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पीटीआर में अब नहीं दिखता चौसिंघा हिरनों का झुंड

Sun, 22 Nov 2020 12:02 AM IST
Bareily Bureau बरेली ब्यूरो
Updated Sun, 22 Nov 2020 12:02 AM IST
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Nirjala fasting is done by offering arghya to the rising sun
जंगल क्षेत्र सिकुडने और प्राकृतिक आवास घटने से कम होती जा रही संख्या
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सात साल पहले थे 52 और अब घटकर रह गए 10 चौसिंघा
पीलीभीत। पीलीभीत टाइगर रिजर्व में चौसिंघा हिरनों की आबादी कम होती जा रही है। टाइगर रिजर्व के आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2013 में जहां 52 चौसिंघा हिरन थे, वहीं यह संख्या अब घटकर मात्र दस रह गई है। अगर यही हाल रहा तो आने वाले सालों में हिरन की यह दुर्लभ और खूबसूरत चौसिंघा की प्रजाति तराई की धरती से लुप्त हो जाएगी।
पीलीभीत टाइगर रिजर्व बनने के बाद जंगल में बाघ समेत अन्य वन्यजीवों की संख्या में खासा इजाफा हुआ है। वन्यजीव प्रेमियों के मुताबिक, यह एक शुभ संकेत भी है। टाइगर रिजर्व प्रशासन वन्यजीवों के संरक्षण को लेकर बड़े दावे भी कर रहा है, लेकिन इन सबके बीच हिरन की चौसिंघा प्रजाति खतरे में पड़ती जा रही है। टाइगर रिजर्व बनने से साल भर पहले इनकी आबादी बढ़ रही थी। इससे चौसिंघा अकसर खेतों और जंगलों के किनारे दिखाई पड़ जाते थे, मगर एकाएक इनकी आबादी घटना शुरू हो गई है। आज हालात यह है कि जंगल के आसपास इक्का-दुक्का ही चौसिंघा दिखाई पड़ते हैं। जंगल में एक तरफ जहां हिरन की बारहसिंघा, चीतल, सांभर और पाढ़ा प्रजातियों की संख्या बढ़ी है, वहीं चौसिंघा लुप्त होने के कगार पर है।
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जानकारों के मुताबिक, चौसिंघा हिरनों के संरक्षण के प्रति टाइगर रिजर्व की उदासीनता और उनका अवैध शिकार माना जा रहा है। पर्यावरण चिंतक एवं वन्यजीव प्रेमी टीएच खान के मुताबिक, चौसिंघा के लिए तराई की धरती और यहां की जलवायु अनुकूल रही है। बावजूद इसके इनकी संख्या में कमी आना शोध का विषय है। यदि समय रहते इस पर ध्यान नहीं दिया गया तो यह प्रजाति विलुप्त होने के कगार पर भी पहुंच सकती है।
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प्राकृतिक आवास न होना भी एक वजह
जानकारों के मुताबिक जंगल में ग्रासलैंड ही चौसिंघा के प्राकृतिक आवास माने जाते हैं। मगर वन क्षेत्र घटने और घास के मैदानों के बदलते स्वरूप के कारण चौसिंघा हिरनों के लिए प्राकृतिक आवास घटते जा रहे हैं। जानकारों के मुताबिक, जंगल में प्राकृतिक आवास घटने की वजह से चौसिंघा जंगल से बाहर निकलते हैं। खेतों में घुसने की वजह से शिकारियों के हत्थे चढ़ जाते हैं। इनकी संख्या कम होने के पीछे एक बड़ी वजह यही मानी जा रही है।
हर तीन साल में होती है शाकाहारी जीवों की गणना
टाइगर रिजर्व प्रशासन के मुताबिक, शाकाहारी वन्यजीवों की गणना हर तीन साल में होती है। मगर टाइगर रिजर्व प्रशासन अपनी ही गणना को मानने को तैयार नहीं है। उनका तर्क है कि गणना तो हर तीन साल बाद होती है, लेकिन यह मात्र तीन दिन होती है। तीन दिन में जितने वन्यजीव दिख जाते हैं, उन्हें ही काउंट किया जाता है। फिलहाल टाइगर रिजर्व प्रशासन इसको लेकर भले ही अपना अलग तर्क दे रहा हो, लेकिन जंगलों में या फिर जंगलों के किनारे चौसिंघा के झुंड अब देखने को नहीं मिलते हैं।
हिरन की खूबसूरत प्रजाति है चौसिंघा
चौसिंघा हिरन की प्रजाति में सबसे खूबसूरत प्रजाति मानी गई है। चार सींगों वाले इस हिरन की ऊंचाई करीब दो फुट होती है। मादा चौसिंघा के सींग नहीं होते हैं।

यह हैं टाइगर रिजर्व में हिरन प्रजातियों के आंकड़े
वर्ष सांभर चीतल चौसिंघा बारहसिंघा
2013 78 3514 52 340
2016 195 4104 52 561
2019 231 5276 10 845
टाइगर रिजर्व में बाघ समेत अन्य वन्यजीवों की संख्या में खासी बढ़ोतरी हो रही है। शाकाहारी जीवों की गणना मात्र तीन दिन की जाती है। इस दौरान जिस प्रजाति के जितने जीव दिख जाते हैं, उन्हें ही गणना में शामिल किया जाता है।
- नवीन खंडेलवाल, डिप्टी डायरेक्टर, टाइगर रिजर्व
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