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एक करोड़ रुपये खर्च, फिर भी नहीं मिल रहा जले मरीजों को इलाज
सार
नतीजा यह है कि बर्न यूनिट में महज 15 प्रतिशत जले हुए लोगों का ही इलाज संभव हो पा रहा है। सर्जन डॉ. आरएस यादव का कहना है कि बर्न वार्ड में महज 15 प्रतिशत तक जले हुए मरीजों का ही उपचार वह कर पाते हैं। इतने संवेदनशील मुद्दे पर प्रशासन व शासन खामोश बैठा है।न डॉक्टर न संसाधनजिला अस्पताल में बर्न यूनिट को बने दो साल हो गए, लेकिन अब तक न तो पद सृजित किए जा सके और न ही संसाधनों को लेकर कोई कार्रवाई आगे बढ़ सकी है।
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जिला अस्पताल परिसर में बना बर्न यूनिट भवन।
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विस्तार
लीड
फोटो 01
एक करोड़ रुपये खर्च, फिर भी नहीं
मिल रहा जले मरीजों को इलाज
- डॉक्टर और संसाधनों का खुद इंतजार कर रही बर्न यूनिट
- महज 15 प्रतिशत जले मरीजों का ही हो सकता है इलाज
संवाद न्यूज एजेंसी
पीलीभीत। एक करोड़ से अधिक खर्च कर बर्न यूनिट के नाम पर जिला अस्पताल में इमारत तो खड़ी कर ली गई, लेकिन संसाधनों को नहीं जुटा सके। नतीजा यह है कि बर्न यूनिट में महज 15 प्रतिशत जले हुए लोगों का ही इलाज संभव हो पा रहा है। जब कभी भी गंभीर जले हुए मरीज आते हैं तो उन्हें सीएचसी से जिला अस्पताल भेजा जाता है। जिला अस्पताल से बरेली या लखनऊ रेफर कर दिया जाता है। इस दौरान कई मरीज रास्ते में ही दम तोड़ जाते हैं।
दो साल पहले एक करोड़ से अधिक की धनराशि खर्च कर जिला अस्पताल में बर्न यूनिट बनाई गई थी। इसमें तीन हॉल में 30 बेड की व्यवस्था की गई थी। आज तक बर्न यूनिट का ठीक से संचालन नहीं हो पा रहा है। प्रत्येक माह यहां करीब 15-20 आग से झुलसे मरीज आते हैं। जिंदगी की तलाश में जिला अस्पताल में पहुंचने वाले इन मरीजों और तीमारदारों को निराशा ही हाथ लगती है। यहां आकर पता चलता है कि वार्ड महज नाममात्र के लिए है। संसाधन न होने के कारण अधिकांश समय तो यह वार्ड बंद रहता है। जो मरीज आते भी हैं तो उन्हें नाममात्र का उपचार मिल पाता है।
सर्जन डॉ. आरएस यादव का कहना है कि बर्न वार्ड में महज 15 प्रतिशत तक जले हुए मरीजों का ही उपचार वह कर पाते हैं। अगर कोई गंभीर मरीज आता है तो उसे पहले ही बता दिया जाता है कि यहां इलाज नहीं हो सकता। उसे हायर सेंटर रेफर कर दिया जाता है।
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जहानाबाद और माधोटांडा की घटना
के बाद भी किसी ने नहीं ली सुध
बीते दिनों जिले में दो बड़ी घटनाएं हुईं। बीती दो अगस्त को जहानाबाद में पटाखा विस्फोट की घटना के बाद झुलसी तीन लड़कियों को जिला अस्पताल लाया गया था, जहां उनकी मौत हो गई थी। इसके बाद बीती सात सितंबर को माधोटांडा की किशोरी गंभीर रूप से झुलसी अवस्था में जिला अस्पताल में लाई गई थी। यहां तीन दिन तक इलाज के नाम पर खानापूर्ति की गई। किशोरी करीब 80 प्रतिशत तक जल गई थी। 12 दिन बाद लखनऊ केजीएमयू में उसकी मौत हो गई थी। ये घटनाएं काफी हैं यह बताने के लिए कि जिले में अगर आगजनी की बड़ी घटना हो जाए तो जिला अस्पताल की बर्न यूनिट में घायलों को इलाज नहीं मिल सकता। इतने संवेदनशील मुद्दे पर प्रशासन व शासन खामोश बैठा है।
न डॉक्टर न संसाधन
जिला अस्पताल में बर्न यूनिट को बने दो साल हो गए, लेकिन अब तक न तो पद सृजित किए जा सके और न ही संसाधनों को लेकर कोई कार्रवाई आगे बढ़ सकी है। अस्पताल में प्लास्टिक सर्जन तक नहीं है। सर्जन डॉ. आरएस यादव ही मरीजों को देखते हैं। इसके अलावा वेंटिलेटर, ब्लड सेपरेटर यूनिट आदि संसाधन तक नहीं हैं।
दो माह पहले शासन को भेजी थी रिपोर्ट
सीएमएस डॉ. बीएस यादव ने बताया कि दो माह पूर्व शासन से बर्न यूनिट के बारे में जानकारी मांगी गई थी कि कब और किस संस्था ने इसका निर्माण कराया। कब शिलान्यास हुआ। इसके बारे में सीएमएस ने पूरी जानकारी शासन को भेज दी। शासन को बता दिया गया था कि डॉक्टर व संसाधन के अभाव में बर्न यूनिट बंद पड़ी है। इसके बाद से आज तक शासन की तरफ से कोई जवाब नहीं आया।
