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भगवान को पाने का भागवत ही माध्यम
Updated Sun, 04 Mar 2018 11:57 PM IST
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शुक्रताल स्थित शुकदेव आश्रम में मराठी और तेलगू सहित अन्य भाषाओं में भागवत कथा का आयोजन किया गया। वक्ताओं ने कहा कि भगवान को पाने का भागवत ही एकमात्र माध्यम है। मानव को सदैव धर्मपालन करना चाहिए।
शुकदेव आश्रम के डोगरे कथा भवन में आयोजित साप्ताहिक भागवत कथा के शुभारंभ पर पीठाधीश्वर स्वामी ओमानंद महाराज ने कहा कि संसार में तीन वस्तु दुर्लभ हैं। मनुष्य को जन्म मिलना, मोक्ष की इच्छा होना और किसी महापुरुष का आश्रय मिल जाना, ये तीनों वस्तु भगवान की कृपा से प्राप्त होती हैं। भगवान को पाने के लिए भागवत कथा सर्वोत्तम साधन है। आत्मा रथी है, शरीर रथ है, बुद्धि सारथी है, मन लगाम है, इंद्रियां घोड़े हैं, इंद्रियों के जो विषय हैं वही मार्ग है। जब किसी को कहीं जाना होता है, तभी वह रथ में बैठता है। हम भी शरीर रूपी रथ में बैठे हुए हैं। मानव को सदैव धर्मपालन करना चाहिए। लोक व्यवहार को शिथिल कर दो, त्याग दो, सद्पुरूषों की सेवा करो, विषय वासनाओं को हृदय से निकाल कर भागवत कथाओं का रसपान करते रहो। जिस प्रकार आकाश में कितनी चिड़ियां उड़ती रहती हैं। उनको दाना लेने के लिए जमीन पर उतरना पड़ता है। वैसे प्राणी कितना भी इधर-उधर भटकता रहे, उसको सुख शांति भगवान की शरण में ही मिलेगी। इस मौके पर मुंबई से पधारे स्वामी राघवेंद्र महाराज, खामगांव महाराष्ट्र से पधारे स्वामी राजेंद्र महाराज एवं तेलंगाना से पधारे स्वामी भास्कर शर्मा जी आदि भागवत कथा आचार्यों को स्वामी ओमानंद जी महाराज ने तिलक कर माला पहनाकर स्वागत किया। इस दौरान अचल शास्त्री, सुमन शास्त्री आदि मौजूद रहे।
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शुक्रताल स्थित शुकदेव आश्रम में मराठी और तेलगू सहित अन्य भाषाओं में भागवत कथा का आयोजन किया गया। वक्ताओं ने कहा कि भगवान को पाने का भागवत ही एकमात्र माध्यम है। मानव को सदैव धर्मपालन करना चाहिए।
शुकदेव आश्रम के डोगरे कथा भवन में आयोजित साप्ताहिक भागवत कथा के शुभारंभ पर पीठाधीश्वर स्वामी ओमानंद महाराज ने कहा कि संसार में तीन वस्तु दुर्लभ हैं। मनुष्य को जन्म मिलना, मोक्ष की इच्छा होना और किसी महापुरुष का आश्रय मिल जाना, ये तीनों वस्तु भगवान की कृपा से प्राप्त होती हैं। भगवान को पाने के लिए भागवत कथा सर्वोत्तम साधन है। आत्मा रथी है, शरीर रथ है, बुद्धि सारथी है, मन लगाम है, इंद्रियां घोड़े हैं, इंद्रियों के जो विषय हैं वही मार्ग है। जब किसी को कहीं जाना होता है, तभी वह रथ में बैठता है। हम भी शरीर रूपी रथ में बैठे हुए हैं। मानव को सदैव धर्मपालन करना चाहिए। लोक व्यवहार को शिथिल कर दो, त्याग दो, सद्पुरूषों की सेवा करो, विषय वासनाओं को हृदय से निकाल कर भागवत कथाओं का रसपान करते रहो। जिस प्रकार आकाश में कितनी चिड़ियां उड़ती रहती हैं। उनको दाना लेने के लिए जमीन पर उतरना पड़ता है। वैसे प्राणी कितना भी इधर-उधर भटकता रहे, उसको सुख शांति भगवान की शरण में ही मिलेगी। इस मौके पर मुंबई से पधारे स्वामी राघवेंद्र महाराज, खामगांव महाराष्ट्र से पधारे स्वामी राजेंद्र महाराज एवं तेलंगाना से पधारे स्वामी भास्कर शर्मा जी आदि भागवत कथा आचार्यों को स्वामी ओमानंद जी महाराज ने तिलक कर माला पहनाकर स्वागत किया। इस दौरान अचल शास्त्री, सुमन शास्त्री आदि मौजूद रहे।
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