{"_id":"65fe894bbf28ab222800b9e2","slug":"up-lok-sabha-election-2024-generations-carrying-forward-the-legacy-of-politics-in-moradabad-division-2024-03-23","type":"feature-story","status":"publish","title_hn":"UP: कई परिवारों में दशकों से कायम है सियासी चमक, लगभग हर दल में मौजूद हैं ऐसे उदाहरण; पढ़ें यह रिपोर्ट","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
UP: कई परिवारों में दशकों से कायम है सियासी चमक, लगभग हर दल में मौजूद हैं ऐसे उदाहरण; पढ़ें यह रिपोर्ट
Sat, 23 Mar 2024 03:28 PM IST
शाहरुख खान
जितेंद्र कुमार, मुरादाबाद
जितेंद्र कुमार, मुरादाबाद
Published by: शाहरुख खान
Updated Sat, 23 Mar 2024 03:28 PM IST
सार
मुरादाबाद मंडल के कई परिवारों में दशकों से सियासी चमक कायम है। लगभग हर दल में ऐसे उदाहरण मौजूद हैं। मंडल में सियासत की विरासत को पीढ़ियां आगे बढ़ा रहीं हैं।
विज्ञापन
UP Lok Sabha Election 2024
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
मुरादाबाद मंडल में सियासत की विरासत एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में आगे बढ़ रही है। इनमें कई परिवार तो ऐसे हैं जिनके सदस्य दशकों से राजनीति में सक्रिय हैं। मंडल में किसी परिवार की तीन पीढ़ियां तो किसी परिवार की चार पीढि़यां सियासी विरासत को संजोए हैं। कुछ ऐसे ही परिवारों पर आधारित है जितेंद्र कुमार की यह रिपोर्ट...
छह दशक से बर्क परिवार सियासत में सक्रिय, तीसरी पीढ़ी ने संभाली विरासत
संभल का बर्क परिवार पिछले छह दशक से राजनीति में सक्रिय है। सबसे पहले डॉ. शफीकुर्रहमान बर्क ने 1967 से राजनीति में कदम रखा था। उसी साल उन्होंने विधानसभा का चुनाव लड़ा। हालांकि इस चुनाव और अगले विधानसभा चुनाव में उन्हें सफलता नहीं मिल सकी थी लेकिन जनता के बीच उनकी लोकप्रियता बढ़ती चली गई।
1974 में वह पहली बार विधायक चुने गए। इसके बाद वह चार बार विधायक बने। 1996 में पहली बार मुरादाबाद लोकसभा क्षेत्र से चुनाव जीत कर संसद पहुंचे थे। तीन बार मुरादाबाद लोकसभा सीट और दो बार संभल लोकसभा सीट पर उन्होंने कब्जा किया। इस बीच उन्होंने अपने बेटे ममलूकुर्रहमान बर्क को राजनीति में एंट्री कराई, हालांकि बेटे को सफलता नहीं मिल सकी। फिर उन्होंने तीसरी पीढ़ी में अपने पोते जियाउर्रहमान बर्क को राजनीति की राह पर बढ़ाया।
विज्ञापन
उन्हें 2017 में संभल विधानसभा सीट से चुनाव लड़ाया था। जिसमें जीत नहीं पाए। 2022 के विधानसभा चुनाव में कुंदरकी सीट से जियार्रहमान सपा के टिकट पर चुनाव लड़े और जीते। इस बार भी सपा ने डॉ. शफीकुर्रहमान को संभल से अपना प्रत्याशी घोषित किया था। 27 फरवरी 2024 को उनका निधन हो गया। अब सपा ने उनके पोते को प्रत्याशी घोषित कर दिया है। बर्क परिवार में जियाउर्रहमान तीसरी पीढ़ी में सियासत की विरासत संभाल रहे हैं।
विज्ञापन
छह दशक से बर्क परिवार सियासत में सक्रिय, तीसरी पीढ़ी ने संभाली विरासत
संभल का बर्क परिवार पिछले छह दशक से राजनीति में सक्रिय है। सबसे पहले डॉ. शफीकुर्रहमान बर्क ने 1967 से राजनीति में कदम रखा था। उसी साल उन्होंने विधानसभा का चुनाव लड़ा। हालांकि इस चुनाव और अगले विधानसभा चुनाव में उन्हें सफलता नहीं मिल सकी थी लेकिन जनता के बीच उनकी लोकप्रियता बढ़ती चली गई।
