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फिर याद आई शहादत की दास्तां...चीन से जंग में शहीद हुआ था अमरोहा का लाल, शव की जगह घर पहुंचा था तार

Tue, 16 Jun 2020 11:16 PM IST
शाहरुख खान मोहम्मद सलाम खान, अमर उजाला, अमरोहा
मोहम्मद सलाम खान, अमर उजाला, अमरोहा Published by: शाहरुख खान Updated Tue, 16 Jun 2020 11:16 PM IST
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soldier of Amroha was martyred in ladakh war 1962 with China
शहीद कृपाल सिंह की फाइल फोटो - फोटो : अमर उजाला
सीमा विवाद को लेकर पूर्वी लद्दाख की गलवां घाटी में भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच हिंसक झड़प होने पर अमरोहा के शहीद कृपाल सिंह के परिवार में 1962 की जंग की याद ताजा हो गई। चीन से हुई जंग में कृपाल सिंह 21 साल की उम्र सरहद पर शहीद हो गए थे। 
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उनकी राह देख रहे परिजनों को शहादत का तार मिला था। शहीद का पार्थिव शरीर सरहद पर ही दफन हो गया। 1962 में हुए भारत चीन युद्ध में शहीद हुए जाट रेजिमेंट के सिपाही कृपाल का गजरौला थानाक्षेत्र के गांव भानपुर के रहने वाले थे।
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वर्ष 1962 में हुए भारत चीन युद्ध में शहीद हुए जाट रेजिमेंट के सिपाही कृपाल का का जन्म वर्ष 10 दिसंबर 1941 में गजरौला थानाक्षेत्र के गांव भानपुर में हुआ था। पिता भूरे सिंह के छह बेटों में कृपाल सिंह सबसे बड़े थे। पिता पेशे से किसान थे। कृपाल सिंह की शुरू से ही सेना में भर्ती होने की ख्वाहिश थी। 
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कृपाल सिंह ने शिव इंटर कालेज गजरौला से हाईस्कूल की। इसके बाद वर्ष 1961 बरेली जाट रेजीमेंट में सेना की ट्रेनिंग पूरी की। ट्रेनिंग से लौटने के बाद परिवार वालों ने कृपाल सिंह की शादी करा दी। अभी शादी को पांच दिन हुए थे तभी सीमा से ड्यूटी ज्वाइन करने के लिए बुलावा आ गया। 

मातृभूमि की पुकार को उन्होंने अपने निजी जीवन पर तरजीह दी। फौजी ड्यूटी ज्वाइन करने जम्मू कश्मीर पहुंच गए। लेकिन इसके बाद वह घर लौटकर नहीं आए। वर्ष 1962 में चीन से युद्ध छिड़ गया। भारत-चीन बार्डर पर लद्दाख में लड़ाई के दौरान 22 अक्तूबर 1962 को कृपाल सिंह शहीद हो गए। 

अपने बाइस महीने की सर्विस में 21 साल की उम्र में वह देश के शहीदों में शामिल हो गए। कृपाल सिंह की मौत से अंजान रहे घरवालों को उनकी शहादत का तार मिला। जिसे उनका आखिरी पत्र मानकर परिजनों ने सब्र कर लिया। 

फोटो में देखा चेहरा, पार्थिव शरीर भी नसीब नहीं
भारत चीन युद्ध (1962) में शहीद हुए जवान कृपाल सिंह की पत्नी लाडवती देवी का कहना है कि चीनी सेना से चल रहे विवाद एक बार फिर पुराने जख्म ताजा हो गए। शादी के चार दिन बाद ही वह सरहद पर चले गए थे। फिर वह लौट के नहीं आए। 

जब वह ड्यूटी ज्वाइन के लिए गांव से रवाना हुए तो उस वक्त मैं अपने मायके जगुवा खुर्द रजबपुर में थी। न तो मैंने उन्हें जाते हुए देखा और न ही उनसे कोई बात हुई थी। मुझे तो ठीक से उनका चेहरा तक नहीं देखा था। फोटो में ही चेहरा देख पाई। उनके पार्थिव शरीर तक नसीब नहीं हुआ। 

