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बोली भाग्यश्री, पति की वर्दी को खुंटी पर नहीं लटकने दूंगी
Wed, 27 Feb 2019 11:57 PM IST
Deepak Kausik
अमर उजाला ब्यूरो/ मुजफ्फरनगर
अमर उजाला ब्यूरो/ मुजफ्फरनगर
Published by: Deepak Kausik
Updated Wed, 27 Feb 2019 11:57 PM IST
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कर्नल विश्वास कुमार की पत्नी भाग्यश्री।
- फोटो : अमर उजाला
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भारत की पराक्रमी सेना देशभक्ति की ऐसी भावना जाग्रत करती है कि मुश्किल हालातों में भी परिजन सेना में शामिल होकर मां भारती की सेवा करना चाहते हैं। कर्नल विश्वास कुमार को खो देने के बाद उनकी पत्नी भाग्यश्री ने प्रण किया कि पति की वर्दी को हैंगर में नहीं लटकने दूंगी। एक बेटे की मां ने एसएसबी की परीक्षा उत्तीर्ण की और अब वह ओटीए चेन्नई में लेफ्टिनेंट की ट्रेनिंग कर रही है।
भारतीय सेना की सैन्य क्षमता और देश के प्रति समर्पण बेजोड़ है। चाहे सेना के सपूतों की शहादत हो, या देश सेवा के दौरान असमय मृत्यु। कठिन परिस्थितियां भी सेना से जुड़े परिवारों को विचलित नहीं करती है। कर्नल विश्वास कुमार की पत्नी भाग्यश्री के अदम्य साहस की यही दास्तां है। शहर के गांधीनगर निवासी सूबेदार वीरेंद्र कुमार का पैतृक गांव चरथावल ब्लाक का बधाईखुर्द है। वह सेना की ईएमआई कोर से दो दशक पहले रिटायर हो चुके हैं। पिता से मिली देश प्रेम की घुट्टी को उनके बड़े बेटे विश्वास ने बचपन में ही पी लिया था।
अजमेर के मिलिट्री स्कूल में पढ़े और 12 जून 1999 को आईएमए देहरादून से लेफ्टिनेंट बने। अपने बैच में उन्होंने तृतीय स्थान पाया था। पंजाब में 119 इंजीनियरिंग कोर में चंडी मंदिर पर उन्हें पहली पोस्टिंग मिली। उनमें देश सेवा का ऐसा जोश था, नौकरी में रहते हवाई जहाज से पैरा फोर्स का प्रशिक्षण लिया। कर्नल बनने के बाद उनकी तैनाती चेन्नई में हुई। उस वक्त परिवार में पत्नी भाग्यश्री और छह साल का बेटा विवान था। 11 अक्तूबर 2017 को सेना ग्राउंड पर दौड़ लगाते हुए ह्दयाघात से कर्नल विश्वास कुमार की मृत्यु हो गई। असमय उनके निधन से परिवार के दर्द को समझा जा सकता है।
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सात दिन बाद गांधी नगर आवास पर श्रद्धांजलि यज्ञ में उनकी पत्नी भाग्यश्री ने संकल्प लिया कि कर्नल विश्वास कुमार की वर्दी को हैंगर में नहीं लटकने दूंगी। परिवार की सेना की सेवा की परंपरा को कायम रखूंगी। उन्होंने लगन से एसएसबी (सर्विस सेलेक्शन बोर्ड) का एग्जाम क्लीयर किया। बेटे विवान को साथ रखा। मां का फर्ज भी निभाया। भाग्यश्री खुद एनसीसी में राष्ट्रपति अवार्ड पा चुकी हैं।
उन्होंने यूएसए से पायलट का कोर्स भी किया था। वर्तमान में वह चेन्नई की आफिसर ट्रेनिंग एकडमी (ओटीए) में लेफ्टिनेंट का प्रशिक्षण ले रही हैं। 9 मार्च में उनकी पासिंग परेड है। खतौली भैंसी गांव निवासी उनकी सास ओमवती देवी को बहू के लेफ्टिनेंट बन कर आने का इंतजार है। सूबेदार विरेंद्र कुमार कहते है कि बेटे की मौत के सात दिन बाद ही बहू भाग्यश्री ने सेना ज्वांइन करने का लक्ष्य बना लिया था।
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भारतीय सेना की सैन्य क्षमता और देश के प्रति समर्पण बेजोड़ है। चाहे सेना के सपूतों की शहादत हो, या देश सेवा के दौरान असमय मृत्यु। कठिन परिस्थितियां भी सेना से जुड़े परिवारों को विचलित नहीं करती है। कर्नल विश्वास कुमार की पत्नी भाग्यश्री के अदम्य साहस की यही दास्तां है। शहर के गांधीनगर निवासी सूबेदार वीरेंद्र कुमार का पैतृक गांव चरथावल ब्लाक का बधाईखुर्द है। वह सेना की ईएमआई कोर से दो दशक पहले रिटायर हो चुके हैं। पिता से मिली देश प्रेम की घुट्टी को उनके बड़े बेटे विश्वास ने बचपन में ही पी लिया था।
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अजमेर के मिलिट्री स्कूल में पढ़े और 12 जून 1999 को आईएमए देहरादून से लेफ्टिनेंट बने। अपने बैच में उन्होंने तृतीय स्थान पाया था। पंजाब में 119 इंजीनियरिंग कोर में चंडी मंदिर पर उन्हें पहली पोस्टिंग मिली। उनमें देश सेवा का ऐसा जोश था, नौकरी में रहते हवाई जहाज से पैरा फोर्स का प्रशिक्षण लिया। कर्नल बनने के बाद उनकी तैनाती चेन्नई में हुई। उस वक्त परिवार में पत्नी भाग्यश्री और छह साल का बेटा विवान था। 11 अक्तूबर 2017 को सेना ग्राउंड पर दौड़ लगाते हुए ह्दयाघात से कर्नल विश्वास कुमार की मृत्यु हो गई। असमय उनके निधन से परिवार के दर्द को समझा जा सकता है।
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सात दिन बाद गांधी नगर आवास पर श्रद्धांजलि यज्ञ में उनकी पत्नी भाग्यश्री ने संकल्प लिया कि कर्नल विश्वास कुमार की वर्दी को हैंगर में नहीं लटकने दूंगी। परिवार की सेना की सेवा की परंपरा को कायम रखूंगी। उन्होंने लगन से एसएसबी (सर्विस सेलेक्शन बोर्ड) का एग्जाम क्लीयर किया। बेटे विवान को साथ रखा। मां का फर्ज भी निभाया। भाग्यश्री खुद एनसीसी में राष्ट्रपति अवार्ड पा चुकी हैं।
उन्होंने यूएसए से पायलट का कोर्स भी किया था। वर्तमान में वह चेन्नई की आफिसर ट्रेनिंग एकडमी (ओटीए) में लेफ्टिनेंट का प्रशिक्षण ले रही हैं। 9 मार्च में उनकी पासिंग परेड है। खतौली भैंसी गांव निवासी उनकी सास ओमवती देवी को बहू के लेफ्टिनेंट बन कर आने का इंतजार है। सूबेदार विरेंद्र कुमार कहते है कि बेटे की मौत के सात दिन बाद ही बहू भाग्यश्री ने सेना ज्वांइन करने का लक्ष्य बना लिया था।