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दलित आंदोलन से भाजपा को लगा झटका
ब्यूरो, अमर उजाला/ मुजफ्फरनगर
Updated Fri, 01 Jun 2018 12:00 AM IST
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दो अप्रैल के दलित आंदोलन के दौरान भड़की थी हिंसा। (फाइल फोटो)
- फोटो : अमर उजाला
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मुजफ्फरनगर। एससी-एसटी एक्ट में बदलाव के मुद्दे पर दलित आंदोलन ने भाजपा के खिलाफ माहौल तैयार किया। कैराना उपचुनाव के नतीजे से यह साबित भी हो गया है। दो अप्रैल को शहर में दलितों पर लाठीचार्ज के साथ फायरिंग हुई, जिसमें भोपा के गादला गांव निवासी अमरेश की मौत हो गई थी। पुलिस प्रशासन ने मामले को संभालने में चूक की। मुकदमे दर्ज होने के साथ दलितों की गिरफ्तारी को दबिश दी गई, तो पुलिस को विरोध झेलना पड़ा। बसपा, भीम आर्मी और उधम सिंह सेना ने अंदरुनी तरीके से दलितों को बीजेपी सरकार के खिलाफ लामबंद किया।
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लोकसभा उपचुनाव से पहले सुप्रीम कोर्ट द्वारा एससी-एसटी एक्ट में बदलाव के फैसले पर उपजे दलित आक्रोश ने कैराना में भाजपा को क्षति पहुंचाई। पहले से ही भीम आर्मी प्रमुख चंद्रशेखर उर्फ रावण के खिलाफ रासुका की कार्रवाई से युवा दलितों में गुस्सा था। दो अप्रैल को जिले में जुटे हजारों दलितों ने शहर में उपद्रव किया। ट्रेन रोक दी गई और बाजारों में तोड़फोड़ की। आंदोलन हिंसा में बदल गया और आगजनी हुई। पुलिस को लाठीचार्ज करना पड़ा। इस दौरान फायरिंग में भोपा के गादला निवासी दलित युवक अमरेश की मौत हो गई। प्रशासन समझ नहीं पाया कि विरोध प्रदर्शन में हजारों दलित कैसे जुट गए। हक्के-बक्के अफसरों और भाजपाइयों में भी समन्वय नहीं बन पाया। आंदोलनकारियों के खिलाफ 43 मुकदमे दर्ज हो गए। 140 से ज्यादा की गिरफ्तारी कर जेल भेज दिया गया। दलितों का आक्रोश तब भड़का, जब पुलिस ने गिरफ्तारी के लिए घरों पर दबिश देनी प्रारंभ की। घबराए दलितों ने पुलिस से बचने के लिए कैराना, शामली और सहारनपुर में रिश्तेदारों के यहां छिप पर जान बचाई। मामले को संभालने के लिए आरएसएस को हस्तक्षेप करना पड़ा।
तत्काल गाजियाबाद में आरएसएस क्षेत्रीय संयोजक सूर्यप्रकाश टांक और क्षेत्र प्रचारक आलोक ने बैठक बुलाई, जिसमें भाजपा के तमाम सांसद, मंत्री, विधायक शामिल हुए। दलितों के पनपते आक्रोश को शांत करने के लिए रणनीति बदली गई। दलितों से संवाद के साथ मामले पर फैली भ्रांति को दूर करने का अभियान चलाया गया। डॉ भीमराव आंबेडकर की जयंती भाजपा ने बढ़चढ़ कर मनाई, लेकिन ये कोशिश नाकाम साबित हुई। पूरे प्रकरण से दलित लामबंद हो गए। कैराना उप चुनाव में दलितों ने जिस तरीके से गठबंधन प्रत्याशी तबस्सुम हसन के पक्ष में मतदान किया, उससे उनमें पनपा आक्रोश साबित हो गया है। पूर्व केंद्रीय राज्यमंत्री एवं सांसद डॉ संजीव बालियान ने स्वीकार किया कि डीएम-एसएसपी की अदूर्शिता की वजह से दलित आंदोलन अनियंत्रित हुआ था।
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जेल में बंद है कई दलित नेता
मुजफ्फरनगर। उपद्रव और हिंसा के बाद पुलिस प्रशासन ने बसपा जिलाध्यक्ष कमल गौतम की गिरफ्तारी की थी। क्राइम ब्रांच और एलआईयू ने सर्विलांस से दलित नेताओं के फोन सुने और दो अप्रैल के प्रदर्शन को लेकर की गई तैयारियों का खुलासा किया। गौतम अभी भी जेल में है। पार्टी ने बसपा का नया जिलाध्यक्ष बना दिया। भीम आर्मी जिलाध्यक्ष उपकार बावरा और उधम सिंह सेना के जिलाध्यक्ष विकास मेडियन भी सलाखों के पीछे है। उपकार पर प्रशासन ने रासुका की कार्रवाई की है।
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