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.. क्या रेप छुपाना चाहती है पीलीभीत पुलिस
Pilibhit
Updated Sat, 19 Sep 2015 11:16 PM IST
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जिरौनिया में कथित रेप के बाद दलित छात्रा की हत्या के मामले में शुरू से ही गंभीर नहीं दिख रही पुलिस का एक-एक कर झूठ बोलना भी सामने आ रहा है। एसपी से लेकर एसओ ने पोस्टमार्टम के अगले दिन कहा था कि रेप की पुष्टि के लिए बनाई गई स्लाइड जांच के लिए जिला अस्पताल की पैथालॉजी में भेज दी गई है, लेकिन जब अमर उजाला ने पड़ताल की तो तीसरे दिन भी स्लाइड पैथालॉजी नहीं पहुंची। इससे साफ है कि पुलिस दलित छात्रा के साथ हुई दरिंदगी को छुपाने की पूरी कोशिश कर रही है। उसकी यह कोशिश कामयाब होती भी दिख रही है। वजह यह है कि घटना के 24 से 48 घंटे बाद स्पर्म स्वत: समाप्त हो जाते हैं। 48 घंटे में जांच होने पर स्पर्म मिलने की नाममात्र की संभावना रहती है, लेकिन अब तो वह भी खत्म हो गई।
जिरौनिया गांव में दलित छात्रा रामकली की कथित रेप के बाद की गई हत्या मामले में पुलिस ने रेप की घटना को शुरू से ही छुपाने का प्रयास किया था। एसपी जवाहर से लेकर एसओ सुरेश कुमार सिंह तक घटना के तथ्यों को लेकर झूठ बोलते रहे। पहला झूठ छात्रा रामकली के निचले शरीर के कपड़े खुले होने की बात को नकार कर पुलिस ने बोला। प्राइवेट पार्ट पर खून, चोटों के निशान आदि न होने की बात कहकर पुलिस दूसरा झूठ बोली। पोस्टमार्टम रिपोर्ट भी पुलिस के मुताबिक बोले गए झूठ से मेल खाती मिली। पोस्टमार्टम के बाद रेप की पुष्टि के लिए छात्रा की बनाई गई स्लाइड उसी दिन डॉक्टरों के पैनल ने बरखेड़ा पुलिस को सौंप दी थी, लेकिन पुलिस की मंशा ठीक नहीं थी, इसलिए स्लाइड जांच के लिए पैथालॉजी नहीं भेजी गई, जबकि एसपी और एसओ ने दावा किया था कि पोस्टमार्टम के अगले दिन ही स्लाइड जांच के लिए जिला अस्पताल की पैथालॉजी भेज दी गई। पुलिस का यह झूठ अमर उजाला की तहकीकात में खुल गया।
शनिवार को रिपोर्टर ने जब पड़ताल की तो पैथालॉजी में एक 35 वर्षीय महिला रामकली के नाम की एक स्लाइड मिली, लेकिन छात्रा रामकली की स्लाइड पैथालॉजी में नहीं थी। पैथालॉजी प्रभारी डॉ. महावीर सिंह से जब पूछा गया तो उन्होंने बताया कि बरखेड़ा थाने से कोई स्लाइड जांच के लिए नहीं आई। जब एसओ से पूछा गया तो वह हक्के बक्के रह गए। बोले, मालूम पड़ता है कि आज जा रही है। डॉक्टरों के मुताबिक घटना से स्लाइड पर स्पर्म 48 घंटे तक मिलने की संभावना रहती है। इसके बाद वह स्वत: समाप्त हो जाते हैं। ऐसे में दलित छात्रा की पोस्टमार्टम के बाद बनाई गई स्लाइड को 48 घंटे के भीतर पैथालॉजी न भेजना पुलिस की कार्यप्रणाली पर स्वत: सवालिया निशान लगा रहा है। यदि अब पुलिस स्लाइड को जांच के लिए भेजती भी है तो वह 48 घंटे बाद ही पैथालॉजी पहुंचेगी और ऐसे में अगर उस पर स्पर्म रहे भी होंगे तो वह स्वत: नष्ट हो गए होंगे। इससे साफ होता है कि पुलिस का रेप छुपाने का जो मकसद था वह कामयाब हो जाएगा।
