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जेल अफसरों के वेतन से दो लाख वसूलने के आदेश
ब्यूरो/अमर उजाला, मुजफ्फरनगर
Updated Sat, 13 May 2017 11:51 PM IST
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the jail
- फोटो : demo pic
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मुजफ्फरनगर। जिला कारागार में हुई बंदी की मौत के मामले में नौ साल बाद राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का फैसला आया है। मानवाधिकार आयोग ने इस मामले में दोषी जेल के अफसरों और कर्मचारियों के वेतन से दो लाख रुपये वसूलकर मृतक के परिजनों को देने का आदेश दिया है। इस संबंध में प्रदेश के अनु सचिव गिरीशचंद्र खरे ने आईजी को मानवाधिकार आयोग के आदेश से अवगत कराते हुए एक सप्ताह में यह धनराशि पीड़ित परिवार को दिलाने के निर्देश दिए हैं।
जिला कारागार में नौ साल पहले बंदी अंकित उर्फ रसगुल्ला ने आठ मई 2008 को बैरक के जंगले से फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी। शामली जिले के थानाभवन थाना क्षेत्र के गांव हसनपुर लुहारी निवासी पवन सैनी के बेटे अंकित उर्फ रसगुल्ला को पुलिस ने तमंचा रखने के आरोप में चार अगस्त 2007 को जेल भेजा था। नौ माह बाद बंदी अंकित ने आत्महत्या कर ली थी। अंकित के जेल में आत्महत्या किए जाने के बाद उसके पिता पवन सैनी की ओर से राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को प्रार्थना पत्र भेजकर बेटे की आत्महत्या के लिए जेल के अधिकारियों और कर्मचारियों को जिम्मेदार ठहराने का आरोप लगाया था। अब घटना के नौ साल बाद पांच मई को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने अपना निर्णय सुनाया है। अपने आदेश में मानवाधिकार आयोग ने प्रदेश सरकार को निर्देश दिया है कि बंदी की मौत के मामले में दोषी जेल अधिकारियों और कर्मचारियों के वेतन से दो लाख रुपये वसूलकर पीड़ित परिवार को दिए जाएं। इस संबंध में प्रदेश के अनु सचिव गिरीशचंद्र खरे ने कारागार महानिरीक्षक को पत्र भेजकर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के आदेश से अवगत कराते हुए एक सप्ताह में दोषी जेल के अफसरों और कर्मचारियों के वेतन से दो लाख रुपये वसूल कर पीड़ित परिजनों को देने के निर्देश दिए हैं।
ऐसी होगी धनराशि देने की प्रक्रिया
मानवाधिकार आयोग ने अपने आदेश में निर्देशित किया है कि कारागार महानिरीक्षक इस मामले में दोषी पाए गए अफसरों और कर्मचारियों के वेतन से दो लाख रुपये वसूलकर जिला कोषागार में जमा करवाएं। इसके बाद जिलाधिकारी की ओर से दो लाख रुपये का चेक बनाया जाए। डीएम के माध्यम से यह चेक पीड़ित परिजनों को दिया जाए। आदेश में मानवाधिकार आयोग ने एक सप्ताह में इस प्रक्रिया को पूरी कराकर उप्र शासन से कार्रवाई की रिपोर्ट मांगी है।
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बंदी की मौत की हुई थी मजिस्ट्रेटी जांच
मुजफ्फरनगर। जिला कारागार में बंदी अंकित उर्फ रसगुल्ला के फांसी लगाकर जान देने के मामले की मजिस्ट्रेटी जांच हुई थी। डीएम के आदेश पर तत्कालीन सिटी मजिस्ट्रेट राजेंद्र कुमार त्यागी ने इस मामले की मजिस्ट्रीयल जांच की थी। उन्होंने दो माह तक जांच कर आख्या आठ जुलाई 2008 को डीएम को सौंपी गई थी।
लापरवाही के कारण हुई थी बंदी की मौत
मुजफ्फरनगर। बंदी अंकित की मौत के मामले की मजिस्ट्रीयल जांच करने वाले सिटी मजिस्ट्रेट राजेश कुमार त्यागी ने अपनी जांच आख्या में बताया था कि जेल के अफसरों और कर्मचारियों की लापरवाही के कारण बंदी की मौत हुई। मजिस्ट्रीयल जांच में तत्कालीन जेल अधीक्षक हरीशचंद राय, डिप्टी जेलर रामप्रकाश, डिप्टी जेलर सुमित कुमार, मुख्य बंदीरक्षक रामपुरी गोस्वामी, बंदीरक्षक अजीत तिवारी, बंदीरक्षक राकेश कुमार, बंदीरक्षक मुकेश कुमार गौतम की लापरवाही के कारण बंदी की मौत होना बताया गया था। इनमें से वर्तमान में हरीशचंद राय और रामपुरी गोस्वामी रिटायर हो चुके हैं, जबकि रामप्रकाश लखमीपुर खीरी में, सुमित कुमार भदोही में, अजीत तिवारी बरेली में, राकेश कुमार बुलंदशहर में और मुकेश कुमार गौतम गाजियाबाद में तैनात हैं।
