{"_id":"5df530978ebc3e87b3688e91","slug":"siddharth-chaudhary-massacre-dispute-over-just-15-thousand-rupees-muzaffarnagar-news-mrt458786829","type":"story","status":"publish","title_hn":"महज 15 हजार रुपयों को लेकर हुआ था विवाद","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
महज 15 हजार रुपयों को लेकर हुआ था विवाद
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
मुजफ्फरनगर। मेरठ मेडिकल कॉलेज में छह जुलाई 2004 को इकलौते बेटे सिद्धार्थ चौधरी को गंवाने वाले बुजुर्ग डॉ सुरेंद्र ग्रेवाल व डॉ सुरेंद्र कौर का कहना है कि बेटे की हत्या के पीछे महज 15 हजार रुपयों का विवाद था।
पिता डॉ ग्रेवाल ने बताया कि डॉ अमनदीप सिंह मेडिकल कॉलेज में सिद्धार्थ चौधरी का सीनियर था, लेकिन इसके बावजूद सिद्धार्थ उससे काफी घुल-मिल गया था। सिद्धार्थ के पास एक पुरानी मारूति कार थी, जो वह मेडिकल कॉलेज ही ले गया था। वहां अमनदीप सिंह ने उस कार की मरम्मत करा दी थी, जिसमें करीब 37 हजार रुपये खर्च हुए थे। इनमें से करीब आधे रुपये अमनदीप को दे दिए गए थे, जबकि आधे बाकी थी। डॉ ग्रेवाल ने बताया कि चार जुलाई को सिद्धार्थ चौधरी घर आया था और फीस जमा करने के लिए 15 हजार रुपये लेकर गया था। जब अमनदीप को इन रुपयों का पता चला तो उसने सिद्धार्थ पर कार मैकेनिक को ये रुपये देने का दबाव बनाया। इसे लेकर दोनों के बीच काफी बहस भी हुई, जिसकी जानकारी सिद्धार्थ ने कॉल कर पिता को दी। इस पर पिता ने सिद्धार्थ को ये रुपये मेरठ के शास्त्रीनगर में रहने वाली अपनी बहन बालेश देवी को ले जाकर देने के लिए कहा, लेकिन सिद्धार्थ ने बुआ के घर न जाकर अपने सहपाठी ग्यासूद्दीन को ये रुपये रखने के लिए दे दिए। पिता का कहना है कि उसी रात डेढ़ बजे इन रुपयों को लेकर अमनदीप ने अपने साथियों डॉ यशपाल राणा व डॉ सचिन मलिक के साथ मिलकर सिद्धार्थ चौधरी को उसके कमरे में मार डाला। हत्या छिपाने के लिए आरोपियों ने कमरे के फर्श को पानी से धो दिया और वहां कुछ कागज छितरा दिए, जिनके आधार पर सिद्धार्थ को ड्रग एडिक्ट घोषित करने का प्रयास किया गया।
जून-04 में एक माह तक घर रहा था हत्यारोपी अमनदीप
मुजफ्फरनगर। सिद्धार्थ के माता-पिता का कहना है कि अमनदीप व सिद्धार्थ एक-दूसरे के साथ काफी घुले-मिले थे। दोनों एक-दूसरे के घर भी आते-जाते रहते थे। हत्या से एक माह पूर्व जून-2004 में अमनदीप सिंह उनके भोपा रोड स्थित घर पर भी आया था और पूरे एक माह तक सिद्धार्थ के साथ उसी के घर में रहा था। उस समय किसी को यह भान तक नहीं हुआ कि वह सिद्धार्थ का महज 15 हजार रुपयों के लिए इस तरह कत्ल कर देगा।
विज्ञापन
कई बार डाला गया समझौते का भी दबाव
मुजफ्फरनगर। इकलौते बेटे को खोने वाले बुजुर्ग डॉक्टर दंपती ने बताया कि शुरूआत में तो उन पर केस दर्ज नहीं कराने का दबाव दिया गया। लगातार उन्हें दबाव में लेने का प्रयास किया गया, लेकिन उनके पैरवी करते रहने पर जब कोर्ट में मुकदमे की सुनवाई शुरू हुई तो लगातार उन पर फैसले का भी दबाव बनाया गया। डॉ ग्रेवाल ने बताया कि एक बार तो डॉ अमनदीप के माता-पिता भी उनके घर पर आए और बेटे की गलती स्वीकारते हुए फैसले की बात कही। बुजुर्ग माता-पिता ने मानवीय आधार पर इसकी गुंजाइश पर खुद फैसला लेने को कहा, जिस पर वे लौट गए।
परिवार में रह गईं दो बहनें
मुजफ्फरनगर। दोस्तों की दगाबाजी का शिकार हुए सिद्धार्थ चौधरी का पूरा परिवार मेडिकल लाइन से जुड़ा हुआ है। भोपा के गांव अथाई के मूल निवासी पिता डॉ सुरेंद्र ग्रेवाल खुद चिकित्सक हैं और भोपा रोड पर किसान हॉस्पिटल चलाते हैं। मां सुरेंद्र कौर भी डॉक्टर हैं और यूपी गर्वनमेंट सर्विस से वीआरएस लेकर डॉ ग्रेवाल का हाथ बंटाती हैं। डॉक्टर दंपती ने इकलौते बेटे सिद्धार्थ चौधरी को भी डॉक्टर बनाने के लिए उसका वर्ष 2002 में मेरठ मेडिकल कॉलेज में एमबीबीएस में एडमिशन कराया था। बेटे की हत्या के बाद डॉ दंपती के परिवार में दो बेटियां रह गईं हैं। इनमें सबसे बड़ी बेटी कूमी ग्रेवाल भी डॉक्टर हैं और फिलहाल मखियाली सीएचसी में कार्यरत है। वहीं, सिद्धार्थ से छोटी बेटी नताशा ग्रेवाल जीडी गोयनका पब्लिक स्कूल में कक्षा-11 की छात्रा है।
