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मुजफ्फरनगर: कब्रिस्तान की जगह निकली खेती की जमीन, वक्फ एंट्री हटाने का आदेश, 40 साल कोर्ट में चला केस

Fri, 28 Aug 2026 11:40 AM IST
Mohd Mustakim अमर उजाला नेटवर्क, मुजफ्फरनगर
अमर उजाला नेटवर्क, मुजफ्फरनगर Published by: Mohd Mustakim Updated Fri, 28 Aug 2026 11:40 AM IST
सार

पलड़ी गांव के कृपाल सिंह सैनी, धर्मपाल सिंह, सोमपाल सिंह और ओमपाल सिंह का कहना है कि इन्होंने 1985 में जमीन खरीदी थी। एक साल बाद ही चकबंदी में इसे कब्रिस्तान की भूमि में दर्ज कर लिया गया। अब 1.14 बीघा भूमि वक्फ कब्रिस्तान की प्रविष्टि से मुक्त करने के निर्देश दिए गए हैं।

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Muzaffarnagar: Land designated as a graveyard turns out to be agricultural land; order issued to remove Waqf
सांकेतिक तस्वीर। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

मुजफ्फरनगर में शाहपुर थाना क्षेत्र के पलड़ी गांव की कृषि भूमि को करीब 40 साल तक वक्फ कब्रिस्तान दर्ज रखा गया, जबकि रिकॉर्ड से लेकर मौके की जांच तक में वहां खेती होने और कब्रिस्तान न होने की बात सामने आई। अब उप्र वक्फ न्यायाधिकरण ने इस प्रविष्टि को गलत मानते हुए 1.14 बीघा भूमि से वक्फ संपत्ति और कब्रिस्तान की प्रविष्टि हटाने और एक माह के भीतर वादी का नाम दर्ज करने की कार्रवाई के निर्देश दिए हैं। वादी ने डीएम उमेश मिश्रा से मिलकर फैसले से अवगत कराया।
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यह मामला तहसील बुढ़ाना के गांव पलड़ी की गाटा संख्या-31, वर्तमान नंबर 61 की भूमि से जुड़ा है। वादी कृपाल सिंह सैनी, धर्मपाल सिंह, सोमपाल सिंह और ओमपाल सिंह का कहना था कि विवादित भूमि शुरू से कृषि भूमि रही है। पुराने राजस्व अभिलेखों में भी इसके पूर्व मालिकों के नाम दर्ज थे और वादी के परिवार ने बैनामे के जरिए 1985 में जमीन खरीदी थी।
 
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सुनवाई के दौरान न्यायाधिकरण के सामने पेश रिकॉर्ड में वक्फ निरीक्षक की सर्वे रिपोर्ट भी अहम साबित हुई। इसमें साफ कहा गया था कि गाटा संख्या-31 कब्रिस्तान नहीं, बल्कि काश्त की भूमि है जबकि कब्रिस्तान दूसरे गाटा नंबर में स्थित है। इसके बावजूद वक्फ सूची में गाटा संख्या-31 को कब्रिस्तान के रूप में शामिल कर लिया गया। बाद में इसी आधार पर चकबंदी और राजस्व अभिलेखों में भी इसे वक्फ कब्रिस्तान दर्ज कर दिया गया।
 
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एसडीएम बुढ़ाना और चकबंदी अधिकारियों की जांच रिपोर्ट में भी मौके पर खेती होने की बात सामने आई। कमीशन रिपोर्ट में विवादित भूमि पर फसल और यूकेलिप्टिस के पेड़ होने का उल्लेख है, जबकि किसी कच्ची या पक्की कब्र का उल्लेख नहीं मिला।
 

न्यायाधिकरण ने कहा कि केवल वक्फ सूची में दर्ज होने के आधार पर भूमि को वक्फ संपत्ति नहीं माना जा सकता, खासकर तब जब सर्वे और अन्य अभिलेख स्वयं उसकी प्रकृति कृषि भूमि बताते हों। पीठ ने माना कि गाटा संख्या 31 को उसकी वास्तविक प्रकृति के विपरीत कब्रिस्तान के रूप में दर्ज किया गया।
 

उप्र वक्फ न्यायाधिकरण अध्यक्ष प्रहलाद सिंह और सदस्यों राम सुरेश वर्मा व ओम प्रकाश की पीठ ने उभय पक्षों को सुनने व अभिलेखों के परीक्षण के उपरांत वक्फ बोर्ड और संबंधित राजस्व अधिकारियों को एक माह के भीतर वक्फ कब्रिस्तान की प्रविष्टि निरस्त कर वादीगण का नाम दर्ज करने की कार्रवाई पूरी करने का आदेश दिया है।
 

41 साल पहले खरीदी जमीन, 40 साल से लड़ाई
पलड़ी गांव के रहने वाले कृपाल सिंह सैनी ने बताया कि वर्ष 1985 में पड़ोसी से जमीन खरीदी थी। इसके बाद गांव में 1990 में चकबंदी हुई। उन्हें 1986 के आदेश में जानकारी मिली कि जमीन को कब्रिस्तान की भूमि दर्शा दिया गया है। उन्होंने सिविल न्यायालय मुजफ्फरनगर में वाद दायर किया। इसके बाद रामपुर ट्रिब्यूनल कोर्ट में लंबी लड़ाई लड़ी। अब लखनऊ से उनके हक में फैसला आया है। डीएम से मिलकर जमीन का दुरुस्तीकरण कराने की मांग रखी है। वर्तमान में जमीन पर पेड़ खड़े हैं। सपा सरकार में उनके खिलाफ प्राथमिकी भी दर्ज करा दी गई थी लेकिन प्रशासन की जांच में किसान का पक्ष ही सही मिला था।

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