ये था प्रधानमंत्री हिंद का लाडवती के लिए संदेश

जिले के लाल कृपाल सिंह 22 अक्तूबर 1962 भारत चीन युद्ध में शहीद हुए थे। शहादत के करीब दस महीने बाद 27 अगस्त 1963 में प्रधानमंत्री हिंद पंडित जवाहरलाल नेहरू ने घर वालों को संवेदना पत्र भेजा था। पत्र में लिखा था... हिंद की जनता की ओर से और अपनी तरफ से मैं आपके दुख और रंज में यह संदेश भेज रहा हूं। हमारी दिली हमदर्दी आपके साथ है। देश की सेवा में जो यह बलिदान हुआ है, इसके लिए देश कृतज्ञ है और हमारी प्रार्थना है कि इससे आपको कुछ धीरज और शांति मिले।

आखिरी बार नहीं हो सकी मुलाकात
शहीद कृपाल सिंह के भाई ओमपाल सिंह कहते हैं कि चीन की हरकतों से 1962 की जंग की याद ताजा हो गई है। बरेली से ट्रेनिंग करके लौटने के बाद पिता ने कृपाल सिंह की शादी करा दी थी। चार दिन बाद ही उसे ज्वाइनिंग के लिए जम्मू कश्मीर जाना पड़ा। जिस दिन उन्हें जाना था उस दिन मैं गांव में नहीं था। किसी काम से दिल्ली गया था। इसलिए उनसे मुलाकात नहीं हो सकी। अब तो सिर्फ उनकी यादें हैं।

देश के लिए कुछ करने का था जज्बा
भाई ओमपाल सिंह का कहना है कि कृपाल सिंह शुरू से ही सेना में भर्ती होने के लिए उत्साहित थे। उनके अंदर देश के लिए कुछ करने का जज्बा था। देश के लिए मस्त मौला थे। लड़ाई में जान भी जा सकती है, ये जानते हुए उन्हें कोई डर या फिक्र नहीं थी। 

ओमपाल सिंह ने दिया लाडवती को सहारा

शादी के चार दिन बाद ही कृपाल सिंह ड्यूटी पर चले गए। जहां फिर कभी नहीं लौटकर आए। नई नवेली दुल्हन बनी लाडवती के हाथों की मेंहदी छूटने से पहले ही वह विधवा हो गई। उनके आगे लंबी जिंदगी पड़ी थी। लेकिन वह बेबस और लाचारी की हालत में थी। ऐसे में कृपाल सिंह के छोटे भाई ओमपाल सिंह ने उन्हें अपनाया। उनसे शादी कर ली। लाडवती के तीन बेटे हैं।  

1975 में आकर बस गए फतेउल्लापुर में
शहीद कृपाल सिंह का परिवार मूल रूप से गजरौला थानाक्षेत्र के गांव भानपुर का रहने वाला है। कृपाल सिंह के भाई ओमपाल सिंह को छोड़कर सभी भाई वहीं रहते हैं। लेकिन वर्ष 1975 में ओमपाल सिंह परिवार के साथ फतेउल्लापुर में आकर बस गए। कृपाल सिंह की शहादत के बाद पत्नी लाडवती को जिंदगी गुजर बसर करने के लिए सरकार ने बीस बीघा जमीन दी थी। ये जमीन मंडी धनौरा थानाक्षेत्र के गांव फतेउल्लापुर में मिली। इसके बाद लाडवती का परिवार यहीं आकर रहने लगा। 

नाम : कृपाल सिंह (सिपाही 3144261 : जाट रेजिमेंट)
पिता का नाम: भूरे सिंह
माता का नाम: मूर्ति देवी
पत्नी का नाम: लाडवती देवी
भाइयों के नाम: ओमपाल सिंह, सोमपाल सिंह, तेजपाल सिंह, धर्मपाल सिंह, शीशपाल सिंह
पता : गांव फतेउल्लापुर थाना मंडी धनौरा
जन्म तिथि : 10 दिसंबर 1941 (भानपुर थाना, गजरौला)
शहीद दिवस: 22 अक्तूबर 1962 
सर्विस अवधि: 22 महीने
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