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अभयदेव से योग सीखना चाहते थे सरदार भगत सिंह
ब्यूरो, अमर उजाला/ मुजफ्फरनगर
Updated Fri, 23 Mar 2018 12:03 AM IST
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सरदार भगत सिंह
- फोटो : अमर उजाला
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आप मुझे कोई ऐसा योग बता दीजिए, जिससे अंग्रेज मेरे अंदर की कुछ भी बात न उगलवा सके। शहीद भगत सिंह ने यह इच्छा आचार्य अभय देव से रखी थी। चरथावल में जन्मे यशस्वी योगी अभय देव ने सरदार भगत सिंह के साथ बिताए पलों को अपने साहित्य का अहम हिस्सा बनाया था। मुजफ्फरनगर के चरथावल कस्बे के अरविंद निकेतन आश्रम में अभय देव की जीवन पत्रावलियों में शहीद-ए-आजम की देश भक्ति का जोश, जज्बा और समर्पण छिपा है।
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लाहौर षड्यंत्र केस में 23 मार्च 1931 को भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को ब्रिटिश हुकूमत ने फांसी दी थी, जबकि उनके साथी बटुकेश्वर दत्त को उम्रकैद की सजा सुनाई थी। चरथावल में अरविंद निकेतन के संस्थापक और वेदमनीषी और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी आचार्य अभय देव से शहीद भगत सिंह की गहरी आत्मीयता थी। वर्ष 1967 में अभयदेव की ‘एक योग यात्री’ की पांडुलिपि में भगत सिंह की देशभक्ति से जुड़ी बातों का जिक्र किया गया है। गुरुकुल कांगड़ी हरिद्वार में शिक्षार्थी से लेकर आचार्य तक के सफर में उनकी सरदार भगत सिंह से कई मुलाकातें हुई। वर्ष 1928 की सर्दी के वाकया का कुछ यू जिक्र किया गया है- स्वामी श्रद्धानंद के बराबर के बड़े कमरे में मैं रहता था। पगड़ी पहने एक नौजवान ने एकांत में मुझसे मिलने की इच्छा प्रकट की। बातचीत प्रारंभ करते ही उसने बताया ‘मैं भगत सिंह हूं’। उस पहली मुलाकात के बाद आपसी स्नेह बढ़ गया। यह भेंट लाहौर में अंग्रेज पुलिस अफसर सांडर्स को मारने के बाद हुई थी। इसके बाद कई बार भगत सिंह गुपचुप तरीके से गुरुकुल में अभय देव से मिलने आते थे। भगत सिंह पढ़ने के शौकीन थे। उनकी कमीज की जेब में गुटका साइज फ्रेंच ‘रिवोल्युशन’ नामक पुस्तक मैंने एक दो बार देखी। एक बार उन्होंने मुझसे कहा कि आपकी योग विद्या मेरे तो किसी काम की नहीं है, परंतु एक योग अवश्य सीखना चाहता हू। मुझे कोई ऐसा योगाभ्यास बता दीजिए, जिससे की अंग्रेज मेरे अंदर की कोई भी बात मुझसे नहीं उगलवा सकें। बेहोश करने तथा हिप्नोटाइज करने पर भी मेरे मन के राज बाहर नही निकल सकें।
अभयदेव ने कई ऐसे व्यक्तियों के नाम उन्हें दिए, जो भगत सिंह के क्रांतिकारी संगठन में सहयोगी हो सके। अफसोस की बात यह थी कि किसी ने भी उनकी मदद नहीं की। यह बात भगत सिंह से अपनी मुलाकातों से पता चली। अभय देव की महात्मा गांधी से निकटता रही। मगर उन्होंने भगत सिंह के प्रति बड़ा प्रेम रखा। उनकी लिखित पत्रावलियों में आचार्य ने भगत सिंह को निर्मल, निष्कपट, सच्चा खरा देशभक्त बताया है। अभयदेव ने लिखा कि भगत सिंह की देश के प्रति भक्ति बिल्कुल खरी, खोट रहित सर्वथा निर्मल थी। सच्चाई में कोई क्रांतिकारी के समकक्ष नहीं था। भारत देश की भक्ति ही उनका आराध्य देव और परमेश्वर थी। भगत सिंह के साथी बटुकेश्वर दत्त भी गुरकुल में अभय देव से मिलते थे और वहा रहे भी। विरजानंद इंटर कॉलेज के पूर्व प्रधानाचार्य धर्मराज त्यागी बताते है कि सरदार भगत सिंह की आजादी के प्रति भक्ति का आचार्य अभयदेव ने अपने ग्रंथों में वर्णन किया।
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अभय देव के कूली बन गए थे भगत सिंह
आचार्य अभयदेव की सेवा के लिए सरदार भगत सिंह कूली बन गए थे। हरिद्वार के रेलवे स्टेशन पर ट्रेन से उतरने के बाद प्लेटफॉर्म पर भगत सिंह मिल गए। क्रांतिकारी नौजवान ने उन्हें आचार्य को न कूली करने दिया और न ही बिस्तर उठाने दिया। स्टेशन से गुरुकुल तक करीब 5-7 मील पैदल ही वह अभयदेव का बिस्तर लेकर साथ चले। जब आचार्य ने कहा भगत सिंह थक गए होंगे। तब उनका उत्तर था, इसमें क्या बोझ है, एक सैनिक राइफल एवं बिस्तर आदि का बोझ उठाकर मार्च करता है। ऐसे कई प्रसंग अभय देव ने अपनी जीवनी में लिखे है।
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