फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Pilibhit News ›   Five billion loss-making cooperative sugar mills

पांच अरब के घाटे में चल रही सहकारी चीनी मिलें

Sun, 23 Aug 2015 10:52 PM IST
Pilibhit
Pilibhit Updated Sun, 23 Aug 2015 10:52 PM IST
विज्ञापन

जिले का चीनी उद्योग संकट में हैं। मझोला चीनी मिल व डिस्टलरी घाटे के चलते एक दशक पहले बंद हो चुकी है। पूरनपुर और बीसलपुर में स्थापित चीनी मिलें क्रमश: तीन व दो अरब के घाटे में चल रहीं हैं। निजी क्षेत्र की बरखेड़ा चीनी मिल की हालत भी खराब है। पिछले पेराई सत्र में बकाया गन्ना मूल्य भुगतान करने के लिए प्रशासन को उसकी चीनी कुर्क कर नीलाम करनी पड़ी थी। इस साल भी वह घाटे के चलते किसानों का करोड़ों रुपये दाबे बैठी है। पीलीभीत में स्थापित दूसरी निजी चीनी मिल की भी स्थिति ठीक नहीं है। तराई के इस जिले की मुख्य फसल भी गन्ना है। लिहाजा चीनी उद्योग के घाटे के चलते किसानों से लेकर उससे जुड़े कर्मचारियों तक के माथे पर चिंता की लकीरें खिंच गई हैं।

विज्ञापन

1975 में स्थापित बीसलपुर की चीनी मिल वर्ष 1990 तक तो बहुत अच्छे ढंग से चलती रही। 90 में तो इस मिल को प्रदेश में सर्वाधिक चीनी उत्पादकता का पुरस्कार मिल चुका है। उसके बाद इस मिल को ऐसी नजर लगी कि लगातार घाटे में जाने लगी। वर्ष 1991 में लगभग 10 लाख का पहला घाटा हुआ। किसानों की मानें तो इस घाटे से उबरने के लिए प्रबंधतंत्र ने कोई प्रयास नहीं किया। लूटखसोट होती रही और मिल साल दर साल घाटे में जाती रही। बीते पेराई सत्र में ही इस मिल को करीब 60 करोड़ रुपये का घाटा हुआ। इस प्रकार वर्ष 1991 से अब तक इस मिल को करीब दो अरब का घाटा हो चुका है। मिल में इस समय लगभग 500 कर्मचारी हैं, जिनमें 200 स्थाई, 300 अस्थाई कर्मचारी हैं। इस मिल को करीब 27 हजार किसान गन्ना आपूर्ति करते हैं। किसानों को आशंका है कि घाटे के चलते यह चीनी मिल भी कभी भी बंद की जा सकती है। यह आशंका उनकी चिंता का विषय बना हुआ है।
विज्ञापन

पूरनपुर की बेती मिल मौजूदा पेराई सत्र में करीब 50 करोड़ रुपये के घाटे में रही। 1985-86 में मिल ने अपना पहला पेराई सत्र शुरू किया था। मिल में वर्तमान समय में 128 सीजनल और 110 स्थाई कर्मचारी है। चीनी मिल की स्थिति शुरू के चार साल तक तो ठीक-ठाक रही, लेकिन वर्ष 2000 से घाटा होने लगा, जो साल दर साल बढ़ता गया। अब तक लगभग तीन अरब का घाटा हो चुका है। कर्मचारियों का मानना है कि अधिक लागत पर तैयार होने वाली चीनी करीब 18 सौ रुपये प्रति क्विंटल कम पर बिक रही है। कर्मचारियों का कहना है कि बाइस सौ रुपये क्विंटल बिकने वाली चीनी को बनाने में करीब चार हजार रुपये की लागत आती है।
विज्ञापन
विज्ञापन


0
क्षेत्र में अनुपयुक्त प्रजाति के गन्ने की पैदावार अधिक होने, बैंक से ब्याज पर लिए हुए कर्ज से किसानों का भुगतान करने और चीनी का रेट कम होने के कारण मिल को लगातार घाटा हो रहा है।
सुरेश चंद्रा, प्रधान प्रबंधक चीनी मिल बीसलपुर

निजी चीनी मिलें पहले अपना हित देखती हैं, जबकि सहकारी चीनी मिल के लिए किसानों का हित सर्वोपरि होता है। अधिकांश किसान अभी भी अनुपयुक्त प्रजाति का गन्ना अपने खेतों में बो रहे हैं। इससे नुकसान हो रहा है। चीनी मिलों को घाटे से उबारने की दशा में किसानों से उस प्रजाति के गन्ने को बोने के लिए कहा जा रहा है, जिसकी रिकवरी बेहतर हो। शासन के उच्चाधिकारियों को भी स्थिति से अवगत करा मिलों को घाटे में उबारने की हर संभव प्रयास किए जाएंगे।

मासूम अली सरवर, जिलाधिकारी

मिल के घाटे में जाने लिए अधिकारी व सरकारें जिम्मेदार हैं। चीनी का रेट बाजार में कम होने की बात कह घाटे की बात कहना गलत है। चीनी के रेट में पिछले एक दो सालों में गिरावट आई है। घाटे से उबारने के लिए शासन, प्रशासन की ओर से जो प्रयास किए जाने चाहिए थे वह नहीं हुए। किसान को मिलें सिर्फ उसका बकाया गन्ना मूल्य का भुगतान देती हैं। मिल के फायदे में जब किसान को कुछ नहीं मिलता तो घाटे में जाने पर उसपर तोहमत लगाना उचित नहीं है।
वीएम सिंह, किसान नेता

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed