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Pilibhit News: सेल्हा बाबा की दरगाह पर उर्स 10 मार्च से, यहां प्रसाद के रूप में चढ़ाए जाते हैं मुर्गे

Fri, 10 Mar 2023 03:18 AM IST
मुकेश कुमार संवाद न्यूज एजेंसी, पीलीभीत
संवाद न्यूज एजेंसी, पीलीभीत Published by: मुकेश कुमार Updated Fri, 10 Mar 2023 03:18 AM IST
सार

बराही जंगल से सटे इलाके में सेल्हा बाबा की दरगाह स्थित है। उर्स के दौरान जनपद के अलावा दूरदराज इलाकों से भी हजारों लोग यहां पहुंचते हैं। दरगाह पर प्रसाद के रूप में मुर्गा चढ़ाया जाता है। 

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Chickens offered during Urs at Syed Selha Baba dargah in Pilibhit
सेल्हा बाबा की दरगाह - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

पीलीभीत जिले में बराही रेंज के जंगल से सटे इलाके में स्थित सैयद सेल्हा बाबा का उर्स 10 मार्च से शुरू हो रहा है। इसकी तैयारियां शुरू हो गई हैं। दरगाह के प्रति आस्था रखने वाले जनपद के अलावा दूर दराज इलाकों के लोग उर्स के दौरान मन्नत पूरी होने पर मुर्गें चढ़ाते हैं। पांच दिवसीय उर्स में हजारों मुर्गों को प्रसाद के रूप में चढ़ाया जाता है।

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कलीनगर तहसील के शारदा डैम की तलहटी में बराही जंगल से सटे इलाके में सेल्हा बाबा की दरगाह स्थित है। दरगाह पर मान्यता रखने वाले लोगों की सालभर आवाजाही होती रहती है, लेकिन उर्स के दौरान जनपद के अलावा दूरदराज इलाकों से भी लोग पहुंचते हैं। जायरीन की सुविधा के लिए प्राइवेट बसों की सुविधा भी शुरू की जाती है। उनके ठहरने का इंतजाम भी होता है। 

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सुरक्षा के लिए पुलिस-पीएसी होती है तैनात 

सुरक्षा व्यवस्था के साथ भीड़ पर नजर रखने के लिए पुलिस और पीएसी तैनात होती है। दरगाह के आसपास मुर्गे की बिक्री करने वाली करीब पचास से अधिक दुकानें लगती हैं। हजारों मुर्गों की बिक्री हो जाती है। अकीदतमंद मुर्गें को काटकर चढ़ाते हैं, फिर प्रसाद मानकर उसको खाते हैं। 

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मुर्गा न खाने वाले दरगाह पर ही मुर्गा छोड़ देते हैं या फिर अन्य लोगों को दे देते हैं। मुर्गा व्यापारियों के अनुमान के मुताबिक करीब 70 हजार से अधिक मुर्गों के बिक्री होने की उम्मीद है। बाहर की मंडियों में मुर्गें का आर्डर दे दिया गया है। उर्स को लेकर दुकानें सज गई हैं। मेला कमेटी के सदस्य व्यवस्थाओं में जुटे हैं।

उर्स आने का इंतजार करते हैं बंजारा समुदाय के लोग

वैसे तो दरगाह से हर समुदाय के लोगों की आस्था है, लेकिन बंजारा समुदाय का दरगाह से खास लगाव है। ऐसा कहा जाता है कि दशकों पहले कभी दरगाह क्षेत्र से लेकर नेपाल तक बीहड़ जंगल होता था। बंजारा समुदाय के लोग नेपाल से मवेशियों की बड़ी तादाद में खरीद फरोख्त करते थे। 

लौटते समय जंगल क्षेत्र में मवेशी गुम हो जाते थे। मान्यता है कि सेल्हा बाबा की दरगाह पर मन्नत मांगने पर मवेशी मिल जाते थे। इसलिए उर्स के दौरान जनपद और दूरदराज इलाकों से बंजारा समुदाय के लोग परिवार के साथ आकर रुकते हैं।

सेल्हा कमेटी के सदर अकीलुर्रहमान खां ने बताया कि दस मार्च से पांच रोजा उर्स के दौरान बड़ी तादाद में जायरीन पहुंचते हैं। जायरीनों की सुविधा का ध्यान रखते हुए व्यवस्थाएं की जा रही है। परंपरा के अनुसार मुर्गे काटने को लेकर सफाई व्यवस्था को बेहतर करने पर बल दिया जा रहा है। 

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