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वेदों की संवाहक बनी टंढेड़ा की बेटियां
Updated Fri, 09 Feb 2018 11:41 PM IST
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मोरना।
बिना भेदभाव के एक किसान ने अपनी बेटियों को उच्च शिक्षित ही नहीं किया, बल्कि उन्हें भारतीय संस्कृति का संवाहक भी बनाया। टंढेड़ा गांव की ये बेटियां मिसाल बन गई हैं। वेद पाठ के साथ एक बेटी पुरोहित का दायित्व भी निभा रही है, जबकि एक गुरुकुल कांगड़ी हरिद्वार में संस्कृत विषय में पीएचडी कर रही है।
ककरौली क्षेत्र के गांव टंढेड़ा निवासी सत्यवीर सिंह आर्य ने कम पढ़ा-लिखा होने के बावजूद अपनी बेटियों को पढ़ाने की ठानी। जिले के दूरस्थ गांव में खेतीबाड़ी से जुड़े परिवार ने लड़कियों को न केवल उच्चशिक्षा की राह दिखाई, बल्कि उन्हें वेदों का अध्ययन भी कराया। चार दशक पहले जब बेटियों की उच्च शिक्षा के बारे में सोचना भी मुश्किल था, उस वक्त कक्षा पांच तक पढ़े किसान ने यह सपना देखा। चार बेटियों को ग्रेजुएट और पोस्ट ग्रेजुएट के साथ बीएड की शिक्षा दिलाई। साथ ही वैदिक संस्कृति का संवाहक बनाने को उन्हें वैदिक अध्ययन कराया। बड़ी बेटी संगीता आर्य शहर के लालबाग में रहती हैं, जो बड़े यज्ञों में पुरोहित का दायित्व निभाती हैं। वह बताती हैं कि खेतों में कड़ी मेहनत के बाद भी उनके पिता उपनिषद, दर्शन और वैदिक साहित्य पढ़ते थे। लालटेन की रोशनी में स्वाध्याय की उनकी आदत से हम बहनों को प्रेरणा मिली। गाजियाबाद के वसुंधरा में रह रही सुनीता आर्य एमए बीएड हैं।
उनका कहना है कि पढ़ें बेटियां, बढ़ें बेटियां का जो संदेश आजादी के 69 साल बाद देश को मिला, उसे उनके पिता ने पहले ही अपना लिया था। ग्रामीण अंचल में बालिका शिक्षा के ज्यादा विकल्प नहीं थे। श्वेता तोमर और सुजाता सिंह बताती हैं कि उन्हें स्नातक और बीएड के लिए शहर भेजा गया। सभी बहनों को भारतीय वैदिक संस्कृति से जोड़ने के लिए उनके बाबा जिले सिंह आर्य ने हमेशा हौसला बढ़ाया। माता रफल कौर ने चारों बेटियों के जीवन को शिक्षा से सुरक्षित करने का फर्ज पूरा किया।
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वेदवाणी में निपुण प्रभा
मोरना। बेटियों को पढ़ाने का यह लक्ष्य तीसरी पीढ़ी में भी ज्योतिर्मय है। पहलवान सत्यवीर सिंह की पौत्री प्रभा आर्य ने गुरुकुल चोटीपुरा से 12वीं पास की। नजीबाबाद गुरुकुल से एमए संस्कृत के बाद वह गुरुकुल कांगड़ी हरिद्वार से पीएचडी कर रही हैं। उनके वेदपाठ को सुनकर हर कोई प्रभावित होता है। गुरुकुल झज्जर में वेदों की शिक्षा पा चुके घर के एक बाबा स्वामी वेदानंद सरस्वती बन गए, जिन्होंने पंजाब के रोपड़ में अपना आश्रम बना लिया था। प्रज्ञा आर्य भी वैदिक संस्कृति में ही करियर बनाना चाहती हैं।
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बिना भेदभाव के एक किसान ने अपनी बेटियों को उच्च शिक्षित ही नहीं किया, बल्कि उन्हें भारतीय संस्कृति का संवाहक भी बनाया। टंढेड़ा गांव की ये बेटियां मिसाल बन गई हैं। वेद पाठ के साथ एक बेटी पुरोहित का दायित्व भी निभा रही है, जबकि एक गुरुकुल कांगड़ी हरिद्वार में संस्कृत विषय में पीएचडी कर रही है।
ककरौली क्षेत्र के गांव टंढेड़ा निवासी सत्यवीर सिंह आर्य ने कम पढ़ा-लिखा होने के बावजूद अपनी बेटियों को पढ़ाने की ठानी। जिले के दूरस्थ गांव में खेतीबाड़ी से जुड़े परिवार ने लड़कियों को न केवल उच्चशिक्षा की राह दिखाई, बल्कि उन्हें वेदों का अध्ययन भी कराया। चार दशक पहले जब बेटियों की उच्च शिक्षा के बारे में सोचना भी मुश्किल था, उस वक्त कक्षा पांच तक पढ़े किसान ने यह सपना देखा। चार बेटियों को ग्रेजुएट और पोस्ट ग्रेजुएट के साथ बीएड की शिक्षा दिलाई। साथ ही वैदिक संस्कृति का संवाहक बनाने को उन्हें वैदिक अध्ययन कराया। बड़ी बेटी संगीता आर्य शहर के लालबाग में रहती हैं, जो बड़े यज्ञों में पुरोहित का दायित्व निभाती हैं। वह बताती हैं कि खेतों में कड़ी मेहनत के बाद भी उनके पिता उपनिषद, दर्शन और वैदिक साहित्य पढ़ते थे। लालटेन की रोशनी में स्वाध्याय की उनकी आदत से हम बहनों को प्रेरणा मिली। गाजियाबाद के वसुंधरा में रह रही सुनीता आर्य एमए बीएड हैं।
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उनका कहना है कि पढ़ें बेटियां, बढ़ें बेटियां का जो संदेश आजादी के 69 साल बाद देश को मिला, उसे उनके पिता ने पहले ही अपना लिया था। ग्रामीण अंचल में बालिका शिक्षा के ज्यादा विकल्प नहीं थे। श्वेता तोमर और सुजाता सिंह बताती हैं कि उन्हें स्नातक और बीएड के लिए शहर भेजा गया। सभी बहनों को भारतीय वैदिक संस्कृति से जोड़ने के लिए उनके बाबा जिले सिंह आर्य ने हमेशा हौसला बढ़ाया। माता रफल कौर ने चारों बेटियों के जीवन को शिक्षा से सुरक्षित करने का फर्ज पूरा किया।
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वेदवाणी में निपुण प्रभा
मोरना। बेटियों को पढ़ाने का यह लक्ष्य तीसरी पीढ़ी में भी ज्योतिर्मय है। पहलवान सत्यवीर सिंह की पौत्री प्रभा आर्य ने गुरुकुल चोटीपुरा से 12वीं पास की। नजीबाबाद गुरुकुल से एमए संस्कृत के बाद वह गुरुकुल कांगड़ी हरिद्वार से पीएचडी कर रही हैं। उनके वेदपाठ को सुनकर हर कोई प्रभावित होता है। गुरुकुल झज्जर में वेदों की शिक्षा पा चुके घर के एक बाबा स्वामी वेदानंद सरस्वती बन गए, जिन्होंने पंजाब के रोपड़ में अपना आश्रम बना लिया था। प्रज्ञा आर्य भी वैदिक संस्कृति में ही करियर बनाना चाहती हैं।