रोकने का प्रयास किया, लेकिन काफी कहने-सुनने के बाद कुछ छायाकारों को सभागार में भेजकर फोटोग्राफी पर सहमति जताई। एसडीएम बीसलपुर फोटोग्राफरों को गांधी सभागार परिसर तक ले गए, लेकिन वहीं अन्य अधिकारियों ने उन्हें पुन: रोकने का प्रयास किया। इस पर छायाकार एवं बाहर खड़े पत्रकार एकजुट होकर मेनगेट के निकट की कुर्सियों पर बैठ गए और आपस में तय कर लिया कि अब कोई भी छायाकार भीतर हो रही बैठक की फोटोग्राफी करने नहीं जाएगा। पत्रकारों के धरने की जानकारी से प्रशासन में हड़कंप मच गया। पुलिस अधीक्षक एवं मुख्यमंत्री के निजी सचिव पत्रकारों को समझाने गेट तक आए, लेकिन बात नहीं बनी। इस बीच मुख्यमंत्री जब बैठक कर जाने लगे तो पत्रकारों ने आवाज देकर उनका ध्यान आकृष्ट किया। मीडिया को देख मुख्यमंत्री गाड़ी से उतरे और पत्रकारों के पास पहुंचकर वार्ता भी की।
प्रशासन की रही आधी-अधूरी रणनीति, बदलते रहे फरमान
पीलीभीत। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के कार्यक्रम को लेकर प्रशासनिक अधिकारी बंदोबस्त पुख्ता करने में फेल साबित हुए। हैलीपेड से लेकर मीटिंग हॉल तक जाने वाले रास्ते की व्यवस्था को लेकर सीएम के आने तक फरमान बदलते रहे। खास बात रही कि अफसरों की कोई शिकायत मुख्यमंत्री तक न पहुंच जाए। इसकी खातिर सुरक्षा कारणों का हवाला दिया जाता रहा। नतीजतन कार्यक्रम के दौरान अफसरों से कभी मीडियाकर्मियों तो कभी भाजपाइयों की नोकझोंक होती रही।
बुधवार सुबह से ही पुलिस लाइन में बनाए गए हैलीपेड से लेकर गांधी सभागार तक सुरक्षा व्यवस्था पुख्ता होने के दावे कर दिए गए। भीड़ मुख्यमंत्री तक न आए, इसको लेकर अफसर बैरियर और रस्सी लगाकर पुलिस बल के साथ मुस्तैद हो गए। जगह-जगह सुरक्षा घेरा खींचा गया। खास बात रही कि सुरक्षा सख्त रखने के बाद किस रणनीति पर कर्मचारियों को काम करना है। इसकी जानकारी का अभाव देखा गया। पहले कलेक्ट्रेट के भीतर वाले रास्ते से कुछ लोगों को गांधी सभागार की ओर एसडीएम बीसलपुर जेपी चौहान ने निकाल दिया। इसको चंद मिनट बीत सके होंगे की एसपी कलानिधि नैथानी और एएसपी रोहित मिश्रा ने इस रास्ते पर नो इंट्री पहले से जारी होने का फरमान सुना दिया। इसके बाद सभागार कक्ष तक अफसरों के बयान आपस में न तो मेल खाते दिखाई दिए, न ही ज्यादा देर तक टिक सके। मीडियाकर्मियों से अधिकारियों की नोकझोंक होती रही। अफसरों की बनाई सूची में नाम गायब होने पर कई मीडिया कर्मियों ने नाराजगी जताई। इसके बाद खुद को भाजपा का जिलामंत्री बताते हुए पांच नेता गांधी सभागार मेनगेट पर पहुंच गए, जिनको पुलिस बल ने रोक लिया। शोर सुनकर डीएम शीतल वर्मा भी मौके पर पहुंच गई। पहले तो सख्ती दिखाकर उनको लौटाना चाहा, लेकिन भाजपाइयों के विरोध करते ही बैकफुट पर आने में देर न लगी। तुरंत ही उनको गेट के भीतर इंट्री करा दी गई। फरियादियों को विशेष तौर पर दूर रखा गया। इसके पीछे चर्चा है कि ऐसा इसलिए किया गया कि कहीं कोई उनकी नाकामी का चिट्ठा सीएम के सामने न रख दें। फिलहाल पहले से सूचना होने के बावजूद इस तरह की अव्यवस्था कहीं न कहीं अफसरों की लापरवाही को उजागर कर गया है।
