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सद्भाव लौटा पर विश्वास नहीं
ब्यूरो/ अमर उजाला, मुजफ्फरनगर
Updated Thu, 27 Aug 2015 12:37 AM IST
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मुजफ्फरनगर। कवाल कांड के दो साल बाद गांव में अमन-चैन और सद्भाव तो लौट आया, मगर एक-दूसरे के प्रति विश्वास की आज भी कमी है। ग्रामीण अपने तक ही सीमित हैं। सबके अपने कामकाज हैं, कारोबार हैं मगर एक-दूसरे से कोई सरोकार नहीं।
27 अगस्त 2013 की घटना कवाल के माथे पर कलंक के समान है। उस दिन को कोई याद नहीं करना चाहता। दो साल पहले गांव के चौराहे पर अचानक कुछ युवकों में संघर्ष हुआ। कवाल के शाहनवाज को चाकू लगा, थोड़ी देर में उसकी मौत हो गई।
इसी दौरान भागते मलिकपुरा निवासी ममेरे भाइयों सचिन और गौरव को भीड़ ने घेर लिया। बेरहमी से दोनों को पीट-पीटकर मार डाला। कवाल की इस जघन्य वारदात से मचे बवाल ने दंगे की शक्ल ले ली थी। कवाल प्रकरण से सबसे अधिक नुकसान भाईचारे और आपसी सद्भाव का हुआ।
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हालात का सियासत ने बखूबी फायदा उठाया। खालापार के शहीद चौक पर मुसलिमों ने प्रशासन को ज्ञापन दिया। इसी प्रतिक्रिया में नंगला मंदौड़ में ममेरे भाइयों को श्रद्धांजलि देने के नाम पर भीड़ जुटाई गई। सात सितंबर की पंचायत खत्म होते-होते जिलेभर में खून खराबा शुरू हो गया था।
इस खूनी हिंसा में 64 से अधिक बेगुनाहों की जानें चली गईं थी। कवाल कांड हुए दो साल गुजर गए। बिगड़े हालात सुधरे, गांव में सद्भाव लौट आया मगर एक दूसरे के प्रति विश्वास की अभी तक दरकार है। लोग एक-दूसरे के साथ बैठने को तैयार नहीं हैं, कोई मतलब भी नहीं रखना चाहते।
कवाल और मलिकपुरा के दोनों समुदाय के लोगों के बीच नफरत के घाव अभी तक नहीं भरे हैं। इस कांड को लेकर दोनों गांवों की आवोहवा दो साल बाद भी सामान्य नहीं हुई है। हालांकि मलिकपुरा के ग्रामीण बाईपास के बजाए कवाल से ही होकर जाते हैं, मगर एक-दूसरे से कोई बात नहीं करते। ऐहतियातन मलिकपुरा और कवाल में दो साल बाद भी पीएसी की गारद तैनात है।
पुराने जख्मों को हरा करते हैं नेता : सैनी
दो साल पहले की घटना गांव पर कलंक है। गांव में अब आपसी सद्भाव लौट आया है। पूरी तरह अमन चैन है। दो साल बाद भी कुछ राजनीतिक लोग पुराने जख्मों को हरा करने का प्रयास करते हैं, जबकि ऐसा नहीं करना चाहिए।
महेंद्र सिंह सैनी, ग्राम प्रधान, कवाल
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27 अगस्त 2013 की घटना कवाल के माथे पर कलंक के समान है। उस दिन को कोई याद नहीं करना चाहता। दो साल पहले गांव के चौराहे पर अचानक कुछ युवकों में संघर्ष हुआ। कवाल के शाहनवाज को चाकू लगा, थोड़ी देर में उसकी मौत हो गई।
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इसी दौरान भागते मलिकपुरा निवासी ममेरे भाइयों सचिन और गौरव को भीड़ ने घेर लिया। बेरहमी से दोनों को पीट-पीटकर मार डाला। कवाल की इस जघन्य वारदात से मचे बवाल ने दंगे की शक्ल ले ली थी। कवाल प्रकरण से सबसे अधिक नुकसान भाईचारे और आपसी सद्भाव का हुआ।
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हालात का सियासत ने बखूबी फायदा उठाया। खालापार के शहीद चौक पर मुसलिमों ने प्रशासन को ज्ञापन दिया। इसी प्रतिक्रिया में नंगला मंदौड़ में ममेरे भाइयों को श्रद्धांजलि देने के नाम पर भीड़ जुटाई गई। सात सितंबर की पंचायत खत्म होते-होते जिलेभर में खून खराबा शुरू हो गया था।
इस खूनी हिंसा में 64 से अधिक बेगुनाहों की जानें चली गईं थी। कवाल कांड हुए दो साल गुजर गए। बिगड़े हालात सुधरे, गांव में सद्भाव लौट आया मगर एक दूसरे के प्रति विश्वास की अभी तक दरकार है। लोग एक-दूसरे के साथ बैठने को तैयार नहीं हैं, कोई मतलब भी नहीं रखना चाहते।
कवाल और मलिकपुरा के दोनों समुदाय के लोगों के बीच नफरत के घाव अभी तक नहीं भरे हैं। इस कांड को लेकर दोनों गांवों की आवोहवा दो साल बाद भी सामान्य नहीं हुई है। हालांकि मलिकपुरा के ग्रामीण बाईपास के बजाए कवाल से ही होकर जाते हैं, मगर एक-दूसरे से कोई बात नहीं करते। ऐहतियातन मलिकपुरा और कवाल में दो साल बाद भी पीएसी की गारद तैनात है।
पुराने जख्मों को हरा करते हैं नेता : सैनी
दो साल पहले की घटना गांव पर कलंक है। गांव में अब आपसी सद्भाव लौट आया है। पूरी तरह अमन चैन है। दो साल बाद भी कुछ राजनीतिक लोग पुराने जख्मों को हरा करने का प्रयास करते हैं, जबकि ऐसा नहीं करना चाहिए।
महेंद्र सिंह सैनी, ग्राम प्रधान, कवाल