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प्री-प्राइमरी स्कूलों को लेकर धरातल पर कुछ नहीं
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मुजफ्फरनगर। देश में नई शिक्षा नीति के क्रियान्वयन के प्रयास तेजी से हो रहे हैं। नई शिक्षा नीति में सरकार की योजना आंगनबाड़ी केंद्रों को प्री-प्राइमरी के रूप में संचालित करने की है, जिससे निजी स्कूलों के प्ले- ग्रुप मॉड्यूल की बराबरी की जा सके। इस योजना को लेकर धरातल पर अभी तक जिले में कुछ भी नहीं है और न ही विभाग ने कोई सजगता दिखाई है।
उत्तर प्रदेश सरकार जिले की सभी आंगनबाड़ी को स्मार्ट फोन देने जा रही है। सरकार की तैयारी है कि आंगनबाड़ी केंद्रों को प्री नर्सरी के रूप में तैयार किया जाए। जिले में आंगनबाड़ी केंद्रों की हकीकत एक दम उलट है। प्री-प्राइमरी लेवल का ज्ञान कराने की जिम्मेदारी आंगनबाड़ी के पास पहले से है। जिले में एक भी केंद्र पर आज तक यह प्रक्रिया चालू नहीं हो पाई है। कागजी कार्रवाई तो बहुत चल रही है, लेकिन धरातल पर कुछ नहीं है। हकीकत यह है कि आधे से अधिक आंगनबाड़ी केंद्र ऐसे हैं जो हवा में चल रहे हैं। आंगनबाडी ने अपने घर के कमरे को ही आंगनबाडी में दर्शा रखा है। अफसरों से मिलकर यह सब चल रहा है।
सरकार ने शहरी क्षेत्र में मानक के अनुरूप आंगनबाड़ी केंद्र के लिए चार हजार तक किराया देने की बात कही है, लेकिन यहां जो किराया दिया जा रहा है वह एक हजार से 2500 रुपये तक है। बिना मानक के कम किराया दिया जा रहा है। ग्रामीण क्षेत्र में एक हजार रुपये महीना किराया देने की बात की गई है, लेकिन बिना मानक के केंद्र को यहां भी 500 से 750 रुपये महीना किराया दिया जा रहा है। पहली बात तो पूरे जिले में प्री-प्राइमरी स्कूल के मानक के हिसाब से आंगनबाड़ी केंद्र ही नहीं है। जनपद में 2274 आंगनबाड़ी केंद्रों पर करीब 2100 आंगनबाड़ी कार्यरत है। इस समय सरकार आंगनबाड़ी को 5500 रुपये, सहायिका को 4250 रुपये, मिनी सहायिका को 2750 रुपये दे रही है। कार्य के आधार पर हर माह आंगनबाड़ी को 1500, सहायिका को 1250 और मिनी सहायिका को 750 अतिरिक्त दिया जा रहा है।
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अपर सांख्यिकीय अधिकारी दिग्विजय सिंह का कहना है कि प्री-प्राइमरी स्कूल को लेकर अभी कोई गाइड लाईन हमारे पास नहीं आई है। जिले में इसे लेकर अभी कोई तैयारी भी नहीं है। सरकार के जो दिशा-निर्देश होंगे उसी के अनुरूप आगे कार्य होगा।
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उत्तर प्रदेश सरकार जिले की सभी आंगनबाड़ी को स्मार्ट फोन देने जा रही है। सरकार की तैयारी है कि आंगनबाड़ी केंद्रों को प्री नर्सरी के रूप में तैयार किया जाए। जिले में आंगनबाड़ी केंद्रों की हकीकत एक दम उलट है। प्री-प्राइमरी लेवल का ज्ञान कराने की जिम्मेदारी आंगनबाड़ी के पास पहले से है। जिले में एक भी केंद्र पर आज तक यह प्रक्रिया चालू नहीं हो पाई है। कागजी कार्रवाई तो बहुत चल रही है, लेकिन धरातल पर कुछ नहीं है। हकीकत यह है कि आधे से अधिक आंगनबाड़ी केंद्र ऐसे हैं जो हवा में चल रहे हैं। आंगनबाडी ने अपने घर के कमरे को ही आंगनबाडी में दर्शा रखा है। अफसरों से मिलकर यह सब चल रहा है।
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सरकार ने शहरी क्षेत्र में मानक के अनुरूप आंगनबाड़ी केंद्र के लिए चार हजार तक किराया देने की बात कही है, लेकिन यहां जो किराया दिया जा रहा है वह एक हजार से 2500 रुपये तक है। बिना मानक के कम किराया दिया जा रहा है। ग्रामीण क्षेत्र में एक हजार रुपये महीना किराया देने की बात की गई है, लेकिन बिना मानक के केंद्र को यहां भी 500 से 750 रुपये महीना किराया दिया जा रहा है। पहली बात तो पूरे जिले में प्री-प्राइमरी स्कूल के मानक के हिसाब से आंगनबाड़ी केंद्र ही नहीं है। जनपद में 2274 आंगनबाड़ी केंद्रों पर करीब 2100 आंगनबाड़ी कार्यरत है। इस समय सरकार आंगनबाड़ी को 5500 रुपये, सहायिका को 4250 रुपये, मिनी सहायिका को 2750 रुपये दे रही है। कार्य के आधार पर हर माह आंगनबाड़ी को 1500, सहायिका को 1250 और मिनी सहायिका को 750 अतिरिक्त दिया जा रहा है।
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अपर सांख्यिकीय अधिकारी दिग्विजय सिंह का कहना है कि प्री-प्राइमरी स्कूल को लेकर अभी कोई गाइड लाईन हमारे पास नहीं आई है। जिले में इसे लेकर अभी कोई तैयारी भी नहीं है। सरकार के जो दिशा-निर्देश होंगे उसी के अनुरूप आगे कार्य होगा।