विज्ञापन
1974 में वह पहली बार विधायक चुने गए। इसके बाद वह चार बार विधायक बने। 1996 में पहली बार मुरादाबाद लोकसभा क्षेत्र से चुनाव जीत कर संसद पहुंचे थे। तीन बार मुरादाबाद लोकसभा सीट और दो बार संभल लोकसभा सीट पर उन्होंने कब्जा किया। इस बीच उन्होंने अपने बेटे ममलूकुर्रहमान बर्क को राजनीति में एंट्री कराई, हालांकि बेटे को सफलता नहीं मिल सकी। फिर उन्होंने तीसरी पीढ़ी में अपने पोते जियाउर्रहमान बर्क को राजनीति की राह पर बढ़ाया।
विज्ञापन
उन्हें 2017 में संभल विधानसभा सीट से चुनाव लड़ाया था। जिसमें जीत नहीं पाए। 2022 के विधानसभा चुनाव में कुंदरकी सीट से जियार्रहमान सपा के टिकट पर चुनाव लड़े और जीते। इस बार भी सपा ने डॉ. शफीकुर्रहमान को संभल से अपना प्रत्याशी घोषित किया था। 27 फरवरी 2024 को उनका निधन हो गया। अब सपा ने उनके पोते को प्रत्याशी घोषित कर दिया है। बर्क परिवार में जियाउर्रहमान तीसरी पीढ़ी में सियासत की विरासत संभाल रहे हैं।
रामपुर की सियासत में रहा है नवाब परिवार का दखल
रामपुर की सियासत में नवाब परिवार की तीन पीढि़यां राजनीति में सक्रिय रहीं हैं। नवाब खानदान से सबसे पहले जुल्फिकार अली खान उर्फ मिक्की मियां ने राजनीति में कदम रखा था। वह 1967 में रामपुर से संसद में पहुंचे थे। वह रामपुर से पांच बार सांसद चुने गए थे। 1991 में उनके निधन के बाद उनकी सियासी विरासत पत्नी नूरबानो ने संभाली थी। नूरबानो रामपुर से दो बार सांसद बनीं थीं।
नूरबानो केंद्र की सियासत करती थीं तो उनके बेटे नवाब काजिम अली खां उर्फ नवेद मियां ने प्रदेश की राजनीति में किस्मत आजमाई और सफल हुए थे। पांच बार लगातार विधायक रहे हैं नवाब काजिम अली खां लगातार पांच बार विधायक रहे हैं। तीसरी पीढ़ी में नवाब काजिम अली खां के बेटे हैदर अली खां उर्फ हमजा मियां ने 2022 में स्वार सीट से अपना दल (एस) के टिकट पर चुनाव लड़ा था। नवाब परिवार की तीनों पीढि़यां अब भी सक्रिय राजनीति में हैं।
रामपुर की सियासत में नवाब परिवार की तीन पीढि़यां राजनीति में सक्रिय रहीं हैं। नवाब खानदान से सबसे पहले जुल्फिकार अली खान उर्फ मिक्की मियां ने राजनीति में कदम रखा था। वह 1967 में रामपुर से संसद में पहुंचे थे। वह रामपुर से पांच बार सांसद चुने गए थे। 1991 में उनके निधन के बाद उनकी सियासी विरासत पत्नी नूरबानो ने संभाली थी। नूरबानो रामपुर से दो बार सांसद बनीं थीं।
नूरबानो केंद्र की सियासत करती थीं तो उनके बेटे नवाब काजिम अली खां उर्फ नवेद मियां ने प्रदेश की राजनीति में किस्मत आजमाई और सफल हुए थे। पांच बार लगातार विधायक रहे हैं नवाब काजिम अली खां लगातार पांच बार विधायक रहे हैं। तीसरी पीढ़ी में नवाब काजिम अली खां के बेटे हैदर अली खां उर्फ हमजा मियां ने 2022 में स्वार सीट से अपना दल (एस) के टिकट पर चुनाव लड़ा था। नवाब परिवार की तीनों पीढि़यां अब भी सक्रिय राजनीति में हैं।
आजम परिवार का लंबे समय तक बना रहा दबदबा
