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छह साल में बढ़ा नहीं, घट गया भूमि का दाम, रेलवे बोर्ड की लापरवाही से किसानों में आक्रोश      

Fri, 03 Nov 2017 12:13 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो/ मुजफ्फरनगर
अमर उजाला ब्यूरो/ मुजफ्फरनगर Updated Fri, 03 Nov 2017 12:13 AM IST
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Price of land reduced in six years
पटरी से उतरा ट्रेन का इंजन - फोटो : amar ujala
रेलवे बोर्ड अफसरों की नीतियों का कोई सानी नहीं है। वर्ष 2010 में जिस भूमि का किसानों को मुआवजा 1020 रुपये प्रति वर्ग मीटर अदा किया गया, जबकि वर्ष 2016 में उसी भूमि का रेट 300 से 700 रुपये तय कर दिया गया। रेलवे की इस नीति के आगे किसान बेबस हैं। सवाल है कि छह साल में बढ़ने के बजाए भूमि का रेट घट गया है। रेलवे बोर्ड और अधिग्रहण करने वाले अफसरों के खिलाफ किसानों ने एकजुट होकर अदालत का दरवाजा खटखटाने की तैयारी प्रारंभ कर दी है।      
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वर्ष 2010 में रेलवे ने दोहरीकरण के लिए खतौली से सहारनपुर सीमा तक किसानों की भूमि का अधिग्रहण किया था, जिसमें किसानों को रेलवे बोर्ड ने 1020 रुपये प्रतिवर्ग मीटर के हिसाब से मुआवजे का वितरण किया। उस वक्त भी करीब 1500 से अधिक किसानों की जमीन अधिग्रहण हुआ। लंबे संघर्ष के बाद किसानों को मुआवजा दिया गया। अब वर्ष 2016 में रेलवे डैडिकेडिट फ्रंट कॉरिडोर (डीएफसी) के लिए रेलवे बोर्ड ने किसानों की भूमि का अधिग्रहण किया।
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इस बार किसानों को भूमि का जो मुआवजा मिल रहा है, वह चौंकाने वाला है। फ्रंट क़ॉरिडोर के लिए किसानों को मुआवजा राशि रेलवे ने कहीं 300 तो कहीं 400 और किसी क्षेत्र में 700 रुपये तय की है। सवाल है कि छह साल बाद जिस भूमि का रेट बढ़ना लाजमी है, रेलवे ने उसे घटा दिया। यानि किसानों के साथ मुआवजे में सीधा खेल सामने आ रहा है। भाकियू जिलाध्यक्ष राजू अहलावत ने बताया कि रेलवे बोर्ड और स्थानीय प्रशासनिक अधिकारियों से कई बार पूछा जा चुका है कि किसानों की भूमि का रेट स्तर पर तय किया गया है।
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वर्ष 2010 में जिस किसान ने एक मीटर का रेट 1020 लिया है, उसे 2016 में 300, 400 क्यों दिया जा रहा है। इस बाबत अफसर बताएं कि सर्किल रेट घटाए गए है या बढ़े हैं। अब मामले को लेकर किसान रेलवे बोर्ड और भूमि अधिग्रहण करने वालों के खिलाफ अदालत का दरवाजा खटखटाएंगे।      

2010 में आवासीय, अब कृषि भूमि      
मुजफ्फरनगर। रेलवे बोर्ड ने वर्ष 2010 में रेलवे ट्रैक के नीचे आ रही भूमि को आवासीय मानकर मुआवजा दिया। जिसमें किसानों को बड़े पैमाने पर मुआवजा वितरित किया गया। आवासीय रुप में 1000 से अधिक का मूल्य रखा गया, जबकि 2015 में हुए सर्वे के बाद किसानों की भूमि को कृषि क्षेत्र में मान लिया गया, जिसके चलते भूमि का मूल्य कृषि रेट पर दिया जा रहा है। इससे किसान नाखुश हैं।      

सदर और खतौली के 13-13 गांव      
मुजफ्फरनगर। मालगाड़ी के लिए बिछाई जा रही रेलवे लाइन के लिए वर्ष 2016 में खतौली तहसील और सदर तहसील के 13-13 गांव आए। जिनमें करीब 1650 से अधिक किसानों को मुआवजा दिए जाने की सूची बनी है। हालांकि 300 से अधिक किसान मुआवजा पा चुके हैं, जबकि 1300 से अधिक को इंतजार है।      


हर गांव का अलग है सर्किल रेट      
मुजफ्फरनगर। एसएलओ और डीएफसी का कार्य देख रहे एडीएम वित्त सुनील कुमार ने बताया कि मुआवजे को लेकर किसानों की हर शंका को दूर किया जाएगा। डीएफसी का मुआवजा वितरित होना है। प्रशासन ने हर गांव का सर्किल रेट अलग रखा है, उसके आधार पर ही किसानों को मुआवजा दिया जा रहा है। विभाग पहले सहारनपुर में था, वहां क्या समस्या आई है और 2010 में क्या मुआवजा दिया गया। उन्हें इस संबंध में जानकारी नहीं है। 
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