{"_id":"49-78291","slug":"Muzaffar-nagar-78291-49","type":"story","status":"publish","title_hn":"कैराना के दीये मुंबई को कर रहे रोशन","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
कैराना के दीये मुंबई को कर रहे रोशन
Muzaffar nagar
Updated Mon, 20 Oct 2014 05:31 AM IST
विज्ञापन
कैराना। कैराना की चिकनी मिट्टी से चाक पर चढ़ा कर बनाए गए दीये महाराष्ट्र, दिल्ली, हरियाणा व पंजाब तक सप्लाई किए जाते हैं। जिस कारण कैराना के बने दीये दीपावली को रोशन करते चले आ रहे हैं।
कैराना के मोहल्ला बिसातियान निवासी रतन लाल प्रजापति अपने मकान में बैठा कच्ची मिट्टी के करवों की तली को लकड़ी की पट्टी से समतल करने पर लगा था, जबकि मकान के बाहर हजाराें कच्चे दीये सुखाने के लिए रखे थे। हजारों तैयार पक्के दीये भी रखे थे। रतनलाल प्रजापति ने बताया कि कैराना में पहले काफी लोग इस कार्य को करते थे, लेकिन अब केवल 15-16 कारीगर की चाक पर मिट्टी के दीये बनाने का काम चल रहा है। दीपावली के सीजन में दो माह पहले से ही दीये बनाने का काम शुरू कर दिया जाता है। एक व्यक्ति दो माह के सीजन में डेढ़ लाख दीये बना लेता है। जिन्हें महाराष्ट्र, दिल्ली, हरियाणा व पंजाब आदि प्रदेशाें के व्यापारी थोक भाव में 25 रुपये सैकड़ा के हिसाब से ले जाकर अपने यहां बेचते हैं। उन्होंने बताया कि यह उनका पुस्तैनी काम है। उनके बच्चे यह काम नहीं करके अन्य काम में लग गये हैं। बाबूराम, सुखबीर, रविंद्र, प्रेम आदि 15 के आसपास कारीगर अब भी मिट्टी के दीये बनाने के काम में लगे हैं। मिट्टी के दीये बनाने वाले कारीगर कम होते जा रहे हैं।
विज्ञापन
कैराना के मोहल्ला बिसातियान निवासी रतन लाल प्रजापति अपने मकान में बैठा कच्ची मिट्टी के करवों की तली को लकड़ी की पट्टी से समतल करने पर लगा था, जबकि मकान के बाहर हजाराें कच्चे दीये सुखाने के लिए रखे थे। हजारों तैयार पक्के दीये भी रखे थे। रतनलाल प्रजापति ने बताया कि कैराना में पहले काफी लोग इस कार्य को करते थे, लेकिन अब केवल 15-16 कारीगर की चाक पर मिट्टी के दीये बनाने का काम चल रहा है। दीपावली के सीजन में दो माह पहले से ही दीये बनाने का काम शुरू कर दिया जाता है। एक व्यक्ति दो माह के सीजन में डेढ़ लाख दीये बना लेता है। जिन्हें महाराष्ट्र, दिल्ली, हरियाणा व पंजाब आदि प्रदेशाें के व्यापारी थोक भाव में 25 रुपये सैकड़ा के हिसाब से ले जाकर अपने यहां बेचते हैं। उन्होंने बताया कि यह उनका पुस्तैनी काम है। उनके बच्चे यह काम नहीं करके अन्य काम में लग गये हैं। बाबूराम, सुखबीर, रविंद्र, प्रेम आदि 15 के आसपास कारीगर अब भी मिट्टी के दीये बनाने के काम में लगे हैं। मिट्टी के दीये बनाने वाले कारीगर कम होते जा रहे हैं।
विज्ञापन