सपा नेता आजम खां रामपुर से दस बार विधायक और एक बार सांसद चुने गए। 2019 में जब आजम खां सांसद बन गए तो उन्होंने विधानसभा सीट छोड़ दी। रामपुर शहर विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव में उनकी पत्नी डॉ. तजीन फात्मा मैदान में उतरीं और जीत हासिल की।
इससे पहले वो राज्यसभा की सदस्य भी रह चुकी हैं। आजम खां के बेटे स्वार विधानसभा सीट से दो बार विधायक चुने गए। यह अलग बात है कि दोनों बार उनकी विधायकी चली गई। कोर्ट से सजा होने के बाद आजम खां, डाॅ. तजीन फात्मा और अब्दुल्ला आजम जेल में हैं। सजायाफ्ता होने के कारण तीनों अभी चुनावी मैदान में नहीं उतर सकते हैं।
सपा नेता आजम खां रामपुर से दस बार विधायक और एक बार सांसद चुने गए। 2019 में जब आजम खां सांसद बन गए तो उन्होंने विधानसभा सीट छोड़ दी। रामपुर शहर विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव में उनकी पत्नी डॉ. तजीन फात्मा मैदान में उतरीं और जीत हासिल की।
इससे पहले वो राज्यसभा की सदस्य भी रह चुकी हैं। आजम खां के बेटे स्वार विधानसभा सीट से दो बार विधायक चुने गए। यह अलग बात है कि दोनों बार उनकी विधायकी चली गई। कोर्ट से सजा होने के बाद आजम खां, डाॅ. तजीन फात्मा और अब्दुल्ला आजम जेल में हैं। सजायाफ्ता होने के कारण तीनों अभी चुनावी मैदान में नहीं उतर सकते हैं।
शिव बहादुर के बाद उनके बेटे ने बनाई पहचान
पूर्व मंत्री शिव बहादुर सक्सेना रामपुर की स्वार सीट से चार बार विधायक रहे हैं। उनकी विरासत को उनके पुत्र आकाश सक्सेना संभाल रहे हैं। आजम खां के खिलाफ मोर्चा खोलने वाले आकाश सक्सेना ने 2022 में रामपुर विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव में धमाकेदार जीत हासिल की थी।
इस सीट पर जीत हासिल करने वाले वो पहले भाजपाई हैं। इससे पहले आकाश ने 2022 का उपचुनाव लड़ा था, जिसमें वो आजम खां से हार गए थे। आजम की विधायकी जाने के बाद हुए उपचुनाव में उन्होंने सपा के आसिम राजा को पराजित किया।
पूर्व मंत्री शिव बहादुर सक्सेना रामपुर की स्वार सीट से चार बार विधायक रहे हैं। उनकी विरासत को उनके पुत्र आकाश सक्सेना संभाल रहे हैं। आजम खां के खिलाफ मोर्चा खोलने वाले आकाश सक्सेना ने 2022 में रामपुर विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव में धमाकेदार जीत हासिल की थी।
इस सीट पर जीत हासिल करने वाले वो पहले भाजपाई हैं। इससे पहले आकाश ने 2022 का उपचुनाव लड़ा था, जिसमें वो आजम खां से हार गए थे। आजम की विधायकी जाने के बाद हुए उपचुनाव में उन्होंने सपा के आसिम राजा को पराजित किया।
राजघराने की तीन पीढ़ियों ने संभाली सियासत की बागडोर
राजा का सहसपुर राजघराने का सियासत में बड़ा दखल रहा है। इस परिवार से रानी इंद्र मोहिनी बिलारी और चंदौसी विधानसभा से विधायक रही थीं और मंत्री भी बनी थीं। इनके बाद बेटी रीना कुमारी भी विधायक बनीं और प्रदेश सरकार में मंत्री भी रहीं। इंद्र मोहिनी के बेटे चंद्र विजय सिंह उर्फ बेबी राजा दो बार विधायक और एक बार सांसद रहे हैं। 2012 में रीना कुमारी के बेटे दिग्विजय सिंह ने भी विधानसभा का चुनाव लड़ा था लेकिन सफल नहीं हुए थे।