गंभीर जले मरीजों को हायर सेंटर रेफर कर देते हैं। बर्न यूनिट में अभी महज 15 प्रतिशत जले मरीजों का ही इलाज हो पा रहा है।
- डॉ. बीएस यादव, सीएमएस
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एक करोड़ रुपये खर्च, फिर भी नहीं
मिल रहा जले मरीजों को इलाज
- डॉक्टर और संसाधनों का खुद इंतजार कर रही बर्न यूनिट
- महज 15 प्रतिशत जले मरीजों का ही हो सकता है इलाज
संवाद न्यूज एजेंसी
पीलीभीत। एक करोड़ से अधिक खर्च कर बर्न यूनिट के नाम पर जिला अस्पताल में इमारत तो खड़ी कर ली गई, लेकिन संसाधनों को नहीं जुटा सके। नतीजा यह है कि बर्न यूनिट में महज 15 प्रतिशत जले हुए लोगों का ही इलाज संभव हो पा रहा है। जब कभी भी गंभीर जले हुए मरीज आते हैं तो उन्हें सीएचसी से जिला अस्पताल भेजा जाता है। जिला अस्पताल से बरेली या लखनऊ रेफर कर दिया जाता है। इस दौरान कई मरीज रास्ते में ही दम तोड़ जाते हैं।
दो साल पहले एक करोड़ से अधिक की धनराशि खर्च कर जिला अस्पताल में बर्न यूनिट बनाई गई थी। इसमें तीन हॉल में 30 बेड की व्यवस्था की गई थी। आज तक बर्न यूनिट का ठीक से संचालन नहीं हो पा रहा है। प्रत्येक माह यहां करीब 15-20 आग से झुलसे मरीज आते हैं। जिंदगी की तलाश में जिला अस्पताल में पहुंचने वाले इन मरीजों और तीमारदारों को निराशा ही हाथ लगती है। यहां आकर पता चलता है कि वार्ड महज नाममात्र के लिए है। संसाधन न होने के कारण अधिकांश समय तो यह वार्ड बंद रहता है। जो मरीज आते भी हैं तो उन्हें नाममात्र का उपचार मिल पाता है।
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सर्जन डॉ. आरएस यादव का कहना है कि बर्न वार्ड में महज 15 प्रतिशत तक जले हुए मरीजों का ही उपचार वह कर पाते हैं। अगर कोई गंभीर मरीज आता है तो उसे पहले ही बता दिया जाता है कि यहां इलाज नहीं हो सकता। उसे हायर सेंटर रेफर कर दिया जाता है।
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जहानाबाद और माधोटांडा की घटना
के बाद भी किसी ने नहीं ली सुध
बीते दिनों जिले में दो बड़ी घटनाएं हुईं। बीती दो अगस्त को जहानाबाद में पटाखा विस्फोट की घटना के बाद झुलसी तीन लड़कियों को जिला अस्पताल लाया गया था, जहां उनकी मौत हो गई थी। इसके बाद बीती सात सितंबर को माधोटांडा की किशोरी गंभीर रूप से झुलसी अवस्था में जिला अस्पताल में लाई गई थी। यहां तीन दिन तक इलाज के नाम पर खानापूर्ति की गई। किशोरी करीब 80 प्रतिशत तक जल गई थी। 12 दिन बाद लखनऊ केजीएमयू में उसकी मौत हो गई थी। ये घटनाएं काफी हैं यह बताने के लिए कि जिले में अगर आगजनी की बड़ी घटना हो जाए तो जिला अस्पताल की बर्न यूनिट में घायलों को इलाज नहीं मिल सकता। इतने संवेदनशील मुद्दे पर प्रशासन व शासन खामोश बैठा है।
न डॉक्टर न संसाधन
जिला अस्पताल में बर्न यूनिट को बने दो साल हो गए, लेकिन अब तक न तो पद सृजित किए जा सके और न ही संसाधनों को लेकर कोई कार्रवाई आगे बढ़ सकी है। अस्पताल में प्लास्टिक सर्जन तक नहीं है। सर्जन डॉ. आरएस यादव ही मरीजों को देखते हैं। इसके अलावा वेंटिलेटर, ब्लड सेपरेटर यूनिट आदि संसाधन तक नहीं हैं।
दो माह पहले शासन को भेजी थी रिपोर्ट
सीएमएस डॉ. बीएस यादव ने बताया कि दो माह पूर्व शासन से बर्न यूनिट के बारे में जानकारी मांगी गई थी कि कब और किस संस्था ने इसका निर्माण कराया। कब शिलान्यास हुआ। इसके बारे में सीएमएस ने पूरी जानकारी शासन को भेज दी। शासन को बता दिया गया था कि डॉक्टर व संसाधन के अभाव में बर्न यूनिट बंद पड़ी है। इसके बाद से आज तक शासन की तरफ से कोई जवाब नहीं आया।
गंभीर जले मरीजों को हायर सेंटर रेफर कर देते हैं। बर्न यूनिट में अभी महज 15 प्रतिशत जले मरीजों का ही इलाज हो पा रहा है।
- डॉ. बीएस यादव, सीएमएस