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जायज नहीं हराम कमाई से रोजे की सहरी और इफ्तार करना : वाजदी

Mon, 04 Apr 2022 11:46 PM IST
Meerut Bureau मेरठ ब्यूरो
Updated Mon, 04 Apr 2022 11:46 PM IST
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It is not permissible to do fasting and iftar by earning haraam: Wajdi
मौलाना नदीमुलवाजदी - फोटो : DEVBAND
देवबंद। पवित्र रमजान माह में हलाल कमाई को जायज जगहों पर खर्च करना भी रोजे का एक अहम हिस्सा है। अरबी के प्रसिद्ध विद्वान मौलाना नदीमुलवाजदी का कहना है कि हराम कमाई से रोजे के लिए सहरी करना और उसी कमाई से इफ्तार करना जायज नहीं। अल्लाह को ऐसे रोजे की जरूरत नहीं है।
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रमजान का महीना कितनी अहमियत रखता है इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है की माह में तमाम बुराइयों को त्यागने, दूसरों को तकलीफ न पहुंचाने और हलाल की कमाई का इस्तेमाल करने का हुक्म शरीयत में दिया गया है। मौलाना नदीमुलवाजदी ने शरीयत के हवाले से बताया कि रोजे का मकसद खाने पीने की चीजों को छोड़ना नहीं बल्कि हर गलत काम व गुनाहों की चीजों को त्यागना है। झूठ न बोलना, गिबत न करना, दूसरों को तकलीफ पहुंचाने वाली बातों को न करना, हराम कमाई को छोड़कर जायज तरीके से कमाई करना और उस कमाई को जायज जगहों पर खर्च करना रोजे का एक अहम हिस्सा है। उन्होंने कहा कि अगर कोई शख्स रोजा रखकर हराम माल (पैसे) से सहरी व इफ्तार करता है तो उस पर हुजूर ने फरमाया है कि अल्लाह ताआला को ऐसे रोजे की जरूरत नहीं है। इसलिए हुजूर ने फरमाया हलाल माल से रोजा रखो और उसी से इफ्तार करो। उन्होंने कहा कि रमजान में मुसलमानों को पांचों वक्त की नमाज की पाबंदी करनी चाहिए और नफली इबादतों में वक्त लगाना चाहिए। इसके अलावा जकात अदा करने के साथ ही ज्यादा से ज्यादा नफली सदका देना भी सवाब का काम है।
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