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‘एक्सीडेंटल चेयरपर्सन’ से बनी मजबूत राजनीतिज्ञ
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दृढ़ इच्छा शक्ति के बल पर पाई सफलता की मुकाम
मुजफ्फरनगर। आबादी के लिहाज से प्रदेश की सबसे बड़ी नगर पालिका मुजफ्फरनगर की चुनौतियां भी उतनी ही बड़ी हैं। परिस्थितियां तब और कठिन हो जाती हैं, जब जिम्मेदारी उन कंधों पर आ जाए, जिनकी दुनियादारी घर-परिवार में सिमटी हो। हालांकि समय के अनुसार खुद को बदल लेना और कमजोरियों को ढाल बनाकर इस्तेमाल करना ही सही मायने में सफलता है।
नगर की प्रथम नागरिक अंजू अग्रवाल की दुनिया अपने पति अशोक अग्रवाल, दो पुत्र, एक पुत्री, नाती-पोतों के इर्द-गिर्द सीमित थी, लेकिन नवंबर 2017 में बड़ा बदलाव आया। वाराणसी में जन्मीं अंजू अग्रवाल बताती हैं कि वह अपने पति के साथ छह नवंबर 2017 को काशी विश्वनाथ के दर्शन कर रही थीं, तभी जेठ मूलचंद सराफ ने फोन किया कि नगर पालिका अध्यक्ष के नामांकन की कल आखिरी तारीख है और उन्हें चुनाव लड़ना है। किस्मत ही रही कि फ्लाइट में दो टिकट ही बचे थे। वे तुरंत मुजफ्फरनगर आ गईं और कांग्रेस से नामांकन पत्र दाखिल किया। भाजपा के गढ़ में करीब 11500 वोटों से जीती। अब जिम्मेदारी और बढ़ गई, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और आगे बढ़कर खुद कमान संभाली। उन्होंने अपना काम खुद किया। स्नातक तक शिक्षा प्राप्त अंजू अग्रवाल ने 12 दिसंबर 2017 को शपथ ग्रहण के एक साल चार महीने बाद अपनी छवि मजबूत राजनीतिज्ञ और कुशल प्रशासक की बना ली है। सत्ता और विपक्ष के द्वंद्व में अपनी जिम्मेदारियों निभा रही हैं। अंजू अग्रवाल बताती हैं कि चुनौतियां बहुत थी, लेकिन उन्होंने कदम पीछे नहीं हटाए। वह पालिका से संबंधित निर्णय खुद लेती हैं। शहर में अकेले घूमती हैं, तभी तो शहर की समस्याएं पता लगती हैं। महिलाओं से कहना है कि वे खुद को कमजोर न समझें। घर-परिवार से बाहर निकलें। उनके लिए खुला आसमान है।
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मुजफ्फरनगर। आबादी के लिहाज से प्रदेश की सबसे बड़ी नगर पालिका मुजफ्फरनगर की चुनौतियां भी उतनी ही बड़ी हैं। परिस्थितियां तब और कठिन हो जाती हैं, जब जिम्मेदारी उन कंधों पर आ जाए, जिनकी दुनियादारी घर-परिवार में सिमटी हो। हालांकि समय के अनुसार खुद को बदल लेना और कमजोरियों को ढाल बनाकर इस्तेमाल करना ही सही मायने में सफलता है।
नगर की प्रथम नागरिक अंजू अग्रवाल की दुनिया अपने पति अशोक अग्रवाल, दो पुत्र, एक पुत्री, नाती-पोतों के इर्द-गिर्द सीमित थी, लेकिन नवंबर 2017 में बड़ा बदलाव आया। वाराणसी में जन्मीं अंजू अग्रवाल बताती हैं कि वह अपने पति के साथ छह नवंबर 2017 को काशी विश्वनाथ के दर्शन कर रही थीं, तभी जेठ मूलचंद सराफ ने फोन किया कि नगर पालिका अध्यक्ष के नामांकन की कल आखिरी तारीख है और उन्हें चुनाव लड़ना है। किस्मत ही रही कि फ्लाइट में दो टिकट ही बचे थे। वे तुरंत मुजफ्फरनगर आ गईं और कांग्रेस से नामांकन पत्र दाखिल किया। भाजपा के गढ़ में करीब 11500 वोटों से जीती। अब जिम्मेदारी और बढ़ गई, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और आगे बढ़कर खुद कमान संभाली। उन्होंने अपना काम खुद किया। स्नातक तक शिक्षा प्राप्त अंजू अग्रवाल ने 12 दिसंबर 2017 को शपथ ग्रहण के एक साल चार महीने बाद अपनी छवि मजबूत राजनीतिज्ञ और कुशल प्रशासक की बना ली है। सत्ता और विपक्ष के द्वंद्व में अपनी जिम्मेदारियों निभा रही हैं। अंजू अग्रवाल बताती हैं कि चुनौतियां बहुत थी, लेकिन उन्होंने कदम पीछे नहीं हटाए। वह पालिका से संबंधित निर्णय खुद लेती हैं। शहर में अकेले घूमती हैं, तभी तो शहर की समस्याएं पता लगती हैं। महिलाओं से कहना है कि वे खुद को कमजोर न समझें। घर-परिवार से बाहर निकलें। उनके लिए खुला आसमान है।
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