राजा का सहसपुर राजघराने का सियासत में बड़ा दखल रहा है। इस परिवार से रानी इंद्र मोहिनी बिलारी और चंदौसी विधानसभा से विधायक रही थीं और मंत्री भी बनी थीं। इनके बाद बेटी रीना कुमारी भी विधायक बनीं और प्रदेश सरकार में मंत्री भी रहीं। इंद्र मोहिनी के बेटे चंद्र विजय सिंह उर्फ बेबी राजा दो बार विधायक और एक बार सांसद रहे हैं। 2012 में रीना कुमारी के बेटे दिग्विजय सिंह ने भी विधानसभा का चुनाव लड़ा था लेकिन सफल नहीं हुए थे।
इकबाल महमूद के पिता और दादा का रहा है संभल में खासा दखल
संभल के विधायक इकबाल महमूद 1991 में पहली बार विधायक चुने गए थे। इनसे पहले इनके पिता महमूद हसन खां सक्रिय राजनीति में थे। वह तीन बार विधायक रहे थे जबकि इकबाल महमूद के दादा आशक अली भी अंग्रेजी शासन में चेयरमैन थे।
इकबाल महमूद 1991, 1996, 2002, 2007,2012 और 2017 और 2022 में भी चुनाव जीतकर विधायक बने। वह सपा सरकार में मंत्री भी रह चुके हैं। अब उनके बेटे सुहेल इकबाल भी राजनीति में सक्रिय हो रहे हैं।
संभल के विधायक इकबाल महमूद 1991 में पहली बार विधायक चुने गए थे। इनसे पहले इनके पिता महमूद हसन खां सक्रिय राजनीति में थे। वह तीन बार विधायक रहे थे जबकि इकबाल महमूद के दादा आशक अली भी अंग्रेजी शासन में चेयरमैन थे।
इकबाल महमूद 1991, 1996, 2002, 2007,2012 और 2017 और 2022 में भी चुनाव जीतकर विधायक बने। वह सपा सरकार में मंत्री भी रह चुके हैं। अब उनके बेटे सुहेल इकबाल भी राजनीति में सक्रिय हो रहे हैं।
अनिल भारद्वाज के बाद पत्नी बीना आगे बढ़ीं
अनिल भारद्वाज ने मिलक के ब्लाॅक प्रमुख और पालिकाध्यक्ष रहने के बाद 1989 में मिलक से निर्दलीय विधानसभा का चुनाव लड़ा और जीत दर्ज की थी। वर्ष 1992 में सड़क हादसे में मौत के बाद उनकी पत्नी बीना भारद्वाज सियासत में आईं। वह 2002 में सपा के टिकट पर चुनाव लड़ीं और विधायक चुनी गई थीं। अब वह भाजपा में शामिल हैं और सक्रिय राजनीति में हैं।
अनिल भारद्वाज ने मिलक के ब्लाॅक प्रमुख और पालिकाध्यक्ष रहने के बाद 1989 में मिलक से निर्दलीय विधानसभा का चुनाव लड़ा और जीत दर्ज की थी। वर्ष 1992 में सड़क हादसे में मौत के बाद उनकी पत्नी बीना भारद्वाज सियासत में आईं। वह 2002 में सपा के टिकट पर चुनाव लड़ीं और विधायक चुनी गई थीं। अब वह भाजपा में शामिल हैं और सक्रिय राजनीति में हैं।
सर्वेश सिंह की तीसरी पीढ़ी राजनीति में सक्रिय
मुरादाबाद के पूर्व सांसद कुंवर सर्वेश सिंह का परिवार 1962 से राजनीति में सक्रिय है। सर्वेश सिंह के पिता रामपाल सिंह 1962 से 1989 तक राजनीति में सक्रिय रहे। वह चार बार ठाकुरद्वारा से विधायक और एक बार अमरोहा से सांसद रहे हैं। पिता से राजनीति के गुर विरासत में मिलने के बाद सर्वेश सिंह 1991 में सक्रिय राजनीति में आए।
उन्होंने ठाकुरद्वारा विधानसभा सीट जीती और 2007 तक वह इस सीट से विधायक रहे। 2007 में उन्हें बसपा प्रत्याशी विजय यादव ने हरा दिया था। हालांकि अगले ही चुनाव में 2012 में सर्वेश सिंह फिर से विधायक चुने गए। 2014 में उन्होंने मुरादाबाद लोकसभा सीट पर जीत दर्ज की। 2017 से उनके बेटे सुशांत सिंह बढ़ापुर लोकसभा सीट से विधायक हैं। 2024 में मुरादाबाद सीट से सर्वेश सिंह को सबसे मजबूत दावेदारों में गिना जा रहा है।
