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आजम खां को राहत, कोर्ट ने आरोप खारिज किया
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रामपुर।प्रघानमंत्री पर टिप्पणी करने के मामले में में कोतवाली में 2014 में दर्ज मुकदमे में कोर्ट से सांसद आजम खां को राहत मिली है। कोर्ट ने सांसद के खिलाफ आईपीसी की धारा 188 के तहत दाखिल आरोप पत्र को उन्मोचित (डिस्चार्ज) कर दिया है। इस मामले में एडीजे-6 की अदालत में मंगलवार को बहस हुई थी और कोर्ट ने बुधवार को अपना फैसला सुनाया है।
11 अप्रैल 2014 को तत्कालीन नगर विकास मंत्री आजम खां के खिलाफ कोतवाली में मुकदमा दर्ज हुआ था। इस मुकदमे में विवेचना के बाद पुलिस ने एक अगस्त 2018 को चार्जशीट कोर्ट में प्रस्तुत किया था। कोर्ट ने इस चार्जशीट पर 21 अगस्त को संज्ञान लिया था। इस मामले में आजम खां के खिलाफ वारंट भी जारी हुआ था। उनके अधिवक्ता की ओर से इस पर आपत्ति लगाई। आजम खां के अधिवक्ता ने कोर्ट ने तर्क प्रस्तुत किया कि मुकदमे की विवेचना के बाद विवेचक ने 153-ए, 153-बी, 295 ए, 505 (2), 171-ए और 125 लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम के अधीन अपराध नहीं बनता पाया है। आरोप पत्र आईपीसी की धारा 188 के तहत प्रेषित किया गया है। अधिवक्ताओं ने तर्क दिया कि आईपीसी की धारा 188 के तहत एक माह की कैद और दो सौ रुपये के जुर्माने का प्रावधान है। जिन मामलों में एक साल की कैद का प्रवाधान है, उन मामलों में आरोप पत्र पर संज्ञान एक साल के अंदर ही लिया जा सकता है। इस मामले में तो आरोप पत्र तीन साल नौ महीने के बाद दाखिल की गई है, जिसका कोई स्पष्टीकरण भी नहीं दिया गया है। इस मामले में आरोप पत्र पर संज्ञान नहीं लिया जा सकता है। इस मामले को लेकर मंगलवार को बहस हुई थी, कोर्ट बुधवार को अपना फैसला सुनाया और उनके खिलाफ दाखिल आरोप पत्र को डिस्चार्ज (खारिज) कर दिया। आजम खां के अधिवक्ता नासिर सुल्तान के मुताबिक कोर्ट ने पुलिस की चार्जशीट को खारिज कर दिया। उनके मुताबिक इस मुकदमे को खारिज कर दिया है। उनके मुताबिक इस मामले में बचाव पक्ष की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता खलील उल्ला की ओर से बहस की गई थी।
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11 अप्रैल 2014 को तत्कालीन नगर विकास मंत्री आजम खां के खिलाफ कोतवाली में मुकदमा दर्ज हुआ था। इस मुकदमे में विवेचना के बाद पुलिस ने एक अगस्त 2018 को चार्जशीट कोर्ट में प्रस्तुत किया था। कोर्ट ने इस चार्जशीट पर 21 अगस्त को संज्ञान लिया था। इस मामले में आजम खां के खिलाफ वारंट भी जारी हुआ था। उनके अधिवक्ता की ओर से इस पर आपत्ति लगाई। आजम खां के अधिवक्ता ने कोर्ट ने तर्क प्रस्तुत किया कि मुकदमे की विवेचना के बाद विवेचक ने 153-ए, 153-बी, 295 ए, 505 (2), 171-ए और 125 लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम के अधीन अपराध नहीं बनता पाया है। आरोप पत्र आईपीसी की धारा 188 के तहत प्रेषित किया गया है। अधिवक्ताओं ने तर्क दिया कि आईपीसी की धारा 188 के तहत एक माह की कैद और दो सौ रुपये के जुर्माने का प्रावधान है। जिन मामलों में एक साल की कैद का प्रवाधान है, उन मामलों में आरोप पत्र पर संज्ञान एक साल के अंदर ही लिया जा सकता है। इस मामले में तो आरोप पत्र तीन साल नौ महीने के बाद दाखिल की गई है, जिसका कोई स्पष्टीकरण भी नहीं दिया गया है। इस मामले में आरोप पत्र पर संज्ञान नहीं लिया जा सकता है। इस मामले को लेकर मंगलवार को बहस हुई थी, कोर्ट बुधवार को अपना फैसला सुनाया और उनके खिलाफ दाखिल आरोप पत्र को डिस्चार्ज (खारिज) कर दिया। आजम खां के अधिवक्ता नासिर सुल्तान के मुताबिक कोर्ट ने पुलिस की चार्जशीट को खारिज कर दिया। उनके मुताबिक इस मुकदमे को खारिज कर दिया है। उनके मुताबिक इस मामले में बचाव पक्ष की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता खलील उल्ला की ओर से बहस की गई थी।
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