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निकायों के धुरंधर मार ले गए बाजी
Updated Sat, 02 Dec 2017 11:42 PM IST
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निर्दलियों की जीत नहीं रोक पाए बड़े सियासी दल
मुजफ्फरनगर। निकाय चुनाव में भले ही पार्टियां चुनाव लड़ रही हों, लेकिन इनमें राजनीतिक धुरंधर ही सब पर भारी पड़े हैं। जिन नगरों में स्थानीय प्रभाव रखने वाले राजनीति के इन खिलाड़ियों की अवहेलना हुई, वहां इन्होंने निर्दलीय चुनाव लड़कर अपनी ताकत दिखाई है। अध्यक्ष पद पर अधिकतम जीत उन पुराने परिवारों और चेहरों को ही मिली है, जिनकी नगर में पहचान है।
जिले की दस निकायों में अध्यक्ष पद पर अधिकतम वही जीते हैं, जिन्होंने जनता के लिए संघर्ष किया है। जानसठ में बीजेपी के प्रवेंद्र भड़ाना का अपवाद छोड़ दें तो सभी वही चेयरमैन जीते हैं, जो लंबे समय से स्थानीय राजनीति में सक्रिय थे। मीरापुर में चुनाव जीतने वाली तंजीला बेगम के पति जहीर कुरैशी लंबे समय से राजनीति में हैं। वह इससे पहले भी चेयरमैन रह चुके हैं। मुजफ्फरनगर में चुनाव जीतने वाली अंजू अग्रवाल का परिवार शहर का प्रतिष्ठित परिवार है। उनके जेठ लाला मूलचंद शहर की शिक्षण और सामाजिक संस्थाओं से जुड़े हैं। भतीजे पंकज अग्रवाल निवर्तमान चेयरमैन हैं। पुरकाजी में चेयरमैन के पद पर जीतने वाले जहीर फारूकी जनहित में संघर्ष करते रहे हैं। चरथावल में निवर्तमान चेयरमैन सतेंद्र त्यागी के परिवार को दोबारा जीत मिली है। यहां सबसे बड़ी बात यह रही कि दूसरे स्थान पर भी पूर्व चेयरमैन फतेहदीन रहे। जनता ने अपने बीच संघर्ष करने वालों पर ही भरोसा जताया। बुढाना की राजनीति में लंबे समय से जनता के बीच संघर्ष करने वाले निवर्तमान चेयरमैन भाजपा नेता जितेंद्र त्यागी की पत्नी बाला त्यागी ने ही जीत हासिल की। मुकाबले में भी पूर्व चेयरमैन शाहबुद्दीन मुन्नन रहे। यहां जनता ने फिल्म स्टार नवाजुद्दीन सिद्दीकी के परिवार पर भरोसा नहीं जताया। उनकी भाभी सबा सिद्दीकी पांचवें स्थान पर रहीं। शाहपुर में भाजपा के परमेश सैनी जीते। परमेश सैनी बीते दस वर्षों से लगातार जनता के बीच रहकर काम कर रहे थे। 2012 के चुनाव में भी वह कुछ ही मतों से हार गए थे, उन्हें भी लगातार संघर्ष का फल मिला। खतौली नगर पालिका में सपा नेता काजी जमील की पत्नी बिलकिस बानो चुनाव जीती हैं। जमील सपा में लंबे समय से राजनीति कर रहे हैं। उनकी मेहनत को देखते हुए ही जनता ने उन पर विश्वास जताया है। सिसौली में भी पूर्व चेयरमैन यशपाल बंजी की पत्नी ने चुनाव जीता है। वह भी लंबे समय से कस्बे की राजनीति कर रहे हैं। यहां बड़ी बात यह है कि जिन नगरों में पुराने धुरंधरों को पार्टी का टिकट नहीं मिला, वहां वह निर्दलीय चुनाव जीत गए। निकायों की राजनीति कस्बों के उन चुनिंदा लोगों के ईर्द-गिर्द ही रहती है, जो संघर्ष कर आगे आते हैं।
