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भूल नहीं सकते जख्म, अपनों को ढूंढती आंखें
Updated Thu, 07 Sep 2017 12:51 AM IST
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भूल नहीं सकते जख्म, अपनों को ढूंढती आंखें
मुजफ्फरनगर। दंगे से मिले जख्मों को कभी भुलाया नहीं जा सकता है। बेचैन दिल और नम आंखें आज भी अपनों को ढूंढती हैं। उन्माद की लपटों में शहर से लेकर गांव तक के अनगिनत परिवार झुलसे हैं। सहारे को नौकरी और पैसा भले ही मिला हो, मगर दंगे के दर्द को मिटाने की दवा इस जहान में कहीं नहीं है।
शहर निवासी दामोदर शर्मा अपने परिवार में कमाने वाला अकेला शख्स था। मेरठ रोड पर वह चाट का ठेला लगाता था। जिले में भड़की हिंसा ने दामोदर को भी जद में लिया और दंगाइयों ने उसकी हत्या कर दी। दामोदर पर परिवार की जिम्मेदारी थी। उसकी मौत के बाद परिवार टूटा तो प्रशासनिक मशीनरी ने मदद को हाथ तो बढ़ा दिए, लेकिन कातिलों का क्या हुआ, कोई नहीं जानता है। दामोदर की पत्नी सुनीता कहती हैं कि पति की मौत का गम आज भी है। दंगे के दिन याद कर सिहर उठती हैं और मनहूस घड़ी को कोसती हैं। सरकार ने दामोदर के बेटे अर्जुन को कलक्ट्रेट में नौकरी दी है। उधर, शहर के पत्रकार राजेश वर्मा भी उन्मादियों की गोली का शिकार हुए। राजेश की पत्नी नीरु मनहूस घड़ी को याद कर दुखी हो जाती हैं। रुंधे गले से कहती हैं कि उनके पति ने किसी का क्या बिगाड़ा था। बेटे को सरकार ने नौकरी दी और उन्हें मदद पहुंचाई, मगर राजेश की कमी पूरी नहीं हो सकती है। वहीं, भोपा के गांव किशनपुरा में रहने वाले निसार की मां को उसका इंतजार आज भी है। बेटे की तलाश में दुखियारी मां हर वक्त दरवाजे पर बेटे के आने की राह देख रही है, लेकिन निसार कहां गया और उसके साथ क्या हुआ, इसका जवाब किसी के पास नहीं है।
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मुजफ्फरनगर। दंगे से मिले जख्मों को कभी भुलाया नहीं जा सकता है। बेचैन दिल और नम आंखें आज भी अपनों को ढूंढती हैं। उन्माद की लपटों में शहर से लेकर गांव तक के अनगिनत परिवार झुलसे हैं। सहारे को नौकरी और पैसा भले ही मिला हो, मगर दंगे के दर्द को मिटाने की दवा इस जहान में कहीं नहीं है।
शहर निवासी दामोदर शर्मा अपने परिवार में कमाने वाला अकेला शख्स था। मेरठ रोड पर वह चाट का ठेला लगाता था। जिले में भड़की हिंसा ने दामोदर को भी जद में लिया और दंगाइयों ने उसकी हत्या कर दी। दामोदर पर परिवार की जिम्मेदारी थी। उसकी मौत के बाद परिवार टूटा तो प्रशासनिक मशीनरी ने मदद को हाथ तो बढ़ा दिए, लेकिन कातिलों का क्या हुआ, कोई नहीं जानता है। दामोदर की पत्नी सुनीता कहती हैं कि पति की मौत का गम आज भी है। दंगे के दिन याद कर सिहर उठती हैं और मनहूस घड़ी को कोसती हैं। सरकार ने दामोदर के बेटे अर्जुन को कलक्ट्रेट में नौकरी दी है। उधर, शहर के पत्रकार राजेश वर्मा भी उन्मादियों की गोली का शिकार हुए। राजेश की पत्नी नीरु मनहूस घड़ी को याद कर दुखी हो जाती हैं। रुंधे गले से कहती हैं कि उनके पति ने किसी का क्या बिगाड़ा था। बेटे को सरकार ने नौकरी दी और उन्हें मदद पहुंचाई, मगर राजेश की कमी पूरी नहीं हो सकती है। वहीं, भोपा के गांव किशनपुरा में रहने वाले निसार की मां को उसका इंतजार आज भी है। बेटे की तलाश में दुखियारी मां हर वक्त दरवाजे पर बेटे के आने की राह देख रही है, लेकिन निसार कहां गया और उसके साथ क्या हुआ, इसका जवाब किसी के पास नहीं है।
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