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एक नही अनेक बार देखी ‘मुगल-ए-आजम’
Pilibhit
Updated Sat, 12 May 2012 12:00 PM IST
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अनिल कुमार अग्रवाल
पीलीभीत। सिनेमा के कई दौर देखे। कभी आतंकवाद बढ़ा तो उस पर फिल्में आने लगीं। पंजाब में खूनी संघर्ष हो, महिला उत्पीड़न के मामले हों या फिर वर्तमान में चल रही अन्ना हजारे की भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम हो, जैसा दौर आया, वैसी फिल्में बनी। सिनेमा समाज को आईना दिखाता है। मुझे फिल्म देखने का शौक कक्षा पांच से चढ़ा। सुभाष चंद्र बोस और शहीद भगत सिंह जैसी फिल्मे लगी तो पिता जी खुद दिखाने ले गए।
जब मैं कक्षा पांच में था तो सबसे पहले पिताजी फिल्म दिखाने ले गए। फिर बीसीआर पर खूब फिल्में देखीं, लेकिन जो फिल्म अच्छी लग जाती, उसे पर्दे पर देखने जरूर जाता था। मुगल-ए-आजम फिल्म मेरे जीवन की प्रेरणादायी फिल्म है। उसे मैने अनगिनत बार देखा। पहली बार जब देखने गया तो जनरेटर खराब हो गया था, इसलिए उस शो के टिकट नहीं दिए जा रहे थे। तमाम लोग इरादा बदलकर चले आए। यहां तक कि मेरा साथी भी लौट आया, लेकिन मैं जनरेटर बनते देखता रहा। डेढ़ घंटे बाद जनरेटर ठीक हुआ। फिल्म देखने वालों की भीड़ लगी थी, इसलिए टिकट बांटे गाए और देर से शो शुरू हुआ, लेकिन इतना उत्साह था कि फिल्म देखकर ही लौटा। पढ़ाई पूरी हुई, उसके बाद जब समय मिलता टॉकीज पहुंच जाता था। एक समय ऐसा आया, जब मैं नहीं दिखता तो परिवार वालों से लेकर दोस्त तक जान जाते थे कि मैं सिनेमा में मिलूंगा। मेरे पसंदीदा हीरो राजेश खन्ना और अजय देवगन हैं। इनकी फिल्में मैने हमेशा देखी। आज भी व्यस्तता के बाद समय पाता हूं तो इनकी फिल्में जरूर देखता हूं। सिनेमा के सौ साल बीत गए। मैने सिनेमा के सौ साल तो नहीं देखे। सिनेमा की सफलता को जरूर महसूस किया है। इसके लिए मनोरंजन विभाग को खुशियां मनानी चाहिए और सिनेमा दर्शकों के लिए कुछ नया करना चाहिए। अफसोस जनक है कि सबसे सस्ता और हर जगह सुलभ इस मनोरंजन की आज दुर्दशा हो गई है। कुछ ऐसा होना चाहिए ताकि भारतीय सिनेमा फिर उबर सके।
(प्रबंध निदेशक, निर्मल होटल-पीलीभीत)
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पीलीभीत। सिनेमा के कई दौर देखे। कभी आतंकवाद बढ़ा तो उस पर फिल्में आने लगीं। पंजाब में खूनी संघर्ष हो, महिला उत्पीड़न के मामले हों या फिर वर्तमान में चल रही अन्ना हजारे की भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम हो, जैसा दौर आया, वैसी फिल्में बनी। सिनेमा समाज को आईना दिखाता है। मुझे फिल्म देखने का शौक कक्षा पांच से चढ़ा। सुभाष चंद्र बोस और शहीद भगत सिंह जैसी फिल्मे लगी तो पिता जी खुद दिखाने ले गए।
जब मैं कक्षा पांच में था तो सबसे पहले पिताजी फिल्म दिखाने ले गए। फिर बीसीआर पर खूब फिल्में देखीं, लेकिन जो फिल्म अच्छी लग जाती, उसे पर्दे पर देखने जरूर जाता था। मुगल-ए-आजम फिल्म मेरे जीवन की प्रेरणादायी फिल्म है। उसे मैने अनगिनत बार देखा। पहली बार जब देखने गया तो जनरेटर खराब हो गया था, इसलिए उस शो के टिकट नहीं दिए जा रहे थे। तमाम लोग इरादा बदलकर चले आए। यहां तक कि मेरा साथी भी लौट आया, लेकिन मैं जनरेटर बनते देखता रहा। डेढ़ घंटे बाद जनरेटर ठीक हुआ। फिल्म देखने वालों की भीड़ लगी थी, इसलिए टिकट बांटे गाए और देर से शो शुरू हुआ, लेकिन इतना उत्साह था कि फिल्म देखकर ही लौटा। पढ़ाई पूरी हुई, उसके बाद जब समय मिलता टॉकीज पहुंच जाता था। एक समय ऐसा आया, जब मैं नहीं दिखता तो परिवार वालों से लेकर दोस्त तक जान जाते थे कि मैं सिनेमा में मिलूंगा। मेरे पसंदीदा हीरो राजेश खन्ना और अजय देवगन हैं। इनकी फिल्में मैने हमेशा देखी। आज भी व्यस्तता के बाद समय पाता हूं तो इनकी फिल्में जरूर देखता हूं। सिनेमा के सौ साल बीत गए। मैने सिनेमा के सौ साल तो नहीं देखे। सिनेमा की सफलता को जरूर महसूस किया है। इसके लिए मनोरंजन विभाग को खुशियां मनानी चाहिए और सिनेमा दर्शकों के लिए कुछ नया करना चाहिए। अफसोस जनक है कि सबसे सस्ता और हर जगह सुलभ इस मनोरंजन की आज दुर्दशा हो गई है। कुछ ऐसा होना चाहिए ताकि भारतीय सिनेमा फिर उबर सके।
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(प्रबंध निदेशक, निर्मल होटल-पीलीभीत)