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किसानों को बजट में सिर्फ झुनझुना
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पीलीभीत। राष्ट्रीय किसान मजदूर संगठन के अध्यक्ष वीएम सिंह ने कहा कि एमएसपी(न्यूनतम समर्थन मूल्य) किसानों का सबसे बड़ा मुद्दा था। वर्ष 2022 के बजट में केंद्र सरकार ने एमएसपी पर खरीद, रसायन मुक्त खेती और खेती में तकनीकी इस्तेमाल के लिए 2,37,000 करोड़ बजट का प्रावधान किया है जबकि पिछले वर्ष एमएसपी के जरिये 2,84,316 करोड़ रुपये की खरीद हो गई थी। इस हिसाब से एमएसपी पर खरीद का एलोकेशन (बजट की धनराशि) ही कम कर दिया गया है तो फिर क्यों न कहा जाए कि किसानों के लिए इस बजट में कुछ नहीं है। सिर्फ कुछ बातों का झुनुझुना थमाया गया है।
वीएम सिंह ने कहा कि आंकड़ों पर गौर करें तो पिछले सत्र में एमएसपी के जरिये 75,060 करोड़ का गेहूं और 1,72,752 करोड़ का धान, 10530 करोड़ की दालें और 25,974 करोड़ रुपये का कपास खरीदा गया। यह धनराशि कुल 2,84,316 करोड़ रुपये होती है। अबकी बार इसमें कटौती हुई है। उन्होंने कहा कि दो वर्ष से महामारी की विषम परिस्थितियों का सामना करते हुए किसान देश को खिला रहा है और आज फसल का वाजिब दाम न मिलने पर बहुत परेशान हो रहा है। इसलिए हमें उम्मीद थी कि केंद्र सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य पर उपज खरीदे जाने की गारंटी देगी पर ऐसा कुछ नहीं हुआ। हालात बहुत खराब हैं। गन्ने का भुगतान समय पर नहीं हो रहा। किसानों को धान ओने-पौने दाम में बेचना पड़ा। गेहूं की सरकारी खरीद में बिचौलिए हावी रहे। अब तक के हालात तो यही हैं कि सरकार किसान की आमदनी दोगुनी कराने के लिए दावे करती रही और किसान की उपज लुटती रही।
केंद्र सरकार के इस बजट ने भी किसानों को निराश किया है। प्रधानमंत्री ने 2017 के विधानसभा चुनाव के वक्त कहा था कि गन्ना मूल्य का भुगतान 14 दिन में होगा। अगर भुगतान नहीं होता है तो ब्याज मिलेगा पर न ब्याज मिला और न ही समय पर भुगतान हाथ आया। अदालत में केस चला। अदालत के आदेश के बाद भी सरकार किसानों को बकाया गन्ना मूल्य पर ब्याज का भुगतान नहीं करा सकी। अवमानना का मामला अब अदालत में चल रहा है। उन्होंने कहा कि पीएम ने यह भी कहा था कि 2022 में किसानों की आमदनी दोगुनी कराएंगे वो तो हुई नहीं और इस बजट में भी आमदनी दोगुनी करने के लिए कोई रास्ता सामने नहीं आया है। किस तरह से आमदनी दोगुनी कराएंगे? यह सवाल आज भी बरकरार है।
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अगर देश की अर्थव्यवस्था को बचाने और किसान को मजबूत करने के लिए एमएसपी की गारंटी दी जाती तो एक एकड़ में किसान के पास कम से कम दस हजार की आमदनी अधिक हो सकती थी। देश के बाजार कम से कम पांच लाख करोड़ रुपये का प्रवाह बढ़ता क्योंकि किसान न जेब में पैसा रखता है और न बैंक में जो भी पैसा आता है वह खर्च करता है। किसान के पैसे से रोजगार के साथ बाजार को विस्तार मिलता है। मेरा यही कहना है कि किसान खुशहाल होते हैं तो देश के हर सेक्टर को बढ़ावा मिलता है। मुझे बजट में किसानों की खुशहाली का कोई मजबूत उपाय नहीं दिखाई पड़ा।
- वीएम सिंह, किसान नेता
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वीएम सिंह ने कहा कि आंकड़ों पर गौर करें तो पिछले सत्र में एमएसपी के जरिये 75,060 करोड़ का गेहूं और 1,72,752 करोड़ का धान, 10530 करोड़ की दालें और 25,974 करोड़ रुपये का कपास खरीदा गया। यह धनराशि कुल 2,84,316 करोड़ रुपये होती है। अबकी बार इसमें कटौती हुई है। उन्होंने कहा कि दो वर्ष से महामारी की विषम परिस्थितियों का सामना करते हुए किसान देश को खिला रहा है और आज फसल का वाजिब दाम न मिलने पर बहुत परेशान हो रहा है। इसलिए हमें उम्मीद थी कि केंद्र सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य पर उपज खरीदे जाने की गारंटी देगी पर ऐसा कुछ नहीं हुआ। हालात बहुत खराब हैं। गन्ने का भुगतान समय पर नहीं हो रहा। किसानों को धान ओने-पौने दाम में बेचना पड़ा। गेहूं की सरकारी खरीद में बिचौलिए हावी रहे। अब तक के हालात तो यही हैं कि सरकार किसान की आमदनी दोगुनी कराने के लिए दावे करती रही और किसान की उपज लुटती रही।
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केंद्र सरकार के इस बजट ने भी किसानों को निराश किया है। प्रधानमंत्री ने 2017 के विधानसभा चुनाव के वक्त कहा था कि गन्ना मूल्य का भुगतान 14 दिन में होगा। अगर भुगतान नहीं होता है तो ब्याज मिलेगा पर न ब्याज मिला और न ही समय पर भुगतान हाथ आया। अदालत में केस चला। अदालत के आदेश के बाद भी सरकार किसानों को बकाया गन्ना मूल्य पर ब्याज का भुगतान नहीं करा सकी। अवमानना का मामला अब अदालत में चल रहा है। उन्होंने कहा कि पीएम ने यह भी कहा था कि 2022 में किसानों की आमदनी दोगुनी कराएंगे वो तो हुई नहीं और इस बजट में भी आमदनी दोगुनी करने के लिए कोई रास्ता सामने नहीं आया है। किस तरह से आमदनी दोगुनी कराएंगे? यह सवाल आज भी बरकरार है।
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अगर देश की अर्थव्यवस्था को बचाने और किसान को मजबूत करने के लिए एमएसपी की गारंटी दी जाती तो एक एकड़ में किसान के पास कम से कम दस हजार की आमदनी अधिक हो सकती थी। देश के बाजार कम से कम पांच लाख करोड़ रुपये का प्रवाह बढ़ता क्योंकि किसान न जेब में पैसा रखता है और न बैंक में जो भी पैसा आता है वह खर्च करता है। किसान के पैसे से रोजगार के साथ बाजार को विस्तार मिलता है। मेरा यही कहना है कि किसान खुशहाल होते हैं तो देश के हर सेक्टर को बढ़ावा मिलता है। मुझे बजट में किसानों की खुशहाली का कोई मजबूत उपाय नहीं दिखाई पड़ा।
- वीएम सिंह, किसान नेता