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उम्मीद का उजियारा : लॉकडाउन में रोजगार पर लगा ताला तो महिलाओं ने परिवार संभाला
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कांठ रोड स्थित प्रेम फिलिंग स्टेशन पर गाड़ियों में पेट्रोल डालती नेहा।
- फोटो : CITY
मुरादाबाद। लॉकडाउन में जब रोजगार ठप हो गया और परिवार पर रोजी रोटी का संकट आन पड़ा तो महिलाओं ने तारणहार बन कर परिवार को संकट से उबारा। कोरोना संक्रमण और लॉकडाउन के बीच एक बेटी ने उम्मीद का उजियारा बन कर समाज को दिशा दिखाई है। 19 वर्षीय बंगला गांव निवासी नेहा बीए प्रथम वर्ष की छात्रा है उसके पिता कमल सिंह चाय की दुकान चलाते हैं और मां शारदा देवी गृहणी हैं।
सात भाई-बहनों में नेहा सबसे बड़ी हैं। लॉकडाउन में जब पिता की चाय की दुकान ठप हो गई तो परिवार पर मुश्किलें आ गईं। दो वक्त की रोटी के लिए भी नेहा के पिता को मश्क्कत करनी पड़ती थी। बेटी ने पिता के हाल को समझा और नौकरी की तलाश में जुट गई। तब उनका सहारा बना कांठ रोड स्थित एक पेट्रोल पंप। आम तौर पर किसी महिला को पेट्रोल पंप पर ड्यूटी करते नहीं देखा गया, लेकिन नेहा अपने परिवार का भरण पोषण करने के लिए पेट्रोल पंप पर नौकरी कर रही है। यहां से उन्हें छह हजार रुपये प्रतिमाह प्राप्त होते हैं। इससे वह अपने परिवार का खर्च चला रही हैं। इसके अलावा नेहा के पिता को उन पर गर्व है। उनका कहना है कि शायद जरूरत के समय बेटा भी इतना काम नहीं आता।
परिवार के लिए संकटमोचन बनीं सुमैया
मुरादाबाद। हिमगिरी कालोनी निवासी सुमैया लॉकडाउन के मुश्किल समय में परिवार के लिए संकटमोचन बन गईं। सुमैया के पति इशाक आटो रिक्शा चलाते हैं। 23 मार्च के बाद पूरे देश में लॉकडाउन घोषित हो गया। इससे इशाक का रोजगार ठप हो गया। परिवार में पत्नी समेत तीन नन्हें मुन्हों की जिम्मेदारी भी थी। इससे वह परेशान रहने लगे लेकिन इस मुश्किल घड़ी में उनकी पत्नी सुमैया परिवार की तारणहार बनीं।
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पति की परेशानी को देखते हुए सुमैया ने काम की तलाश शुरू की। संयोग की बात यह रही कि उन्हें भी उसी पेंट्रोल पंप संचालक ने सहयोग मिला। जहां नेहा अपने परिवार का खर्च चलाने के लिए नौकरी कर रही हैं। सुमैया ने वहां छह हजार रुपये मासिक वेतन की नौकरी स्वीकीर की। आज भी वह कांठ रोड स्थित पेट्रोल पंप पर कार्य करके अपने परिवार का भरण पोषण कर रही हैं। उनके तीन बच्चे अदनान (11) लहविश (9) और निमसा (5) हैं। बच्चों औप पति के लिए उन्होंने घर से बाहर निकलकर नौकरी करने में तनिक भी संकोच नहीं किया और समाज के लिए मिसाल बन गईं हैं। पति इशाक को उन पर गर्व है, वह कहते हैं कि यदि सुमैया ने नौकरी न की होती तो पता नहीं परिवार का गुजारा कैसे होता।
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सात भाई-बहनों में नेहा सबसे बड़ी हैं। लॉकडाउन में जब पिता की चाय की दुकान ठप हो गई तो परिवार पर मुश्किलें आ गईं। दो वक्त की रोटी के लिए भी नेहा के पिता को मश्क्कत करनी पड़ती थी। बेटी ने पिता के हाल को समझा और नौकरी की तलाश में जुट गई। तब उनका सहारा बना कांठ रोड स्थित एक पेट्रोल पंप। आम तौर पर किसी महिला को पेट्रोल पंप पर ड्यूटी करते नहीं देखा गया, लेकिन नेहा अपने परिवार का भरण पोषण करने के लिए पेट्रोल पंप पर नौकरी कर रही है। यहां से उन्हें छह हजार रुपये प्रतिमाह प्राप्त होते हैं। इससे वह अपने परिवार का खर्च चला रही हैं। इसके अलावा नेहा के पिता को उन पर गर्व है। उनका कहना है कि शायद जरूरत के समय बेटा भी इतना काम नहीं आता।
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परिवार के लिए संकटमोचन बनीं सुमैया
मुरादाबाद। हिमगिरी कालोनी निवासी सुमैया लॉकडाउन के मुश्किल समय में परिवार के लिए संकटमोचन बन गईं। सुमैया के पति इशाक आटो रिक्शा चलाते हैं। 23 मार्च के बाद पूरे देश में लॉकडाउन घोषित हो गया। इससे इशाक का रोजगार ठप हो गया। परिवार में पत्नी समेत तीन नन्हें मुन्हों की जिम्मेदारी भी थी। इससे वह परेशान रहने लगे लेकिन इस मुश्किल घड़ी में उनकी पत्नी सुमैया परिवार की तारणहार बनीं।
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पति की परेशानी को देखते हुए सुमैया ने काम की तलाश शुरू की। संयोग की बात यह रही कि उन्हें भी उसी पेंट्रोल पंप संचालक ने सहयोग मिला। जहां नेहा अपने परिवार का खर्च चलाने के लिए नौकरी कर रही हैं। सुमैया ने वहां छह हजार रुपये मासिक वेतन की नौकरी स्वीकीर की। आज भी वह कांठ रोड स्थित पेट्रोल पंप पर कार्य करके अपने परिवार का भरण पोषण कर रही हैं। उनके तीन बच्चे अदनान (11) लहविश (9) और निमसा (5) हैं। बच्चों औप पति के लिए उन्होंने घर से बाहर निकलकर नौकरी करने में तनिक भी संकोच नहीं किया और समाज के लिए मिसाल बन गईं हैं। पति इशाक को उन पर गर्व है, वह कहते हैं कि यदि सुमैया ने नौकरी न की होती तो पता नहीं परिवार का गुजारा कैसे होता।

कांठ रोड स्थित पेट्रोल पम्प पर गाडियों में पेट्रोल डालती सुमैय्या- फोटो : CITY