आदेश अभी नहीं आया
जिला कारागार अधीक्षक राकेश सिंह का कहना है कि उक्त संबंध में अभी तक उन्हें कोई आदेश प्राप्त नहीं हुआ है। आदेश की प्रति मिलते ही यथोचित कार्रवाई की जाएगी।
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जिला कारागार में नौ साल पहले बंदी अंकित उर्फ रसगुल्ला ने आठ मई 2008 को बैरक के जंगले से फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी। शामली जिले के थानाभवन थाना क्षेत्र के गांव हसनपुर लुहारी निवासी पवन सैनी के बेटे अंकित उर्फ रसगुल्ला को पुलिस ने तमंचा रखने के आरोप में चार अगस्त 2007 को जेल भेजा था। नौ माह बाद बंदी अंकित ने आत्महत्या कर ली थी। अंकित के जेल में आत्महत्या किए जाने के बाद उसके पिता पवन सैनी की ओर से राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को प्रार्थना पत्र भेजकर बेटे की आत्महत्या के लिए जेल के अधिकारियों और कर्मचारियों को जिम्मेदार ठहराने का आरोप लगाया था। अब घटना के नौ साल बाद पांच मई को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने अपना निर्णय सुनाया है। अपने आदेश में मानवाधिकार आयोग ने प्रदेश सरकार को निर्देश दिया है कि बंदी की मौत के मामले में दोषी जेल अधिकारियों और कर्मचारियों के वेतन से दो लाख रुपये वसूलकर पीड़ित परिवार को दिए जाएं। इस संबंध में प्रदेश के अनु सचिव गिरीशचंद्र खरे ने कारागार महानिरीक्षक को पत्र भेजकर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के आदेश से अवगत कराते हुए एक सप्ताह में दोषी जेल के अफसरों और कर्मचारियों के वेतन से दो लाख रुपये वसूल कर पीड़ित परिजनों को देने के निर्देश दिए हैं।
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ऐसी होगी धनराशि देने की प्रक्रिया
मानवाधिकार आयोग ने अपने आदेश में निर्देशित किया है कि कारागार महानिरीक्षक इस मामले में दोषी पाए गए अफसरों और कर्मचारियों के वेतन से दो लाख रुपये वसूलकर जिला कोषागार में जमा करवाएं। इसके बाद जिलाधिकारी की ओर से दो लाख रुपये का चेक बनाया जाए। डीएम के माध्यम से यह चेक पीड़ित परिजनों को दिया जाए। आदेश में मानवाधिकार आयोग ने एक सप्ताह में इस प्रक्रिया को पूरी कराकर उप्र शासन से कार्रवाई की रिपोर्ट मांगी है।
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बंदी की मौत की हुई थी मजिस्ट्रेटी जांच
मुजफ्फरनगर। जिला कारागार में बंदी अंकित उर्फ रसगुल्ला के फांसी लगाकर जान देने के मामले की मजिस्ट्रेटी जांच हुई थी। डीएम के आदेश पर तत्कालीन सिटी मजिस्ट्रेट राजेंद्र कुमार त्यागी ने इस मामले की मजिस्ट्रीयल जांच की थी। उन्होंने दो माह तक जांच कर आख्या आठ जुलाई 2008 को डीएम को सौंपी गई थी।
लापरवाही के कारण हुई थी बंदी की मौत
मुजफ्फरनगर। बंदी अंकित की मौत के मामले की मजिस्ट्रीयल जांच करने वाले सिटी मजिस्ट्रेट राजेश कुमार त्यागी ने अपनी जांच आख्या में बताया था कि जेल के अफसरों और कर्मचारियों की लापरवाही के कारण बंदी की मौत हुई। मजिस्ट्रीयल जांच में तत्कालीन जेल अधीक्षक हरीशचंद राय, डिप्टी जेलर रामप्रकाश, डिप्टी जेलर सुमित कुमार, मुख्य बंदीरक्षक रामपुरी गोस्वामी, बंदीरक्षक अजीत तिवारी, बंदीरक्षक राकेश कुमार, बंदीरक्षक मुकेश कुमार गौतम की लापरवाही के कारण बंदी की मौत होना बताया गया था। इनमें से वर्तमान में हरीशचंद राय और रामपुरी गोस्वामी रिटायर हो चुके हैं, जबकि रामप्रकाश लखमीपुर खीरी में, सुमित कुमार भदोही में, अजीत तिवारी बरेली में, राकेश कुमार बुलंदशहर में और मुकेश कुमार गौतम गाजियाबाद में तैनात हैं।
आदेश अभी नहीं आया
जिला कारागार अधीक्षक राकेश सिंह का कहना है कि उक्त संबंध में अभी तक उन्हें कोई आदेश प्राप्त नहीं हुआ है। आदेश की प्रति मिलते ही यथोचित कार्रवाई की जाएगी।