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महंगी पढ़ाई ने तोड़ी अभिभावकों की कमर
ब्यूरो /पीलीभीत
Updated Thu, 20 Apr 2017 10:48 PM IST
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निजी इंग्लिश मीडियम स्कूलों में नए एकेडेमिक सेशन की शुरूआत हो चुकी है। शिक्षा के नाम पर मोटी फीस से लेेकर कॉपी किताबें, ड्रेस आदि को लेकर अभिभावकों की जेबों पर जमकर डाका डाला जा रहा है। हर साल सेलेबेस व ड्रेस बदलने की वजह भी अभिभावक कमीशनखोरी होना मान रहे हैं। कुल मिलाकर देखा जाए तो अंग्रेजी स्कूलों में बच्चों को पढ़ाना अब एक मध्यमवर्गीय परिवार तक के बूते से बाहर होता जा रहा है।जिले में अंग्रेजी माध्यम के 15 से अधिक स्कूल कॉलेज हैं। इन स्कूल कॉलेजों में नए सत्र की शुरूआत होने के साथ ही अभिभावकों के माथे पर चिंता की लकीरें साफ दिखाई दे रही है। आखिर हो भी क्यों न, अंग्रेजी स्कूलों में अपने बच्चे को पढ़ाने की ललक इन सभी की जमकर जेबें ढीली कर रही है। बानगी के तौर पर यदि वर्तमान में यदि कक्षा एक में पढ़ने वाले बच्चे पर सालभर के खर्च पर गौर करें तो इस पर अभिभावकों को एक बच्चे पर करीब 27 से 30 हजार रुपये खर्च करने पड़ रहे हैं। अंग्रेजी स्कूलों में कक्षा एक का सेलेबस करीब 2500 रुपये, वहीं केंद्रीय विद्यालय का सेलेबस महज 800 रुपये में मिलता है। कक्षा आठ में पढ़ने वाले बच्चे पर साल भर में होने वाले खर्च को देखा जाए तो एक बच्चे पर साल भर में 50 हजार रुपये से अधिक का खर्च आता है।
हर जगह चलता है मनमानी का खेल
अभिभावकों को एडमिशन की शुरूआत से ही आर्थिक शोषण का दंश झेलना पड़ता है। प्रवेश फार्म के नाम पर 150 से 200 रुपये फिर डोनेशन के नाम पर तीन हजार रुपये तक की रकम वसूली जाती है। इसके अलावा प्रत्येक स्कूल कॉलेज अपने मनमर्जी के मुताबिक हर माह फीस वसूलता है। इसके साथ साल भर गेम्स, प्रोजेक्ट, टूअर आदि के नाम पर जमकर दोहन होता है।
हर साल बदल जाता है सेलेबेस
स्कूल कॉलेजों में हर साल ही सेलेबस बदल दिया जाता है। निजी स्कूल प्रबंधन व निजी प्रकाशकों के बीच साठगांठ हो जाती है। जो निजी प्रकाशक ज्यादा कमीशन देगा, स्कूल में उसी प्रकाशन की किताबों की पढ़ाई जाएगी। इस कमीशनखोरी में अभिभावक खुद को लाचार महसूस कर रहे हैं। स्कूलों में हर साल सेलेबस बदलने से अभिभावक को मोटी रकम खर्च करना मजबूरी बन जाता है।
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हर जगह चलता है मनमानी का खेल
अभिभावकों को एडमिशन की शुरूआत से ही आर्थिक शोषण का दंश झेलना पड़ता है। प्रवेश फार्म के नाम पर 150 से 200 रुपये फिर डोनेशन के नाम पर तीन हजार रुपये तक की रकम वसूली जाती है। इसके अलावा प्रत्येक स्कूल कॉलेज अपने मनमर्जी के मुताबिक हर माह फीस वसूलता है। इसके साथ साल भर गेम्स, प्रोजेक्ट, टूअर आदि के नाम पर जमकर दोहन होता है।
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हर साल बदल जाता है सेलेबेस
स्कूल कॉलेजों में हर साल ही सेलेबस बदल दिया जाता है। निजी स्कूल प्रबंधन व निजी प्रकाशकों के बीच साठगांठ हो जाती है। जो निजी प्रकाशक ज्यादा कमीशन देगा, स्कूल में उसी प्रकाशन की किताबों की पढ़ाई जाएगी। इस कमीशनखोरी में अभिभावक खुद को लाचार महसूस कर रहे हैं। स्कूलों में हर साल सेलेबस बदलने से अभिभावक को मोटी रकम खर्च करना मजबूरी बन जाता है।
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