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राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद की जयंती पर विशेष : स्वामी कल्याणदेव के बुलावे पर आए थे राष्ट्रपति
अमर उजाला ब्यूरो/ मुजफ्फरनगर
Updated Sat, 02 Dec 2017 11:22 PM IST
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रेलवे स्टेशन पर सभा को संबोधित करते डॉ. राजेंद्र प्रसाद।
- फोटो : अमर उजाला
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रेलवे स्टेशन पर देश के राष्ट्रपति की सभा का होना आज की राजनीति में बस कल्पना ही की जा सकती है। प्रोटोकॉल और सुरक्षा की बंदिशों में अब ऐसे अवसर नहीं दिखाई देते। देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद के लिए मुजफ्फरनगर स्टेशन के प्लेटफार्म पर मंच ही नहीं सजा था, बल्कि उन्हें सुनने के लिए भीड़ उमड़ी थी। वीतराग स्वामी कल्याणदेव के बुलावे पर आए राजेंद्र बाबू ने शुकतीर्थ का प्रसाद और गंगा जल ग्रहण किया था।
देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद की जयंती पर जिले से जुड़ी उनकी स्मृतियां यादों में बसी है। राजनीति की तस्वीर कितनी बदल गई है, यह अतीत के दस्तावेजों से बयां होता है। आज के वक्त में राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री से आम आदमी का मिलना बड़ा मुश्किल है। आजादी के बाद देश के शीर्ष राजनीतिज्ञों को न प्रोटोकॉल की चिंता थी और न ही सुरक्षा की फिक्र थी। उनका जनता से सीधा जुड़ाव था।
शिक्षा ऋषि वीतराग स्वामी कल्याणदेव ने अपने शिष्य वैद्य पंडित जगदीश प्रसाद शर्मा के जरिये राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद को शुक्रताल आना का निमंत्रण भेजवाया। राजेंद्र बाबू ने संत की सरलता और नि:स्वार्थ ग्रामोत्थान की सेवा को सुना, तो दर्शन की अभिलाषा बढ़ गई।
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राष्ट्रपति ने व्यस्त कार्यक्रम की वजह से शुकतीर्थ पहुंचने की असमर्थता जताते हुए रुड़की आईआईटी के दीक्षांत समारोह में जाते समय मुजफ्फरनगर रेलवे स्टेशन पर ही भेंट का वादा किया। दिसंबर 1952 में पूरे स्टेशन को से सजाया गया। प्लेटफार्म नंबर दो पर राष्ट्रपति के लिए मंच की व्यवस्था की गई। संत के आह्वान पर जिले भर से लोग राजेंद्र बाबू को सुनने के लिए उमड़े।
डॉ राजेंद्र प्रसाद ने स्वामी कल्याणदेव से भागवत पीठ श्री शुकदेव आश्रम का प्रसाद और गंगा जल ग्रहण कर आशीर्वाद लिया। पीठाधीश्वर स्वामी ओमानंद सरस्वती बताते है कि भारतीय स्वाधीनता आंदोलन के प्रमुख नेता डॉ राजेंद्र प्रसाद गुरुदेव की सरलता और नि:स्वार्थ सेवा से प्रभावित हुए। वे राजनीति में रहते हुए भी रोजाना भजन कीर्तन सुनते थे।
रामायण और गीता उन्हें कंठस्थ थी। शहर के कायस्थवाड़ा निवासी वरिष्ठ अधिवक्ता संतोष कुमार बताते है कि राष्ट्रपति की मुजफ्फरनगर यात्रा की व्यवस्था संभालने में उनके पिता जयप्रकाश, लाला इंद्रप्रकाश, तत्कालीन पालिकाध्यक्ष जगत प्रकाश अग्रवाल ने अहम भूमिका निभाई थी। स्टेशन पर हुई सभा में युवा भी राजेंद्र बाबू को सुनने पहुंचे थे।
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देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद की जयंती पर जिले से जुड़ी उनकी स्मृतियां यादों में बसी है। राजनीति की तस्वीर कितनी बदल गई है, यह अतीत के दस्तावेजों से बयां होता है। आज के वक्त में राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री से आम आदमी का मिलना बड़ा मुश्किल है। आजादी के बाद देश के शीर्ष राजनीतिज्ञों को न प्रोटोकॉल की चिंता थी और न ही सुरक्षा की फिक्र थी। उनका जनता से सीधा जुड़ाव था।
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शिक्षा ऋषि वीतराग स्वामी कल्याणदेव ने अपने शिष्य वैद्य पंडित जगदीश प्रसाद शर्मा के जरिये राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद को शुक्रताल आना का निमंत्रण भेजवाया। राजेंद्र बाबू ने संत की सरलता और नि:स्वार्थ ग्रामोत्थान की सेवा को सुना, तो दर्शन की अभिलाषा बढ़ गई।
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राष्ट्रपति ने व्यस्त कार्यक्रम की वजह से शुकतीर्थ पहुंचने की असमर्थता जताते हुए रुड़की आईआईटी के दीक्षांत समारोह में जाते समय मुजफ्फरनगर रेलवे स्टेशन पर ही भेंट का वादा किया। दिसंबर 1952 में पूरे स्टेशन को से सजाया गया। प्लेटफार्म नंबर दो पर राष्ट्रपति के लिए मंच की व्यवस्था की गई। संत के आह्वान पर जिले भर से लोग राजेंद्र बाबू को सुनने के लिए उमड़े।
डॉ राजेंद्र प्रसाद ने स्वामी कल्याणदेव से भागवत पीठ श्री शुकदेव आश्रम का प्रसाद और गंगा जल ग्रहण कर आशीर्वाद लिया। पीठाधीश्वर स्वामी ओमानंद सरस्वती बताते है कि भारतीय स्वाधीनता आंदोलन के प्रमुख नेता डॉ राजेंद्र प्रसाद गुरुदेव की सरलता और नि:स्वार्थ सेवा से प्रभावित हुए। वे राजनीति में रहते हुए भी रोजाना भजन कीर्तन सुनते थे।
रामायण और गीता उन्हें कंठस्थ थी। शहर के कायस्थवाड़ा निवासी वरिष्ठ अधिवक्ता संतोष कुमार बताते है कि राष्ट्रपति की मुजफ्फरनगर यात्रा की व्यवस्था संभालने में उनके पिता जयप्रकाश, लाला इंद्रप्रकाश, तत्कालीन पालिकाध्यक्ष जगत प्रकाश अग्रवाल ने अहम भूमिका निभाई थी। स्टेशन पर हुई सभा में युवा भी राजेंद्र बाबू को सुनने पहुंचे थे।