{"_id":"5f3309af8ebc3e3cd1087953","slug":"rahat-indori-feel-happy-to-reciet-on-jigar-manch-city-news-mbd358898373","type":"story","status":"publish","title_hn":"जब बोले इंदौरी....जिगर मंच पर पढ़कर मिलती है राहत","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
जब बोले इंदौरी....जिगर मंच पर पढ़कर मिलती है राहत
विज्ञापन
अभिनव चौहान, अमर उजाला ब्यूरो
मुरादाबाद। शायरी की दुनिया का एक ऐसा नाम जो देश-विदेश में अपनी पहचान रखता था, उसके लिए मुरादाबाद का जिगर मंच सबसे ज्यादा सुकून देने वाला था। अपनी अलहदा शायरी और उस पर अनोखे अंदाज के माध्यम से श्रोताओं के दिलों में जगह बनाने वाले राहत इंदौरी ने 25 अगस्त 2018 को अमर उजाला की ओर से मुरादाबाद में आयोजित जश्न-ए-आज़ादी में शिरकत की थी। देर रात दो बजे तक उन्हें सुनने के लिए पंचायत भवन सभागार भरा रहा। जब वो मंच पर आए तो लोग उनके कलाम सुन कुर्सियों से उठ-उठकर तालियां बजाने लगे।
अपने साक्षात्कार में उन्होंने कहा था कि पूरी दुनिया में मंचों पर मैंने पड़ा है, लेकिन मुरादाबाद का प्यार मुझे इंदौर और भोपाल के प्यार जैसा ही लगता है। यहां के जिगर मंच पर पढ़कर राहत को जो राहत मिलती है, उसकी बात अलग है। ऐसा लगता है जैसे मैं अपने खानदान के किसी बुजुर्ग की सरपरस्ती में पढ़ रहा हूं। मुरादाबाद में अमर उजाला के मुशायरे के बाद इसी साल आयोजित जिगर फेस्ट में उन्होंने आखिरी बार कलाम सुनाए थे।
मेरे परिवार का शख्स था, कम हो गया : मंसूर उस्मानी
मुरादाबाद में मशहूर नाजिम मंसूर उस्मानी की निजामत में राहत इंदौरी ने मुशायरे पढ़े। भारत के दूसरे शहरों और दूसरे देशों में भी उनकी निजामत में तमाम मुशायरे उन्होंने पढ़े। मंसूर उस्मानी उन दिनों को याद करते हुए कहते हैं, मेरे परिवार का एक शख्स कम हो गया। मेरी उनसे मंचों के अलावा व्यक्तिगत करीबी बहुत थी। मैं उनके बच्चों की शादी में गया, वो मेरे बच्चों की शादी में आए। जिंदगी के तमाम हसीन और दुख भरे अनुभव संग जीये हैं। उनका जाना न केवल शायरी की दुनिया में खालीपन भर गया, बल्कि मेरी निजी जिंदगी को भी खाली कर गया। मुरादाबाद के हवाले से कहूं तो जिगर मंच के श्रोताओं के दिलो-जिगर में बसने वाला चला गया।
विज्ञापन
तहत की शायरी को दिया राहत ने नया अंदाज़ : वसीम बरेलवी
पैतृक रूप से मुरादाबाद के निवासी प्रो. वसीम बरेलवी कहते हैं कि मुझे याद आता है जब उज्जैन में मेरी और उनकी पहली मुलाकात थी। इसके बाद मैंने पहली बार उन्हें उत्तर प्रदेश में मुशायरे में दावत दी। उसके बाद से वह उत्तर प्रदेश के पंसदीदा शायरों में शुमार हो गए। मुरादाबाद में जिगर मंच पर मैंने और उन्होंने तमाम मुशायरे पढ़े। हम याद मेरे जहन में ताजा हो रही है। राहत को याद करते हुए आंखें नम हैं। राहत से पहले गजल तरन्नुम में ज्यादा सुनी जाती थी। किसी ने नहीं सोचा था कि तहत के कलाम को इतना पसंद किया जाएगा। लेकिन तहत की शायरी को जो अंदाज-ए-बयां राहत ने दिया वो सदियों तक याद रखा जाएगा। उनके अंदाज को लोग कॉपी करने लगे हैं, यही उनकी कीर्ति का उदाहरण है।