मुरादाबाद के पूर्व सांसद कुंवर सर्वेश सिंह का परिवार 1962 से राजनीति में सक्रिय है। सर्वेश सिंह के पिता रामपाल सिंह 1962 से 1989 तक राजनीति में सक्रिय रहे। वह चार बार ठाकुरद्वारा से विधायक और एक बार अमरोहा से सांसद रहे हैं। पिता से राजनीति के गुर विरासत में मिलने के बाद सर्वेश सिंह 1991 में सक्रिय राजनीति में आए।
उन्होंने ठाकुरद्वारा विधानसभा सीट जीती और 2007 तक वह इस सीट से विधायक रहे। 2007 में उन्हें बसपा प्रत्याशी विजय यादव ने हरा दिया था। हालांकि अगले ही चुनाव में 2012 में सर्वेश सिंह फिर से विधायक चुने गए। 2014 में उन्होंने मुरादाबाद लोकसभा सीट पर जीत दर्ज की। 2017 से उनके बेटे सुशांत सिंह बढ़ापुर लोकसभा सीट से विधायक हैं। 2024 में मुरादाबाद सीट से सर्वेश सिंह को सबसे मजबूत दावेदारों में गिना जा रहा है।
पिंकी ने संभाली पिता की सियासी विरासत
असमोली की सपा विधायक पिंकी यादव ने अपने पिता की सियासी विरासत संभाली है। उनके पिता विजेंद्र पाल सिंह यादव ने सियासी सफर की शुरुआत कांग्रेस से की थी। उन्होंने बहजोई विधानसभा सीट से पहला चुनाव लड़ा था। 1980 में वह कांग्रेस के टिकट पर संभल के सांसद चुने गए थे। इसके बाद 1985 में वह बहजोई से कांग्रेस के विधायक चुने गए और मंत्री भी बने थे। 1989 के चुनाव में उन्हें हार का सामना करना पड़ा था। 1991 में फिर कांग्रेस से विधायक बने।
इसके बाद वह कांग्रेस से इस्तीफा देकर समाजवादी पार्टी में शामिल हो गए थे। 1993 में उन्होंने अपनी पत्नी को चुनाव लड़वाया था लेकिन वह हार गईं थी। इसके बाद 1996 में समाजवादी पार्टी से वह फिर विधायक बने थे। उनकी पत्नी कुसुमलता यादव मुरादाबाद की जिला पंचायत अध्यक्ष भी रही थीं। पिता से विरासत में मिली सियासत को पिंकी यादव ने आगे बढ़ाया। इसके बाद वह 2012, 2017 और 2022 में असमोली से विधायक चुनी गई हैं। पिंकी यादव के दादा मास्टर बिशन लाल सिंह भी तीन बार विधायक रहे थे।
असमोली की सपा विधायक पिंकी यादव ने अपने पिता की सियासी विरासत संभाली है। उनके पिता विजेंद्र पाल सिंह यादव ने सियासी सफर की शुरुआत कांग्रेस से की थी। उन्होंने बहजोई विधानसभा सीट से पहला चुनाव लड़ा था। 1980 में वह कांग्रेस के टिकट पर संभल के सांसद चुने गए थे। इसके बाद 1985 में वह बहजोई से कांग्रेस के विधायक चुने गए और मंत्री भी बने थे। 1989 के चुनाव में उन्हें हार का सामना करना पड़ा था। 1991 में फिर कांग्रेस से विधायक बने।
इसके बाद वह कांग्रेस से इस्तीफा देकर समाजवादी पार्टी में शामिल हो गए थे। 1993 में उन्होंने अपनी पत्नी को चुनाव लड़वाया था लेकिन वह हार गईं थी। इसके बाद 1996 में समाजवादी पार्टी से वह फिर विधायक बने थे। उनकी पत्नी कुसुमलता यादव मुरादाबाद की जिला पंचायत अध्यक्ष भी रही थीं। पिता से विरासत में मिली सियासत को पिंकी यादव ने आगे बढ़ाया। इसके बाद वह 2012, 2017 और 2022 में असमोली से विधायक चुनी गई हैं। पिंकी यादव के दादा मास्टर बिशन लाल सिंह भी तीन बार विधायक रहे थे।