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टूटा जीत का सिलसिला, देरी ने भी निभाई भूमिका
Muzaffar nagar
Updated Mon, 20 Oct 2014 05:31 AM IST
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शामली। लगातार चार बार जीत दर्ज करने के बाद उपचुनाव में भाजपा की हार पर सवाल उठने लगे हैं। प्रत्याशी की घोषणा में देरी, चुनाव प्रचार में किसी बडे़ स्टार या नेता का न आना, यह वजहें उठ रही हैं।
सीट पर 1996 से लगातार भाजपा का कब्जा था। अप्रैल में हुए लोकसभा चुनाव में भी इस विधानसभा सीट पर भाजपा बढ़त में थी, लेकिन हुकुम सिंह के संासद बनने के बाद खाली हुई इस सीट पर पहली बार भाजपा को हुकुम सिंह से हटकर दूसरे चेहरे को चुनाव लड़ाना था। लिहाजा कई ने दावेदारी की, कश्यप, जाट और गुर्जर वर्ग से एक दर्जन नाम मजबूती से सामने आए। सूत्रों के अनुसार यह भी चर्चा उठी कि सांसद हुकुम सिंह इस सीट से अपनी बेटी को टिकट दिलाना चाहते हैं। लेकिन हाईकमान के लोग इसके लिए तैयार नहीं थे। दावेदार अधिक होने के कारण पार्टी को टिकट फाइनल करने में भी काफी वक्त लगा और नामांकन के आखिरी दिन से एक दिन पहले अनिल चौहान को टिकट दे दिया गया। घोषणा में देरी होने कारण तैयारी के लिए वक्त कम मिला। यह भी माना जा रहा है कि कश्यप बिरादरी से दावेदारी कर रहे जिलाध्यक्ष रामजीलाल कश्यप और रमश्ेा चंद्र गौड़ कश्यप को टिकट न देेने से भी कश्यप नाराज रहे और कुछ जगह उन्होंने सपा का साथ दिया। हार के बाद अब यह बाते हो रही हैं। चुनाव प्रचार में किसी बडे़ स्टार को नही भेजना भी खल रहा है। जबकि सपा ने कई मंत्रियों के अलावा शिवपाल यादव की दो रैलियां कराई। भाजपा को इन सब बातों पर मंथन करना होगा कि आखिर क्या वजह रही कि 20 साल से लगातार चली आ रही जीत का सिलसिला इस बार टूट गया।
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सीट पर 1996 से लगातार भाजपा का कब्जा था। अप्रैल में हुए लोकसभा चुनाव में भी इस विधानसभा सीट पर भाजपा बढ़त में थी, लेकिन हुकुम सिंह के संासद बनने के बाद खाली हुई इस सीट पर पहली बार भाजपा को हुकुम सिंह से हटकर दूसरे चेहरे को चुनाव लड़ाना था। लिहाजा कई ने दावेदारी की, कश्यप, जाट और गुर्जर वर्ग से एक दर्जन नाम मजबूती से सामने आए। सूत्रों के अनुसार यह भी चर्चा उठी कि सांसद हुकुम सिंह इस सीट से अपनी बेटी को टिकट दिलाना चाहते हैं। लेकिन हाईकमान के लोग इसके लिए तैयार नहीं थे। दावेदार अधिक होने के कारण पार्टी को टिकट फाइनल करने में भी काफी वक्त लगा और नामांकन के आखिरी दिन से एक दिन पहले अनिल चौहान को टिकट दे दिया गया। घोषणा में देरी होने कारण तैयारी के लिए वक्त कम मिला। यह भी माना जा रहा है कि कश्यप बिरादरी से दावेदारी कर रहे जिलाध्यक्ष रामजीलाल कश्यप और रमश्ेा चंद्र गौड़ कश्यप को टिकट न देेने से भी कश्यप नाराज रहे और कुछ जगह उन्होंने सपा का साथ दिया। हार के बाद अब यह बाते हो रही हैं। चुनाव प्रचार में किसी बडे़ स्टार को नही भेजना भी खल रहा है। जबकि सपा ने कई मंत्रियों के अलावा शिवपाल यादव की दो रैलियां कराई। भाजपा को इन सब बातों पर मंथन करना होगा कि आखिर क्या वजह रही कि 20 साल से लगातार चली आ रही जीत का सिलसिला इस बार टूट गया।
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