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Pilibhit News: पीटीआर की 1500 हेक्टेयर जमीन पर अवैध कब्जे, भटककर बाहर आ रहे बाघ और हाथी

Fri, 02 Aug 2024 10:25 PM IST
Bareily Bureau बरेली ब्यूरो
Updated Fri, 02 Aug 2024 10:25 PM IST
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Illegal occupation of 1500 hectares of PTR land, tigers and elephants wandering out
पीलीभीत टाइगर रिजर्व का सिग्नेचर गेट।संवाद
पीलीभीत। बाघ समेत वन्यजीवों की बढ़ती संख्या के साथ जंगल का दायरा बढ़ाने के दावों के बीच वन भूमि का अतिक्रमण पीटीआर प्रशासन के लिए चुनौती बना हुआ है। हजारों एकड़ वन भूमि पर अवैध कब्जे हैं। विभाग के आंकड़ों में 1500 हेक्टेयर भूमि पर अवैध कब्जे माने जा रहे हैं। लंबे समय से अवैध कब्जों को हटाने की बात कही जा रही है, लेकिन अब तक इस पर अमल नहीं हो सका है। इससे वन्यजीव जंगल से बाहर निकल रहे हैं।
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पीलीभीत टाइगर रिजर्व का जंगल 73 हजार वर्ग हेक्टेयर में फैला हुआ है। जिसकी एक सीमा नेपाल और दूसरी उत्तराखंड के जंगल से मिली हुई है। पीटीआर में 72 बाघों के अलावा भालू, तेंदुआ और हिरन की संख्या भी काफी अधिक है। इसके अलावा नेपाल और उत्तराखंड की सीमा से भी वन्यजीवों की आवाजाही होती रहती है।
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संख्या बढ़ने के बाद जंगल का दायरा सिकुड़ने की बात कही जाने लगी। इसके लिए वन्यजीवों के प्राकृतिक काॅरिडोर को सुरक्षित रखने पर जोर दिया जाना लगा, लेकिन वन भूमि के नासूर बन चुके अवैध कब्जों को खाली कराने पर गंभीरता नहीं बरती गई।
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वन भूमि के अतिक्रमण की बात करें तो सबसे अधिक कब्जे पीटीआर की बराही रेंज के अंतर्गत शारदा नदी के पार हैं। यहां ढकिया ताल्लुके महाराजपुर, रमनगरा, गुन्हान और बिजोरी खुर्दकला में वन विभाग की जमीन है। इन गांवों में पड़ने वाली 70 फीसदी जंगल की जमीन पर अवैध कब्जे हैं। लंबे समय से खेती की जा रही है।
अवैध कब्जों के चलते वन्यजीवों को खुले में चहलकदमी करने में भी दिक्कत आने लगी है। नेपाल से आने वाले हाथी भी प्राकृतिक कॉरिडोर नष्ट होने के चलते भटकने लगे हैं तो बाघ समेत अन्य वन्यजीव भी जंगल से बाहर आ जाते हैं।
स्थिति को नियंत्रण रखने के लिए विभाग की ओर से ग्रामीणों को जागरूक करने पर जोर दिया जा रहा है, लेकिन जंगल का दायरा बढ़ाने के लिए अवैध कब्जे के खिलाफ अभियान फिलहाल ठंडे बस्ते में है।

डिप्टी डायरेक्टर मनीष सिंह कहना है कि वन भूमि पर जहां भी अतिक्रमण है उसको खाली करने के प्रयास किए जाएंगे। इसके लिए योजना बनाकर अमल शुरू किया जाएगा।
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पट्टों की आड़ में बढ़ गए कब्जे

शारदा नदी के पार वर्ष 1965 से 1971 तक पूर्वी पाकिस्तान से आए बंगाली विस्थापित परिवारों को सरकार ने पांच-पांच एकड़ कृषि भूमि और आवास बनवाकर जिला पुनर्वासन विभाग के माध्यम से पट्टे दिए थे। यह भूमि वन विभाग की थी। इस बीच यहां बाढ़ आ गई। इसके बाद वर्ष 1999 में वन विभाग ने भूमि को राजस्व अभिलेखों में दर्ज करा लिया। इसके बावजूद यहां एक बड़े इलाके में जंगल की जमीन पर कब्जे हैं। जब भी मामला सुर्खियों में आता है तब वन और राजस्व विभाग के अफसर संयुक्त सीमांकन का बहाना बनाकर मामले को रफादफा कर देते हैं।
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