विज्ञापन
पिता डॉ ग्रेवाल ने बताया कि डॉ अमनदीप सिंह मेडिकल कॉलेज में सिद्धार्थ चौधरी का सीनियर था, लेकिन इसके बावजूद सिद्धार्थ उससे काफी घुल-मिल गया था। सिद्धार्थ के पास एक पुरानी मारूति कार थी, जो वह मेडिकल कॉलेज ही ले गया था। वहां अमनदीप सिंह ने उस कार की मरम्मत करा दी थी, जिसमें करीब 37 हजार रुपये खर्च हुए थे। इनमें से करीब आधे रुपये अमनदीप को दे दिए गए थे, जबकि आधे बाकी थी। डॉ ग्रेवाल ने बताया कि चार जुलाई को सिद्धार्थ चौधरी घर आया था और फीस जमा करने के लिए 15 हजार रुपये लेकर गया था। जब अमनदीप को इन रुपयों का पता चला तो उसने सिद्धार्थ पर कार मैकेनिक को ये रुपये देने का दबाव बनाया। इसे लेकर दोनों के बीच काफी बहस भी हुई, जिसकी जानकारी सिद्धार्थ ने कॉल कर पिता को दी। इस पर पिता ने सिद्धार्थ को ये रुपये मेरठ के शास्त्रीनगर में रहने वाली अपनी बहन बालेश देवी को ले जाकर देने के लिए कहा, लेकिन सिद्धार्थ ने बुआ के घर न जाकर अपने सहपाठी ग्यासूद्दीन को ये रुपये रखने के लिए दे दिए। पिता का कहना है कि उसी रात डेढ़ बजे इन रुपयों को लेकर अमनदीप ने अपने साथियों डॉ यशपाल राणा व डॉ सचिन मलिक के साथ मिलकर सिद्धार्थ चौधरी को उसके कमरे में मार डाला। हत्या छिपाने के लिए आरोपियों ने कमरे के फर्श को पानी से धो दिया और वहां कुछ कागज छितरा दिए, जिनके आधार पर सिद्धार्थ को ड्रग एडिक्ट घोषित करने का प्रयास किया गया।
विज्ञापन
जून-04 में एक माह तक घर रहा था हत्यारोपी अमनदीप
मुजफ्फरनगर। सिद्धार्थ के माता-पिता का कहना है कि अमनदीप व सिद्धार्थ एक-दूसरे के साथ काफी घुले-मिले थे। दोनों एक-दूसरे के घर भी आते-जाते रहते थे। हत्या से एक माह पूर्व जून-2004 में अमनदीप सिंह उनके भोपा रोड स्थित घर पर भी आया था और पूरे एक माह तक सिद्धार्थ के साथ उसी के घर में रहा था। उस समय किसी को यह भान तक नहीं हुआ कि वह सिद्धार्थ का महज 15 हजार रुपयों के लिए इस तरह कत्ल कर देगा।
विज्ञापन
कई बार डाला गया समझौते का भी दबाव
मुजफ्फरनगर। इकलौते बेटे को खोने वाले बुजुर्ग डॉक्टर दंपती ने बताया कि शुरूआत में तो उन पर केस दर्ज नहीं कराने का दबाव दिया गया। लगातार उन्हें दबाव में लेने का प्रयास किया गया, लेकिन उनके पैरवी करते रहने पर जब कोर्ट में मुकदमे की सुनवाई शुरू हुई तो लगातार उन पर फैसले का भी दबाव बनाया गया। डॉ ग्रेवाल ने बताया कि एक बार तो डॉ अमनदीप के माता-पिता भी उनके घर पर आए और बेटे की गलती स्वीकारते हुए फैसले की बात कही। बुजुर्ग माता-पिता ने मानवीय आधार पर इसकी गुंजाइश पर खुद फैसला लेने को कहा, जिस पर वे लौट गए।
परिवार में रह गईं दो बहनें
मुजफ्फरनगर। दोस्तों की दगाबाजी का शिकार हुए सिद्धार्थ चौधरी का पूरा परिवार मेडिकल लाइन से जुड़ा हुआ है। भोपा के गांव अथाई के मूल निवासी पिता डॉ सुरेंद्र ग्रेवाल खुद चिकित्सक हैं और भोपा रोड पर किसान हॉस्पिटल चलाते हैं। मां सुरेंद्र कौर भी डॉक्टर हैं और यूपी गर्वनमेंट सर्विस से वीआरएस लेकर डॉ ग्रेवाल का हाथ बंटाती हैं। डॉक्टर दंपती ने इकलौते बेटे सिद्धार्थ चौधरी को भी डॉक्टर बनाने के लिए उसका वर्ष 2002 में मेरठ मेडिकल कॉलेज में एमबीबीएस में एडमिशन कराया था। बेटे की हत्या के बाद डॉ दंपती के परिवार में दो बेटियां रह गईं हैं। इनमें सबसे बड़ी बेटी कूमी ग्रेवाल भी डॉक्टर हैं और फिलहाल मखियाली सीएचसी में कार्यरत है। वहीं, सिद्धार्थ से छोटी बेटी नताशा ग्रेवाल जीडी गोयनका पब्लिक स्कूल में कक्षा-11 की छात्रा है।