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मुजफ्फरनगर। निकाय चुनाव में भले ही पार्टियां चुनाव लड़ रही हों, लेकिन इनमें राजनीतिक धुरंधर ही सब पर भारी पड़े हैं। जिन नगरों में स्थानीय प्रभाव रखने वाले राजनीति के इन खिलाड़ियों की अवहेलना हुई, वहां इन्होंने निर्दलीय चुनाव लड़कर अपनी ताकत दिखाई है। अध्यक्ष पद पर अधिकतम जीत उन पुराने परिवारों और चेहरों को ही मिली है, जिनकी नगर में पहचान है।
जिले की दस निकायों में अध्यक्ष पद पर अधिकतम वही जीते हैं, जिन्होंने जनता के लिए संघर्ष किया है। जानसठ में बीजेपी के प्रवेंद्र भड़ाना का अपवाद छोड़ दें तो सभी वही चेयरमैन जीते हैं, जो लंबे समय से स्थानीय राजनीति में सक्रिय थे। मीरापुर में चुनाव जीतने वाली तंजीला बेगम के पति जहीर कुरैशी लंबे समय से राजनीति में हैं। वह इससे पहले भी चेयरमैन रह चुके हैं। मुजफ्फरनगर में चुनाव जीतने वाली अंजू अग्रवाल का परिवार शहर का प्रतिष्ठित परिवार है। उनके जेठ लाला मूलचंद शहर की शिक्षण और सामाजिक संस्थाओं से जुड़े हैं। भतीजे पंकज अग्रवाल निवर्तमान चेयरमैन हैं। पुरकाजी में चेयरमैन के पद पर जीतने वाले जहीर फारूकी जनहित में संघर्ष करते रहे हैं। चरथावल में निवर्तमान चेयरमैन सतेंद्र त्यागी के परिवार को दोबारा जीत मिली है। यहां सबसे बड़ी बात यह रही कि दूसरे स्थान पर भी पूर्व चेयरमैन फतेहदीन रहे। जनता ने अपने बीच संघर्ष करने वालों पर ही भरोसा जताया। बुढाना की राजनीति में लंबे समय से जनता के बीच संघर्ष करने वाले निवर्तमान चेयरमैन भाजपा नेता जितेंद्र त्यागी की पत्नी बाला त्यागी ने ही जीत हासिल की। मुकाबले में भी पूर्व चेयरमैन शाहबुद्दीन मुन्नन रहे। यहां जनता ने फिल्म स्टार नवाजुद्दीन सिद्दीकी के परिवार पर भरोसा नहीं जताया। उनकी भाभी सबा सिद्दीकी पांचवें स्थान पर रहीं। शाहपुर में भाजपा के परमेश सैनी जीते। परमेश सैनी बीते दस वर्षों से लगातार जनता के बीच रहकर काम कर रहे थे। 2012 के चुनाव में भी वह कुछ ही मतों से हार गए थे, उन्हें भी लगातार संघर्ष का फल मिला। खतौली नगर पालिका में सपा नेता काजी जमील की पत्नी बिलकिस बानो चुनाव जीती हैं। जमील सपा में लंबे समय से राजनीति कर रहे हैं। उनकी मेहनत को देखते हुए ही जनता ने उन पर विश्वास जताया है। सिसौली में भी पूर्व चेयरमैन यशपाल बंजी की पत्नी ने चुनाव जीता है। वह भी लंबे समय से कस्बे की राजनीति कर रहे हैं। यहां बड़ी बात यह है कि जिन नगरों में पुराने धुरंधरों को पार्टी का टिकट नहीं मिला, वहां वह निर्दलीय चुनाव जीत गए। निकायों की राजनीति कस्बों के उन चुनिंदा लोगों के ईर्द-गिर्द ही रहती है, जो संघर्ष कर आगे आते हैं।
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