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एसओ से मोबाइल से हुई वार्ता के कुछ अंश
रिपोर्टर- हैलो.. मैं अमर उजाला से बोल रहा हूं, जी.. जी बताइए। छात्रा रामकली के मामले में क्या स्लाइड जांच के लिए भेजी है। हां... हां कहने के बात एसओ सुरेश कुमार सिंह कहते हैं क्या जांच के लिए... , रिपोर्टर- जी..., एसओ- हम लोग तो भेज देते हैं।, रिपोर्टर: पैथालॉजी के डॉक्टर कह रहे हैं कि यहां तो नहीं आई है।, एसओ-नहीं... नहीं मालूम पड़ता है कि आज जा रही है।
जरूरी नहीं 24 घंटे बाद स्पर्म मिल ही जाए
जिला अस्पताल के डॉ. महावीर सिंह बताते हैं कि घटना के 24 घंटे तक स्पर्म जीवित रहते हैं। स्पर्म के मिलने की संभावना 48 घंटे तक रहती है। इसलिए स्लाइड बनाई जाती है, लेकिन कोई जरूरी नहीं है कि स्पर्म मिल ही जाएगा।
ये होती है जांच की प्रक्रिया
महिला डॉक्टर रेप की पुष्टि के लिए स्लाइड बनाकर पीड़िता को लाने वाली पुलिस को सौंप देती है। नियमानुसार यदि स्लाइड मिलने तक पैथालॉजी खुली हो तो संबंधित पुलिसकर्मी को जांच के लिए उसी समय स्लाइड पैथालॉजी में जमा करनी होती है। यदि पैथालॉजी बंद है तो उसे हर हालत में अगले दिन जमा कर जांच करानी चाहिए।
एसपी ने दी सफाई
एसपी जवाहर ने बताया कि यह महिला डॉक्टर की जिम्मेंदारी होती है कि वह स्लाइड जांच को लिए भेजे, लेकिन डॉक्टर ने एसपी के नाम से नाखून, सिर के बाल और स्लाइड का अलग अलग लिफाफा सील कर पुलिस को दे दिया। पुलिस को क्या पता कि किस लिफाफे में क्या है। वह सीएमओ से वार्ता करेंगे। यदि जरूरी हुआ तो स्लाइड को आज ही जांच के लिए विधि विज्ञान प्रयोगशाला लखनऊ भेजेंगे।
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जिरौनिया गांव में दलित छात्रा रामकली की कथित रेप के बाद की गई हत्या मामले में पुलिस ने रेप की घटना को शुरू से ही छुपाने का प्रयास किया था। एसपी जवाहर से लेकर एसओ सुरेश कुमार सिंह तक घटना के तथ्यों को लेकर झूठ बोलते रहे। पहला झूठ छात्रा रामकली के निचले शरीर के कपड़े खुले होने की बात को नकार कर पुलिस ने बोला। प्राइवेट पार्ट पर खून, चोटों के निशान आदि न होने की बात कहकर पुलिस दूसरा झूठ बोली। पोस्टमार्टम रिपोर्ट भी पुलिस के मुताबिक बोले गए झूठ से मेल खाती मिली। पोस्टमार्टम के बाद रेप की पुष्टि के लिए छात्रा की बनाई गई स्लाइड उसी दिन डॉक्टरों के पैनल ने बरखेड़ा पुलिस को सौंप दी थी, लेकिन पुलिस की मंशा ठीक नहीं थी, इसलिए स्लाइड जांच के लिए पैथालॉजी नहीं भेजी गई, जबकि एसपी और एसओ ने दावा किया था कि पोस्टमार्टम के अगले दिन ही स्लाइड जांच के लिए जिला अस्पताल की पैथालॉजी भेज दी गई। पुलिस का यह झूठ अमर उजाला की तहकीकात में खुल गया।
