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मंगलकारी सांझी आई, देवी का आज पर्दापण
Updated Wed, 20 Sep 2017 12:43 AM IST
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मंगलकारी सांझी आई, देवी का कल पदार्पण
चरथावल (मुजफ्फरनगर)। आस्था की प्रतीक देवी स्वरूप सांझी का पदार्पण पितृ विसर्जन अमावस्या के बाद बुधवार को उल्लास के साथ होगा। वहीं, कस्बे एवं देहात में नवरात्रों के लिए बाजारों ने भी पूरी तैयारी कर ली है।
ग्रामीण परिवेश में आज भी सांझी का महत्व बरकरार है। हालांकि मिट्टी की किल्लत और नई पीढ़ी की महिलाओं के बदलते अंदाज के कारण रेडीमेड सांझी खरीदकर सजाने का चलन बढ़ा है। मोहल्ला महाब्रह्मणान, छिंपियान, बाजार खुर्द एवं गांव अलावलपुर, बलवाखेड़ी, दूधली, बिरालसी और कुटेसरा में महिलाएं हस्तनिर्मित सांझी तैयार की हैं। बालिका गौरी, नवनी, गुंजन, नव्या, नंदनी और सलोनी, अवनी, प्रिंसी आज भी मम्मी से घर पर ही सांझी और उसके साथ सजाने के लिए टिकड़ी, तोते, सांझी का भाई, बाजे वाला, मोर, बामनी आदि खिलौने बनाने की जिद करती हैं। शाम के वक्त बच्चे सजी झांकियों को देखने एक दूसरे के घरों में जाती हैं। कृष्ण कुमार शर्मा कहते हैं करीब दो दशक पहले गांव में हस्तनिर्मित सांझी को किशोरियों के लिए कला सीखने की पहली सीढ़ी मानी जाती थी। उधर, सांझी विक्रेता आलोक गर्ग कहते हैं कि परंपरा में तब्दीली का रुख सांझी पर नजर आने लगा है। ग्रामीण परिवेश में अधिकांश सांझी बाजार से खरीदी कर लगाई जाएगी। पूर्व प्रधानाचार्या सत्या वर्मा कहती हैं कि वक्त की तब्दीली में सांझी के पर्व पर भी बदलाव आया है।
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चरथावल (मुजफ्फरनगर)। आस्था की प्रतीक देवी स्वरूप सांझी का पदार्पण पितृ विसर्जन अमावस्या के बाद बुधवार को उल्लास के साथ होगा। वहीं, कस्बे एवं देहात में नवरात्रों के लिए बाजारों ने भी पूरी तैयारी कर ली है।
ग्रामीण परिवेश में आज भी सांझी का महत्व बरकरार है। हालांकि मिट्टी की किल्लत और नई पीढ़ी की महिलाओं के बदलते अंदाज के कारण रेडीमेड सांझी खरीदकर सजाने का चलन बढ़ा है। मोहल्ला महाब्रह्मणान, छिंपियान, बाजार खुर्द एवं गांव अलावलपुर, बलवाखेड़ी, दूधली, बिरालसी और कुटेसरा में महिलाएं हस्तनिर्मित सांझी तैयार की हैं। बालिका गौरी, नवनी, गुंजन, नव्या, नंदनी और सलोनी, अवनी, प्रिंसी आज भी मम्मी से घर पर ही सांझी और उसके साथ सजाने के लिए टिकड़ी, तोते, सांझी का भाई, बाजे वाला, मोर, बामनी आदि खिलौने बनाने की जिद करती हैं। शाम के वक्त बच्चे सजी झांकियों को देखने एक दूसरे के घरों में जाती हैं। कृष्ण कुमार शर्मा कहते हैं करीब दो दशक पहले गांव में हस्तनिर्मित सांझी को किशोरियों के लिए कला सीखने की पहली सीढ़ी मानी जाती थी। उधर, सांझी विक्रेता आलोक गर्ग कहते हैं कि परंपरा में तब्दीली का रुख सांझी पर नजर आने लगा है। ग्रामीण परिवेश में अधिकांश सांझी बाजार से खरीदी कर लगाई जाएगी। पूर्व प्रधानाचार्या सत्या वर्मा कहती हैं कि वक्त की तब्दीली में सांझी के पर्व पर भी बदलाव आया है।
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