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स्वरूपानंद सरस्वती को साधु-संतों ने अर्पित की श्रद्धांजलि
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भोपा। ज्योतिर्मठ शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के ब्रह्मलीन होने पर भागवत पीठ श्री शुकदेव आश्रम में संतों, आचार्य और पुरोहितों ने श्रद्धांजलि अर्पित की। शुकतीर्थ, हरिद्वार और ऋषिकेश में हिंदू धर्म और संस्कृति की रक्षा के लिए उन्होंने कई बार वीतराग स्वामी कल्याणदेव के साथ साधु-संतों से संवाद किया।
शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती रविवार को मध्यप्रदेश के निरसिंहपुर आश्रम में ब्रह्मलीन हो गए। पौराणिक शुकतीर्थ के प्रति उनकी विशेष श्रद्धा थी। 40 के दशक में उनके गुरु करपात्री महाराज शुकतीर्थ में आध्यात्मिक प्रवास पर रहते थे। शंकराचार्य ने उन्हीं से काशी में धर्म की दीक्षा ली थी। गुरु से जुड़ी भक्ति उन्हें शुकतीर्थ खींच लाई थी। शंकराचार्य ग्रामीण अंचल में वीतराग स्वामी कल्याणदेव की ओर से प्रारंभ किए गए असंख्य स्कूल और कॉलेजों के अभियान को वे स्तुत्य कार्य मानते थे।
भागवत पीठाधीश्वर स्वामी ओमानंद बताते है कि वर्ष 1982 में शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद शुकदेव आश्रम पधारे थे। अक्षय वट के दर्शन कर शुकदेव मंदिर में पूजा की थी। उन्होंने दंडी आश्रम में रात्रि विश्राम किया था। वर्ष 1983 में ऋषिकेश में स्वामी रामसुखदास की गरिमामयी उपस्थिति में गुरुदेव स्वामी कल्याणदेव तथा हरिद्वार के मुख्य साधु-संतों से उनकी धर्म और संस्कृति के संवर्धन को लेकर बैठक हुई थी। गुरुदेव की वास्तविक समाज सेवा उन्हें सदैव प्रभावित करती रही। स्वामी ओमानंद कहते है कि शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने सनातन संस्कृति के आदर्शों, मूल्यों और परंपराओं को समृद्ध किया है। वह देशभक्त संत थे। आजादी आंदोलन में दो बार जेल गए थे।
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शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती रविवार को मध्यप्रदेश के निरसिंहपुर आश्रम में ब्रह्मलीन हो गए। पौराणिक शुकतीर्थ के प्रति उनकी विशेष श्रद्धा थी। 40 के दशक में उनके गुरु करपात्री महाराज शुकतीर्थ में आध्यात्मिक प्रवास पर रहते थे। शंकराचार्य ने उन्हीं से काशी में धर्म की दीक्षा ली थी। गुरु से जुड़ी भक्ति उन्हें शुकतीर्थ खींच लाई थी। शंकराचार्य ग्रामीण अंचल में वीतराग स्वामी कल्याणदेव की ओर से प्रारंभ किए गए असंख्य स्कूल और कॉलेजों के अभियान को वे स्तुत्य कार्य मानते थे।
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भागवत पीठाधीश्वर स्वामी ओमानंद बताते है कि वर्ष 1982 में शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद शुकदेव आश्रम पधारे थे। अक्षय वट के दर्शन कर शुकदेव मंदिर में पूजा की थी। उन्होंने दंडी आश्रम में रात्रि विश्राम किया था। वर्ष 1983 में ऋषिकेश में स्वामी रामसुखदास की गरिमामयी उपस्थिति में गुरुदेव स्वामी कल्याणदेव तथा हरिद्वार के मुख्य साधु-संतों से उनकी धर्म और संस्कृति के संवर्धन को लेकर बैठक हुई थी। गुरुदेव की वास्तविक समाज सेवा उन्हें सदैव प्रभावित करती रही। स्वामी ओमानंद कहते है कि शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने सनातन संस्कृति के आदर्शों, मूल्यों और परंपराओं को समृद्ध किया है। वह देशभक्त संत थे। आजादी आंदोलन में दो बार जेल गए थे।
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