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उच्च न्यायालय ने रामस्वरूप की चार साल की सजा निरस्त की
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पीलीभीत। थाना जहानाबाद क्षेत्र के गांव कल्याणपुर चक्रतीर्थ निवासी रामस्वरूप को 30 साल पहले जिला अदालत से सुनाई गई। चार साल की सजा को उच्च न्यायालय ने अपील की सुनवाई के बाद निरस्त कर दिया है। रामस्वरूप की अपील तीन दशक से उच्च न्यायालय में विचाराधीन थी। वह जमानत पर हैं।
घटनाक्रम के अनुसार थाना जहानाबाद पर 13 अक्तूबर 1988 को भगवान दास ने रिपोर्ट दर्ज कराई। रिपोर्ट के अनुसार ग्राम प्रधान चुनाव की रंजिश को लेकर 12 अक्तूबर 1988 को रात 11 बजे गांव कल्याणपुर चक्रतीर्थ निवासी रामस्वरूप पुत्र लीलाधर ने उन पर व कृपाली पर जान से मारने की नियत से फायर किया। भूदेव और बुद्धि गिरी भी साथ में थे। शोर पर गांव के लोग टॉर्च जलाते हुए आ गए तब हमलावर भाग गए। पुलिस ने मामले में न्यायालय में आरोप पत्र दाखिल किया था। मामले की सुनवाई के बाद सात मई 1991 को अपर सत्र न्यायाधीश तृतीय विष्णु दत्त दुबे ने संदेह का लाभ देते हुए भूदेव और बुद्धि गिरी को दोषमुक्त कर दिया था। न्यायालय ने रामस्वरूप को दोषी पाकर चार साल की सजा सुनाई थी। इस सजा के खिलाफ रामस्वरूप ने उच्च न्यायालय में फौजदारी अपील नंबर 986 वर्ष 1991 दायर की थी और सजा को गलत बताते हुए दोष मुक्त करने की मांग की थी। हाईकोर्ट के आदेश से रामस्वरूप बीते तीन दशक से जमानत पर हैं। उच्च न्यायालय में रामस्वरूप की ओर से पैरवी कर रहे अधिवक्ता जितेंद्र पाल सिंह ने बताया कि उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति अनिल कुमार ओझा ने रामस्वरूप की अपील पर सुनवाई की। उच्च न्यायालय ने 27 सितंबर 2021 को पारित अपने आदेश में अपील मंजूर कर ली है। निचली अदालत द्वारा सुनाई गई सजा को समाप्त कर दिया है। इस प्रकार रामस्वरूप तीन दशक के लंबे अंतराल के बाद सजा के आरोप से दोषमुक्त हो गए हैं।
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घटनाक्रम के अनुसार थाना जहानाबाद पर 13 अक्तूबर 1988 को भगवान दास ने रिपोर्ट दर्ज कराई। रिपोर्ट के अनुसार ग्राम प्रधान चुनाव की रंजिश को लेकर 12 अक्तूबर 1988 को रात 11 बजे गांव कल्याणपुर चक्रतीर्थ निवासी रामस्वरूप पुत्र लीलाधर ने उन पर व कृपाली पर जान से मारने की नियत से फायर किया। भूदेव और बुद्धि गिरी भी साथ में थे। शोर पर गांव के लोग टॉर्च जलाते हुए आ गए तब हमलावर भाग गए। पुलिस ने मामले में न्यायालय में आरोप पत्र दाखिल किया था। मामले की सुनवाई के बाद सात मई 1991 को अपर सत्र न्यायाधीश तृतीय विष्णु दत्त दुबे ने संदेह का लाभ देते हुए भूदेव और बुद्धि गिरी को दोषमुक्त कर दिया था। न्यायालय ने रामस्वरूप को दोषी पाकर चार साल की सजा सुनाई थी। इस सजा के खिलाफ रामस्वरूप ने उच्च न्यायालय में फौजदारी अपील नंबर 986 वर्ष 1991 दायर की थी और सजा को गलत बताते हुए दोष मुक्त करने की मांग की थी। हाईकोर्ट के आदेश से रामस्वरूप बीते तीन दशक से जमानत पर हैं। उच्च न्यायालय में रामस्वरूप की ओर से पैरवी कर रहे अधिवक्ता जितेंद्र पाल सिंह ने बताया कि उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति अनिल कुमार ओझा ने रामस्वरूप की अपील पर सुनवाई की। उच्च न्यायालय ने 27 सितंबर 2021 को पारित अपने आदेश में अपील मंजूर कर ली है। निचली अदालत द्वारा सुनाई गई सजा को समाप्त कर दिया है। इस प्रकार रामस्वरूप तीन दशक के लंबे अंतराल के बाद सजा के आरोप से दोषमुक्त हो गए हैं।
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