सच को सच कहने की हिम्मत रखते थे राहत इंदौरी : माहेश्वर तिवारी
नवगीतकार माहेश्वर तिवारी उनके संग बिताए दिनों को याद करते हुए कहते हैं कि मैंने काफी समय मध्य प्रदेश में बिताया इस लिहाज से राहत इंदौरी मुझसे करीबी रिश्ता मानते थे। ऐसा लगता था कि एक ही परिवार के दो लोगों अलग-अलग बस गए हैं। मुरादाबाद में जब भी आए हैं उन्होंने बहुत सम्मान दिया। घरेलू मंचों से बाहर भी लाल किले से लेकर विदेशों तक के मंच पर उनका आदर हमेशा याद रहेगा। वो सच को सच कहने की हिम्मत रखते थे। मुझे याद है कि इंदौर के एक मुशायरे में उन्होंने एक शायर की गजल में तकनीकी खामी होने की वजह से मंच से ही टोक दिया था। आपकी गलती पर आपको टोकने वाले कम होते हैं, नाक-भौंह सिकोड़ने वालो ज्यादा। राहत गलतियों पर टोकते थे, फिर सही भी कराते थे। ये आदत उनके व्यक्तित्व को दूसरों से अलग बनाती थी।
जब वसीम बरेलवी के बाद पढ़ने से पहले मांगी अनुमति
चंदौसी के गणेश चौथ के मेले में मुशायरे का आयोजन 2013 में किया गया था। प्रो. वसीम बरेलवी को कहीं निकलना था। उन्होंने अपनी व्यस्तता जाहिर की तो संयोजकों ने उसे मान लिया। मंसूर उस्मानी संचालन कर रहे थे। उनके सामने बात आई तो उन्होंने राहत इंदौरी से कहा कि वसीम साहब को जाना है, आपको आखिर में पढ़ना होगा। राहत इंदौरी ने उस समय कहा कि वसीम साहब के बाद मैं कैसे पढ़ सकता हूं, आप मेरा एक शेर पढ़वा दें, उसके बाद वसीम साहब पढ़ेंगे और सभी घर चलेंगे। लेकिन वसीम साहब की अनुमति मिलने के बाद मुशायरे का समापन राहत इंदौरी के कलाम से हुआ। ये वाकया सुनाते हुए चंदौसी निवासी सगीर सैफी उनके अंदर बड़ो के प्रति सम्मान को याद करते हुए भावुक हो जाते हैं।
विज्ञापन
मुरादाबाद। शायरी की दुनिया का एक ऐसा नाम जो देश-विदेश में अपनी पहचान रखता था, उसके लिए मुरादाबाद का जिगर मंच सबसे ज्यादा सुकून देने वाला था। अपनी अलहदा शायरी और उस पर अनोखे अंदाज के माध्यम से श्रोताओं के दिलों में जगह बनाने वाले राहत इंदौरी ने 25 अगस्त 2018 को अमर उजाला की ओर से मुरादाबाद में आयोजित जश्न-ए-आज़ादी में शिरकत की थी। देर रात दो बजे तक उन्हें सुनने के लिए पंचायत भवन सभागार भरा रहा। जब वो मंच पर आए तो लोग उनके कलाम सुन कुर्सियों से उठ-उठकर तालियां बजाने लगे।
अपने साक्षात्कार में उन्होंने कहा था कि पूरी दुनिया में मंचों पर मैंने पड़ा है, लेकिन मुरादाबाद का प्यार मुझे इंदौर और भोपाल के प्यार जैसा ही लगता है। यहां के जिगर मंच पर पढ़कर राहत को जो राहत मिलती है, उसकी बात अलग है। ऐसा लगता है जैसे मैं अपने खानदान के किसी बुजुर्ग की सरपरस्ती में पढ़ रहा हूं। मुरादाबाद में अमर उजाला के मुशायरे के बाद इसी साल आयोजित जिगर फेस्ट में उन्होंने आखिरी बार कलाम सुनाए थे।
विज्ञापन
मेरे परिवार का शख्स था, कम हो गया : मंसूर उस्मानी