एमएलसी को नहीं दी मुख्यमंत्री की बैठक की सूचना
पीलीभीत। मुख्यमंत्री की बैठक में सूचना न देने पर विधान परिषद सदस्य अमित यादव रिंकू ने कड़ी नाराजगी व्यक्त की। उन्होंने कहा जिला प्रशासन भाजपा के कार्यकर्ता के रूप में काम कर रहा है। वह इस मामले को विधान परिषद में उठाएंगे। मंगलवार को मुख्यमंत्री के आगमन की सूचना जिला प्रशासन को 15 अगस्त को लगभग 1.40 बजे मिल गई थी। इसके बाद प्रशासन तैयारियों में जुट गया। अधिकारियों की बैठक कर रणनीति बनाने के साथ ही जनप्रतिनिधियों को भी बैठक में आमंत्रित किया गया। जिला प्रशासन ने समाजवादी पार्टी के एमएलसी अमित यादव रिंकू को सूचना तक नहीं दी। मुख्यमंत्री की बैठक की सूचना न देने पर उन्होंने जिला प्रशासन के प्रति कड़ी नाराजगी व्यक्त की है। उन्होंने पत्रकारों को बताया कि जिला प्रशासन भाजपा के कार्यकर्ता के रूप में कठपुतली बनकर काम जा रहा है। यही वजह है कि विपक्षी दल से दूरी बनाए हुए है। उन्होंने इसे लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम का अपमान बताते हुए कहा कि वह इस मामले को विधान परिषद में उठाएंगे। यदि इसके बाद भी प्रशासन का रवैया न बदला तो आंदोलन की रणनीति भी बनाई जाएगी।
श्रेय लेने वालों की लगी रही होड़
पीलीभीत। मुख्यमंत्री केे जनपद आगमन को लेकर विभिन्न जनप्रतिनिधियों में श्रेय लेने की होड़ रहीं। अनशन पर बैठे पूर्व राज्यमंत्री हेमराज वर्मा का दावा है कि उनके अनशन शुरू करते ही शासन हरकत में आया है, जबकि शहर विधायक की मानें तो उनके निवेदन पर मुख्यमंत्री पीलीभीत पहुंचे हैं। बुधवार को मुख्यमंत्री बाघ के बढ़ते हमलों को रोकने को किए गए प्रयासों और बाढ़ की समीक्षा करने पहुंचे थे। पीलीभीत के बाद उन्होंने लखीमपुर व सीतापुर जनपद का भी दौरा कर समीक्षाएं कीं। तीन जनपदों को दौरे को देखते हुए यह नहीं कहा सकता कि मुख्यमंत्री के बाघों के मामले को लेकर पीलीभीत आए थे। उनका यह दौरा किसी एक विशेष कारण से नहीं माना जा सकता। इसके बाद भी आगमन को लेकर दावे किए जा रहे हैं। मुख्यमंत्री के आने का कार्यक्रम मंगलवार को दोपहर बाद आया जबकि पूर्व राज्यमंत्री हेमराज वर्मा ने सुबह ही आमरण अनशन शुरू किया था। ऐसे में उनका दावा है कि बाघों के लगातार हो रहे हमलों के विरोध में उनके अनशन पर बैठने की सूचना के बाद ही शासन चेचा और आनन फानन में मुख्यमंत्री को पीलीभीत आने को विवश होना पड़ा। वहीं दूसरी और शहर विधायक संजय गंगवार का कहना है बाघों के हमलों को लेकर वह दो दिन पूर्व ही लखनऊ जाकर मुख्यमंत्री से मिले थे। इसमें मुख्यमंत्री ने जल्द पीलीभीत आने का आश्वासन दिया था और उनके मिलने के दो दिन बाद ही मुख्यमंत्री उनका अनुरोध स्वीकार कर पीलीभीत आ गए। उधर केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी के प्रवक्ता एमआर मलिक की मानें तो बाघों को लेकर केंद्रीय मंत्री ने मुख्यमंत्री को पत्र लिखाकर एक बैठक करने का अनुरोध किया था। जिसमें स्वयं भी उपस्थित रहने की इच्छा जताई थी। केंद्रीय मंत्री के पत्र को गंभीरता से लेकर ही मुख्यमंत्री ने पीलीभीत में बैठक की है।