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तीन तलाक बिल पर उलमा की राय जुदा-जुदा, कहा-शरीयत कानून में दखलांदाजी बर्दाश्त नहीं
अमर उजाला ब्यूरो/ मुजफ्फरनगर
Updated Thu, 28 Dec 2017 11:18 PM IST
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केंद्र की भाजपा सरकार संसद में तीन तलाक पर बिल पारित कराने में कामयाब हो गई। इसमें तीन तलाक को मुस्लिम महिलाओं के लिए अभिशाप करार देते हुए घृणित अपराध की संज्ञा दी गई है। ऐसा करने वाले व्यक्ति के विरुद्ध कानूनन रूप से तीन साल की सजा और जुर्माना होगा। तीन तलाक बिल को लेकर उलमा की राय जुदा-जुदा है।
उलमा ने साफ कहा कि केंद्र सरकार जबरन मुसलमानों पर अपना कानून थोप रही है, जबकि शरीयत कानून में तब्दीली की कोई गुंजाइश नहीं है। इससे महिलाओं पर ज्यादती अधिक बढ़ेगी, जबकि शरीयत कानून का खौफ खत्म होगा। केंद्र सरकार मुस्लिम समाज को अपने सियासी लाभ के लिए परेशान कर रही है।
अखिल भारतीय इमाम संगठन के प्रदेशाध्यक्ष मुफ्ती मोहम्मद जुल्फिकार ने कहा कि केंद्र सरकार के बिल का वह स्वागत करते हैं। इस बिल के पास होने से उन लोगों पर प्रभाव पड़ेेगा, जो शरीयत कानून का पालन नहीं करते हैं।
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तलाक का मजाक बनाने लोगों पर शिकंजा कसेगा। इसमें तीन साल की सजा का जो प्रावधान रखा गया है, वह बेहतर है। इससे मुस्लिम महिलाओं को लाभ मिलेगा। हालांकि केंद्र सरकार को उलमा की पक्ष सुनने और उनकी राय पर गौर करना चाहिए।
जमीयत उलमा-ए-हिंद के महासचिव कारी जाकिर हुसैन ने कहा कि तीन तलाक का मामला शरीयत से जुुड़ा है। इस पर बिल पारित कर केंद्र सरकार ने अपनी नीयत साफ कर दी है। सरकार की नीयत में खोट है। इससे मामले सुलझने के बजाय अधिक बढ़ेंगे।
यह बिल पूरी तरह से मुस्लिम समाज के लिए नुकसान दायक है। वह और उनका संगठन इसका विरोध करते हैं। केंद्र सरकार इसे वापस ले और आगे इस मामले में दखलंदाजी बंद करे। यह सरकार का नहीं, एक समाज, एक वर्ग और उसकी आस्था का मामला है।
शहर शरीयत बोर्ड के अध्यक्ष मौलाना इरफान कहते हैं कि यह बिल गलत है। इससे औरत वर्ग को लाभ नहीं, नुकसान होगा। केंद्र सरकार मुस्लिमों को परेशान करने के लिए ऐसे कानून बना रही है। सजा देकर पुरुष को जेल भेजा जाएगा तो पीड़ित महिला, उसके बच्चों की परवरिश का जिम्मा कौन लेगा।
यह बिल पूरी तरह से अनैतिक, अमान्य और जायज नहीं ठहराया जा सकता है। तीन तलाक और तलाक के संबंधित सभी मामले दीन की रोशनी से जुड़े हैं, जो 1400 साल से चले आ रहे हैं। इसमें बदलाव की कहीं भी गुंजाइश नहीं है।
मौलाना मोहम्मद तहसीन ने कहा कि केंद्र सरकार के बिल को अभी पूरी तरह से पढ़ा नहीं है। हालांकि यह शरीयत में दखल देने जैसा है। इससे मुस्लिम समाज बर्दाश्त नहीं करेगा। मामले में उलमा के साथ बैठक कर राय-मशविरा तैयार किया जाएगा। उलमा केंद्र सरकार के कानून पर नहीं, शरीयत और कुरान-ए-पाक के बताए रास्ते पर चलते हैं। उसी के आधार पर फैसला देते हैं।
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उलमा ने साफ कहा कि केंद्र सरकार जबरन मुसलमानों पर अपना कानून थोप रही है, जबकि शरीयत कानून में तब्दीली की कोई गुंजाइश नहीं है। इससे महिलाओं पर ज्यादती अधिक बढ़ेगी, जबकि शरीयत कानून का खौफ खत्म होगा। केंद्र सरकार मुस्लिम समाज को अपने सियासी लाभ के लिए परेशान कर रही है।
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अखिल भारतीय इमाम संगठन के प्रदेशाध्यक्ष मुफ्ती मोहम्मद जुल्फिकार ने कहा कि केंद्र सरकार के बिल का वह स्वागत करते हैं। इस बिल के पास होने से उन लोगों पर प्रभाव पड़ेेगा, जो शरीयत कानून का पालन नहीं करते हैं।
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तलाक का मजाक बनाने लोगों पर शिकंजा कसेगा। इसमें तीन साल की सजा का जो प्रावधान रखा गया है, वह बेहतर है। इससे मुस्लिम महिलाओं को लाभ मिलेगा। हालांकि केंद्र सरकार को उलमा की पक्ष सुनने और उनकी राय पर गौर करना चाहिए।
जमीयत उलमा-ए-हिंद के महासचिव कारी जाकिर हुसैन ने कहा कि तीन तलाक का मामला शरीयत से जुुड़ा है। इस पर बिल पारित कर केंद्र सरकार ने अपनी नीयत साफ कर दी है। सरकार की नीयत में खोट है। इससे मामले सुलझने के बजाय अधिक बढ़ेंगे।
यह बिल पूरी तरह से मुस्लिम समाज के लिए नुकसान दायक है। वह और उनका संगठन इसका विरोध करते हैं। केंद्र सरकार इसे वापस ले और आगे इस मामले में दखलंदाजी बंद करे। यह सरकार का नहीं, एक समाज, एक वर्ग और उसकी आस्था का मामला है।
शहर शरीयत बोर्ड के अध्यक्ष मौलाना इरफान कहते हैं कि यह बिल गलत है। इससे औरत वर्ग को लाभ नहीं, नुकसान होगा। केंद्र सरकार मुस्लिमों को परेशान करने के लिए ऐसे कानून बना रही है। सजा देकर पुरुष को जेल भेजा जाएगा तो पीड़ित महिला, उसके बच्चों की परवरिश का जिम्मा कौन लेगा।
यह बिल पूरी तरह से अनैतिक, अमान्य और जायज नहीं ठहराया जा सकता है। तीन तलाक और तलाक के संबंधित सभी मामले दीन की रोशनी से जुड़े हैं, जो 1400 साल से चले आ रहे हैं। इसमें बदलाव की कहीं भी गुंजाइश नहीं है।
मौलाना मोहम्मद तहसीन ने कहा कि केंद्र सरकार के बिल को अभी पूरी तरह से पढ़ा नहीं है। हालांकि यह शरीयत में दखल देने जैसा है। इससे मुस्लिम समाज बर्दाश्त नहीं करेगा। मामले में उलमा के साथ बैठक कर राय-मशविरा तैयार किया जाएगा। उलमा केंद्र सरकार के कानून पर नहीं, शरीयत और कुरान-ए-पाक के बताए रास्ते पर चलते हैं। उसी के आधार पर फैसला देते हैं।