मुरादाबाद में मशहूर नाजिम मंसूर उस्मानी की निजामत में राहत इंदौरी ने मुशायरे पढ़े। भारत के दूसरे शहरों और दूसरे देशों में भी उनकी निजामत में तमाम मुशायरे उन्होंने पढ़े। मंसूर उस्मानी उन दिनों को याद करते हुए कहते हैं, मेरे परिवार का एक शख्स कम हो गया। मेरी उनसे मंचों के अलावा व्यक्तिगत करीबी बहुत थी। मैं उनके बच्चों की शादी में गया, वो मेरे बच्चों की शादी में आए। जिंदगी के तमाम हसीन और दुख भरे अनुभव संग जीये हैं। उनका जाना न केवल शायरी की दुनिया में खालीपन भर गया, बल्कि मेरी निजी जिंदगी को भी खाली कर गया। मुरादाबाद के हवाले से कहूं तो जिगर मंच के श्रोताओं के दिलो-जिगर में बसने वाला चला गया।
विज्ञापन
तहत की शायरी को दिया राहत ने नया अंदाज़ : वसीम बरेलवी
पैतृक रूप से मुरादाबाद के निवासी प्रो. वसीम बरेलवी कहते हैं कि मुझे याद आता है जब उज्जैन में मेरी और उनकी पहली मुलाकात थी। इसके बाद मैंने पहली बार उन्हें उत्तर प्रदेश में मुशायरे में दावत दी। उसके बाद से वह उत्तर प्रदेश के पंसदीदा शायरों में शुमार हो गए। मुरादाबाद में जिगर मंच पर मैंने और उन्होंने तमाम मुशायरे पढ़े। हम याद मेरे जहन में ताजा हो रही है। राहत को याद करते हुए आंखें नम हैं। राहत से पहले गजल तरन्नुम में ज्यादा सुनी जाती थी। किसी ने नहीं सोचा था कि तहत के कलाम को इतना पसंद किया जाएगा। लेकिन तहत की शायरी को जो अंदाज-ए-बयां राहत ने दिया वो सदियों तक याद रखा जाएगा। उनके अंदाज को लोग कॉपी करने लगे हैं, यही उनकी कीर्ति का उदाहरण है।
सच को सच कहने की हिम्मत रखते थे राहत इंदौरी : माहेश्वर तिवारी
नवगीतकार माहेश्वर तिवारी उनके संग बिताए दिनों को याद करते हुए कहते हैं कि मैंने काफी समय मध्य प्रदेश में बिताया इस लिहाज से राहत इंदौरी मुझसे करीबी रिश्ता मानते थे। ऐसा लगता था कि एक ही परिवार के दो लोगों अलग-अलग बस गए हैं। मुरादाबाद में जब भी आए हैं उन्होंने बहुत सम्मान दिया। घरेलू मंचों से बाहर भी लाल किले से लेकर विदेशों तक के मंच पर उनका आदर हमेशा याद रहेगा। वो सच को सच कहने की हिम्मत रखते थे। मुझे याद है कि इंदौर के एक मुशायरे में उन्होंने एक शायर की गजल में तकनीकी खामी होने की वजह से मंच से ही टोक दिया था। आपकी गलती पर आपको टोकने वाले कम होते हैं, नाक-भौंह सिकोड़ने वालो ज्यादा। राहत गलतियों पर टोकते थे, फिर सही भी कराते थे। ये आदत उनके व्यक्तित्व को दूसरों से अलग बनाती थी।
जब वसीम बरेलवी के बाद पढ़ने से पहले मांगी अनुमति
चंदौसी के गणेश चौथ के मेले में मुशायरे का आयोजन 2013 में किया गया था। प्रो. वसीम बरेलवी को कहीं निकलना था। उन्होंने अपनी व्यस्तता जाहिर की तो संयोजकों ने उसे मान लिया। मंसूर उस्मानी संचालन कर रहे थे। उनके सामने बात आई तो उन्होंने राहत इंदौरी से कहा कि वसीम साहब को जाना है, आपको आखिर में पढ़ना होगा। राहत इंदौरी ने उस समय कहा कि वसीम साहब के बाद मैं कैसे पढ़ सकता हूं, आप मेरा एक शेर पढ़वा दें, उसके बाद वसीम साहब पढ़ेंगे और सभी घर चलेंगे। लेकिन वसीम साहब की अनुमति मिलने के बाद मुशायरे का समापन राहत इंदौरी के कलाम से हुआ। ये वाकया सुनाते हुए चंदौसी निवासी सगीर सैफी उनके अंदर बड़ो के प्रति सम्मान को याद करते हुए भावुक हो जाते हैं।