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शनिवार को रिपोर्टर ने जब पड़ताल की तो पैथालॉजी में एक 35 वर्षीय महिला रामकली के नाम की एक स्लाइड मिली, लेकिन छात्रा रामकली की स्लाइड पैथालॉजी में नहीं थी। पैथालॉजी प्रभारी डॉ. महावीर सिंह से जब पूछा गया तो उन्होंने बताया कि बरखेड़ा थाने से कोई स्लाइड जांच के लिए नहीं आई। जब एसओ से पूछा गया तो वह हक्के बक्के रह गए। बोले, मालूम पड़ता है कि आज जा रही है। डॉक्टरों के मुताबिक घटना से स्लाइड पर स्पर्म 48 घंटे तक मिलने की संभावना रहती है। इसके बाद वह स्वत: समाप्त हो जाते हैं। ऐसे में दलित छात्रा की पोस्टमार्टम के बाद बनाई गई स्लाइड को 48 घंटे के भीतर पैथालॉजी न भेजना पुलिस की कार्यप्रणाली पर स्वत: सवालिया निशान लगा रहा है। यदि अब पुलिस स्लाइड को जांच के लिए भेजती भी है तो वह 48 घंटे बाद ही पैथालॉजी पहुंचेगी और ऐसे में अगर उस पर स्पर्म रहे भी होंगे तो वह स्वत: नष्ट हो गए होंगे। इससे साफ होता है कि पुलिस का रेप छुपाने का जो मकसद था वह कामयाब हो जाएगा।
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एसओ से मोबाइल से हुई वार्ता के कुछ अंश
रिपोर्टर- हैलो.. मैं अमर उजाला से बोल रहा हूं, जी.. जी बताइए। छात्रा रामकली के मामले में क्या स्लाइड जांच के लिए भेजी है। हां... हां कहने के बात एसओ सुरेश कुमार सिंह कहते हैं क्या जांच के लिए... , रिपोर्टर- जी..., एसओ- हम लोग तो भेज देते हैं।, रिपोर्टर: पैथालॉजी के डॉक्टर कह रहे हैं कि यहां तो नहीं आई है।, एसओ-नहीं... नहीं मालूम पड़ता है कि आज जा रही है।
जरूरी नहीं 24 घंटे बाद स्पर्म मिल ही जाए
जिला अस्पताल के डॉ. महावीर सिंह बताते हैं कि घटना के 24 घंटे तक स्पर्म जीवित रहते हैं। स्पर्म के मिलने की संभावना 48 घंटे तक रहती है। इसलिए स्लाइड बनाई जाती है, लेकिन कोई जरूरी नहीं है कि स्पर्म मिल ही जाएगा।
ये होती है जांच की प्रक्रिया
महिला डॉक्टर रेप की पुष्टि के लिए स्लाइड बनाकर पीड़िता को लाने वाली पुलिस को सौंप देती है। नियमानुसार यदि स्लाइड मिलने तक पैथालॉजी खुली हो तो संबंधित पुलिसकर्मी को जांच के लिए उसी समय स्लाइड पैथालॉजी में जमा करनी होती है। यदि पैथालॉजी बंद है तो उसे हर हालत में अगले दिन जमा कर जांच करानी चाहिए।
एसपी ने दी सफाई
एसपी जवाहर ने बताया कि यह महिला डॉक्टर की जिम्मेंदारी होती है कि वह स्लाइड जांच को लिए भेजे, लेकिन डॉक्टर ने एसपी के नाम से नाखून, सिर के बाल और स्लाइड का अलग अलग लिफाफा सील कर पुलिस को दे दिया। पुलिस को क्या पता कि किस लिफाफे में क्या है। वह सीएमओ से वार्ता करेंगे। यदि जरूरी हुआ तो स्लाइड को आज ही जांच के लिए विधि विज्ञान प्रयोगशाला लखनऊ भेजेंगे।